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प्राचार्य और पूर्व समाज कल्याण अधिकारी दोषी
ब्यूरो/ अमर उजाला /सोनभद्र
Updated Fri, 03 Jun 2016 10:26 PM IST
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संस्कृत महाविद्यालय से जुड़ी क्षतिपूर्ति राशि के घपले में डीएम सीबी सिंह ने प्राचार्य जटाशंकर पांडेय और पूर्व समाज कल्याण अधिकारी को दोषी ठहराया है। प्रकरण में विद्यालय के खाते में भेजे गए 12.30 लाख को मय ब्याज राजकोष में जमा कराने और संबंधितों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।
निर्णय के मुताबिक वर्ष 2007-08 में विद्यार्थियों में वितरण के लिए समाज कल्याण विभाग ने संस्कृत महाविद्यालय के इलाहाबाद बैंक स्थित खाते में 12.30 लाख रुपये क्षतिपूर्ति राशि भेजी थी। आरोप है कि प्राचार्य ने इसमें से पौने आठ लाख रुपये खुद और दो अन्य व्यक्तियों के जरिए निकाल लिया। तत्कालीन उप निदेशक समाज कल्याण योगेश राय की जांच में प्रकरण सामने आया तो कार्रवाई के निर्देश दिए। तत्कालीन समाज कल्याण अधिकारी ने प्राचार्य के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दिया। लेकिन बाद में कोर्ट में उपस्थित होकर कहा कि वह मुकदमा नहीं लड़ना चाहतीं। तब पत्रावली दाखिल दफ्तर हो गई। उधर, तत्कालीन डीएम के निर्देश पर डीआईओएस ने संबंधित खाते को सीज कर दिया। एफआईआर का मामला दाखिल दफ्तर होने के बाद प्राचार्य ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर खाता खुलवाने का अनुरोध किया। इस पर हाईकोर्ट ने डीएम को मामले के नियमानुसार निस्तारण का आदेश दे दिया।
डीएम ने समाज कल्याण अधिकारी और डीआईओएस से आख्या तलब की तो पता चला कि नियमों को ताक पर रखकर 12.30 लाख में से करीब पौने आठ लाख रुपये निकाले गए। मामला का खुलासा होने से 7.75 लाख खाते में जमा कर दिए गए। डीएम के मुताबिक यह मामला सीधे सरकारी धनराशि से जुड़ा है। एनआईसी में फीडिंग न होने से विद्यार्थियों की सूची भी सवालों के घेरे में है। प्रकरण में तत्कालीन समाज कल्याण अधिकारी और प्राचार्य दोनों दोषी हैं। उनके खिलाफ विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई के निर्देश जारी कर दिए गए हैं। स्थिति से हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार को भी अवगत कराया गया है।
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निर्णय के मुताबिक वर्ष 2007-08 में विद्यार्थियों में वितरण के लिए समाज कल्याण विभाग ने संस्कृत महाविद्यालय के इलाहाबाद बैंक स्थित खाते में 12.30 लाख रुपये क्षतिपूर्ति राशि भेजी थी। आरोप है कि प्राचार्य ने इसमें से पौने आठ लाख रुपये खुद और दो अन्य व्यक्तियों के जरिए निकाल लिया। तत्कालीन उप निदेशक समाज कल्याण योगेश राय की जांच में प्रकरण सामने आया तो कार्रवाई के निर्देश दिए। तत्कालीन समाज कल्याण अधिकारी ने प्राचार्य के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दिया। लेकिन बाद में कोर्ट में उपस्थित होकर कहा कि वह मुकदमा नहीं लड़ना चाहतीं। तब पत्रावली दाखिल दफ्तर हो गई। उधर, तत्कालीन डीएम के निर्देश पर डीआईओएस ने संबंधित खाते को सीज कर दिया। एफआईआर का मामला दाखिल दफ्तर होने के बाद प्राचार्य ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर खाता खुलवाने का अनुरोध किया। इस पर हाईकोर्ट ने डीएम को मामले के नियमानुसार निस्तारण का आदेश दे दिया।
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डीएम ने समाज कल्याण अधिकारी और डीआईओएस से आख्या तलब की तो पता चला कि नियमों को ताक पर रखकर 12.30 लाख में से करीब पौने आठ लाख रुपये निकाले गए। मामला का खुलासा होने से 7.75 लाख खाते में जमा कर दिए गए। डीएम के मुताबिक यह मामला सीधे सरकारी धनराशि से जुड़ा है। एनआईसी में फीडिंग न होने से विद्यार्थियों की सूची भी सवालों के घेरे में है। प्रकरण में तत्कालीन समाज कल्याण अधिकारी और प्राचार्य दोनों दोषी हैं। उनके खिलाफ विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई के निर्देश जारी कर दिए गए हैं। स्थिति से हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार को भी अवगत कराया गया है।
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