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बदहाल है शिक्षा
ब्यूरो, अमर उजाला, सोनभद्र
Updated Tue, 29 Nov 2016 11:32 PM IST
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जमीन पर बैठकर पढ़ते बच्चे
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प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में बेहतर इंतजाम हाकिमों के नजर-ए-इनायत पर निर्भर हैं। माडर्न स्कूलों की तर्ज पर, परिषदीय विद्यालयों की तस्वीर संवारने की बयानबाजी अभी तक यहां छलावा साबित हुई है।
हालात यह है कि विद्यालयों में बैठने के लिए डेस्क तक नहीं है। विद्यालय में छात्र-छात्राओं का समूह अलग-अलग टोलियों में जमीन पर बैठकर पढ़ाई करता है। कुछ जगहों पर फटी टाट पट्टी पर नौनिहाल ककहरा सीखते हैं। रसोईघर में बदइंतजामी व्यवस्था की पोल खोलने को पर्याप्त है।
चूल्हें पर मिड डे मील पकाया जाता है। अधिकतर स्कूलों में महिलाएं अध्यापक बतकही में मशगूल रहती हैं। कुछ शिक्षक जिम्मेदारियों का सही ढंग से निर्वहन तक नहीं कर रहे हैं। नेता टाइप के अध्यापक कभी कभार स्कूलों में रूख करते हैं।
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ऐसे में परिषदीय स्कूलों में व्यवस्था भगवान भरोसे चल रही है। जिले में 1810 प्राथमिक, 654 उच्च प्राथमिक विद्यालय हैं। प्रा. विद्यालयों में 3100 शिक्षक, 1250 शिक्षामित्र 191305 बच्चों का भविष्य संवारने में जुटे हैं। उच्च प्राथमिक विद्यालयों में 1130 शिक्षक, 605 अनुदेशक 62143 को ककहरा पढ़ा रहे हैं। हाल यह है कि 2464 प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालयों में आज भी बच्चे टाट पर बैठकर पढ़ते हैं। इनमें से 50 स्कूलों मेें दस वर्ष पूर्व डेस्क उपलब्ध कराए गए थे।
175 विद्यालयों में आज भी बिजली नहीं है। कक्षा एक और दो को छोड़ दें तो अन्य कक्षाओं के बच्चों को किताब तक नहीं मिलीं। कक्षा एक के बच्चों को हिंदी, कक्षा दो के बच्चों के हिंदी, गणित, कक्षा तीन के बच्चों को संस्कृत, हिंदी, अंग्रेजी, कक्षा चार के बच्चों को संस्कृत, हिंदी और कक्षा पांच के बच्चों को विज्ञान और हिंदी की किताबें दी गई हैं।
जबकि कक्षा तीन के बच्चों को हिंदी, गणित, अंग्रेजी, हमारा परिवेश, संस्कृत, कक्षा चार एवं पांच के बच्चों को हिंदी, अंग्रेजी, गणित, संस्कृत, हमारा परिवेश और विज्ञान की किताबें वितरित करना बाकी है। सजौर की सहायक अध्यापिका अंशू कहती हैं जिन विषयों की किताबें मिली है उसे वितरित कर दिया गया।
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हालात यह है कि विद्यालयों में बैठने के लिए डेस्क तक नहीं है। विद्यालय में छात्र-छात्राओं का समूह अलग-अलग टोलियों में जमीन पर बैठकर पढ़ाई करता है। कुछ जगहों पर फटी टाट पट्टी पर नौनिहाल ककहरा सीखते हैं। रसोईघर में बदइंतजामी व्यवस्था की पोल खोलने को पर्याप्त है।
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चूल्हें पर मिड डे मील पकाया जाता है। अधिकतर स्कूलों में महिलाएं अध्यापक बतकही में मशगूल रहती हैं। कुछ शिक्षक जिम्मेदारियों का सही ढंग से निर्वहन तक नहीं कर रहे हैं। नेता टाइप के अध्यापक कभी कभार स्कूलों में रूख करते हैं।
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ऐसे में परिषदीय स्कूलों में व्यवस्था भगवान भरोसे चल रही है। जिले में 1810 प्राथमिक, 654 उच्च प्राथमिक विद्यालय हैं। प्रा. विद्यालयों में 3100 शिक्षक, 1250 शिक्षामित्र 191305 बच्चों का भविष्य संवारने में जुटे हैं। उच्च प्राथमिक विद्यालयों में 1130 शिक्षक, 605 अनुदेशक 62143 को ककहरा पढ़ा रहे हैं। हाल यह है कि 2464 प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालयों में आज भी बच्चे टाट पर बैठकर पढ़ते हैं। इनमें से 50 स्कूलों मेें दस वर्ष पूर्व डेस्क उपलब्ध कराए गए थे।
175 विद्यालयों में आज भी बिजली नहीं है। कक्षा एक और दो को छोड़ दें तो अन्य कक्षाओं के बच्चों को किताब तक नहीं मिलीं। कक्षा एक के बच्चों को हिंदी, कक्षा दो के बच्चों के हिंदी, गणित, कक्षा तीन के बच्चों को संस्कृत, हिंदी, अंग्रेजी, कक्षा चार के बच्चों को संस्कृत, हिंदी और कक्षा पांच के बच्चों को विज्ञान और हिंदी की किताबें दी गई हैं।
जबकि कक्षा तीन के बच्चों को हिंदी, गणित, अंग्रेजी, हमारा परिवेश, संस्कृत, कक्षा चार एवं पांच के बच्चों को हिंदी, अंग्रेजी, गणित, संस्कृत, हमारा परिवेश और विज्ञान की किताबें वितरित करना बाकी है। सजौर की सहायक अध्यापिका अंशू कहती हैं जिन विषयों की किताबें मिली है उसे वितरित कर दिया गया।