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आठ बार भाजपा-जनसंघ, पांच बार कांग्रेस के पास रही सीट
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जिले की सबसे पुरानी विधानसभा सीट राबर्ट्सगंज का चुनावी इतिहास रोचक है। यहां की जनता ने हर दल का साथ दिया है। कांग्रेस और भाजपा के प्रत्याशियों को कई बार विधानसभा पहुंचाया तो सपा और बसपा पर भी मेहरबानी दिखाई। निर्दल उम्मीदवार भी यहां बड़ी जीत दर्ज करने में कामयाब हुए हैं। यह बात दीगर है कि सबको मौका देने के बाद भी क्षेत्र का भरपूर विकास न होने की टीस अब भी लोगों के मन में बनी हुई है।
आजादी के बाद हुए पहले मतदान में राबर्ट्सगंज के मतदाताओं ने उत्साह से हिस्सा लिया था। तब दुद्धी सह राबर्ट्सगंज के नाम से स्थापित सीट मिर्जापुर जिले का हिस्सा होती थी। एक सीट से दो विधायक चुने जाते थे। 1952 में हुए पहले चुनाव में यहां दोनों सीटों पर कांग्रेस के उम्मीदवारों को जीत मिली थी, जबकि 1957 के दूसरे चुनाव में दोनों सीट जनसंघ के खाते में आई थी। लगातार बदलते परिसीमन और समीकरणों के बावजूद इस सीट के मिजाज में कोई खास असर नहीं आया है। वह किसी भी एक के साथ चलने के आदी नहीं है। अब तक हुए 17 चुनावों के परिणामों पर नजर डालें तो यहां सबसे ज्यादा आठ बार जनसंघ-भाजपा का परचम लहराया है। वहीं कांग्रेस के हिस्से में पांच जीत नसीब हुई है। सपा के टिकट पर जीत दर्ज कर दो उम्मीदवार विधायक बने तो बसपा का अब तक एक बार ही खाता खुल पाया है।
तीन बार के विधायक को निर्दलीय ने दी थी मात
1996 का चुनाव सबसे अलग था। अब तक दलीय उम्मीदवारों को जीत दिलाते आ रही यहां की जनता ने पहली बार सारे प्रमुख दलों को सिरे से नकार दिया था। लगातार तीन बार से जीत रहे भाजपा के तीरथराज को निर्दल उम्मीदवार हरिप्रसाद उर्फ घमड़ी ने मात दी थी। नक्सल आंदोलन से निकले घमड़ी प्रसाद ने 35718 वोटों के अंतर से बड़ी जीत दर्ज की थी। यह इस सीट पर अब तक हुए चुनावों में जीत-हार के अंतर का दूसरा बड़ा आंकड़ा है।
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बदल गया है पहले से चुनाव प्रचार
पहले और अब के चुनाव में काफी अंतर देखने को मिल रहा है। हमने जब पहली बार वोट दिया था, तब प्रत्याशी घर-घर आकर संपर्क करते थे। गांव में ही रात विश्राम करते थे। सबके सुख-दुख में शामिल होते थे। पहले का चुनाव प्रचार जमीनी स्तर पर होता था। गांव में जब प्रत्याशी आते थे तो अलग ही माहौल रहता था। सारे लोग प्रत्याशी के साथ गांव में भ्रमण करते थे। अब चुनाव बहुत आधुनिक हो गया है, जहां मोबाइल से लोग प्रचार कर रहे हैं। हम बुजुर्गों को उसके बारे में कुछ पता ही नहीं चल रहा है कि कौन प्रत्याशी है कौन क्या कह रहा है। -काशी प्रसाद, नगवां।
1957 से ही चुनाव देख रहा हूं, मगर पहली बार वोट करने का मौका वर्ष 1965 में मिला था। तब से लेकर आज के चुनाव में काफी बदलाव हो गया है। पहले चुनाव प्रचार के लिए प्रत्याशी गांव-गांव जाते थे। बस अपनी बात कहते। दूसरों की कमियों की बजाय अपनी योजना बताते थे। अब ऐसा नहीं है। चुनाव प्रचार में मुद्दों पर कोई बात ही नहीं कर रहा। केवल जातिवाद, क्षेत्रवाद और धर्म के नाम पर वोट पाने की कोशिश चल रही है। नए तरीकों से तो अब यह भी नहीं पता चलता कि स्थानीय स्तर पर कौन लड़ रहा। -भुनेश्वर देव पांडेय, वैनी।
राबर्ट्सगंज से अब तक चुने गए विधायक
वर्ष विधायक पार्टी
1952: बृजभूषण और रामस्वरुप: कांग्रेस
1957: आनंद ब्रह्म शाह और शोभनाथ: जनसंघ
1962: रामनाथ पाठक: कांग्रेस
1967: रुपनारायण: कांग्रेस
1969: सूबेदार प्रसाद: जनसंघ
1974: सूबेदार प्रसाद: जनसंघ
1977: सूबेदार प्रसाद: जनता पार्टी
1980: कल्लू राम रत्नाकर: कांग्रेस
1985: कल्लूराम रत्नाकर: कांग्रेस
1989: तीरथ राज: भाजपा
1991: तीरथ राज: भाजपा
1993: तीरथ राज: भाजपा
1996: हरिप्रसाद उर्फ घमड़ी: निर्दल
2002: परमेश्वर दयाल: सपा
2007: सत्यनारायण जैसल: बसपा
2012: अविनाश कुशवाहा: सपा
2017: भूपेश चौबे: भाजपा
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आजादी के बाद हुए पहले मतदान में राबर्ट्सगंज के मतदाताओं ने उत्साह से हिस्सा लिया था। तब दुद्धी सह राबर्ट्सगंज के नाम से स्थापित सीट मिर्जापुर जिले का हिस्सा होती थी। एक सीट से दो विधायक चुने जाते थे। 1952 में हुए पहले चुनाव में यहां दोनों सीटों पर कांग्रेस के उम्मीदवारों को जीत मिली थी, जबकि 1957 के दूसरे चुनाव में दोनों सीट जनसंघ के खाते में आई थी। लगातार बदलते परिसीमन और समीकरणों के बावजूद इस सीट के मिजाज में कोई खास असर नहीं आया है। वह किसी भी एक के साथ चलने के आदी नहीं है। अब तक हुए 17 चुनावों के परिणामों पर नजर डालें तो यहां सबसे ज्यादा आठ बार जनसंघ-भाजपा का परचम लहराया है। वहीं कांग्रेस के हिस्से में पांच जीत नसीब हुई है। सपा के टिकट पर जीत दर्ज कर दो उम्मीदवार विधायक बने तो बसपा का अब तक एक बार ही खाता खुल पाया है।
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तीन बार के विधायक को निर्दलीय ने दी थी मात
1996 का चुनाव सबसे अलग था। अब तक दलीय उम्मीदवारों को जीत दिलाते आ रही यहां की जनता ने पहली बार सारे प्रमुख दलों को सिरे से नकार दिया था। लगातार तीन बार से जीत रहे भाजपा के तीरथराज को निर्दल उम्मीदवार हरिप्रसाद उर्फ घमड़ी ने मात दी थी। नक्सल आंदोलन से निकले घमड़ी प्रसाद ने 35718 वोटों के अंतर से बड़ी जीत दर्ज की थी। यह इस सीट पर अब तक हुए चुनावों में जीत-हार के अंतर का दूसरा बड़ा आंकड़ा है।
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बदल गया है पहले से चुनाव प्रचार
पहले और अब के चुनाव में काफी अंतर देखने को मिल रहा है। हमने जब पहली बार वोट दिया था, तब प्रत्याशी घर-घर आकर संपर्क करते थे। गांव में ही रात विश्राम करते थे। सबके सुख-दुख में शामिल होते थे। पहले का चुनाव प्रचार जमीनी स्तर पर होता था। गांव में जब प्रत्याशी आते थे तो अलग ही माहौल रहता था। सारे लोग प्रत्याशी के साथ गांव में भ्रमण करते थे। अब चुनाव बहुत आधुनिक हो गया है, जहां मोबाइल से लोग प्रचार कर रहे हैं। हम बुजुर्गों को उसके बारे में कुछ पता ही नहीं चल रहा है कि कौन प्रत्याशी है कौन क्या कह रहा है। -काशी प्रसाद, नगवां।
1957 से ही चुनाव देख रहा हूं, मगर पहली बार वोट करने का मौका वर्ष 1965 में मिला था। तब से लेकर आज के चुनाव में काफी बदलाव हो गया है। पहले चुनाव प्रचार के लिए प्रत्याशी गांव-गांव जाते थे। बस अपनी बात कहते। दूसरों की कमियों की बजाय अपनी योजना बताते थे। अब ऐसा नहीं है। चुनाव प्रचार में मुद्दों पर कोई बात ही नहीं कर रहा। केवल जातिवाद, क्षेत्रवाद और धर्म के नाम पर वोट पाने की कोशिश चल रही है। नए तरीकों से तो अब यह भी नहीं पता चलता कि स्थानीय स्तर पर कौन लड़ रहा। -भुनेश्वर देव पांडेय, वैनी।
राबर्ट्सगंज से अब तक चुने गए विधायक
वर्ष विधायक पार्टी
1952: बृजभूषण और रामस्वरुप: कांग्रेस
1957: आनंद ब्रह्म शाह और शोभनाथ: जनसंघ
1962: रामनाथ पाठक: कांग्रेस
1967: रुपनारायण: कांग्रेस
1969: सूबेदार प्रसाद: जनसंघ
1974: सूबेदार प्रसाद: जनसंघ
1977: सूबेदार प्रसाद: जनता पार्टी
1980: कल्लू राम रत्नाकर: कांग्रेस
1985: कल्लूराम रत्नाकर: कांग्रेस
1989: तीरथ राज: भाजपा
1991: तीरथ राज: भाजपा
1993: तीरथ राज: भाजपा
1996: हरिप्रसाद उर्फ घमड़ी: निर्दल
2002: परमेश्वर दयाल: सपा
2007: सत्यनारायण जैसल: बसपा
2012: अविनाश कुशवाहा: सपा
2017: भूपेश चौबे: भाजपा