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प्राचीन बेलन नदी को मिलेगा पुनर्जीवन

Sun, 17 May 2020 09:33 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Sun, 17 May 2020 09:33 PM IST
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Ancient Belan River will get revival
सोनभद्र। उद्गम स्थल पर साल के ज्यादातर दिन सूखी रहने वाली 17 हजार वर्ष प्राचीन बेलन नदी को पुनर्जीवन देने का काम सोमवार से शुरू किया जाएगा। इसका माध्यम बनेगी मनरेगा। भूमि पूजन के जरिए कार्य की आधारशिला रखी जाएगी। इसके दो-तीन दिन बाद युद्धस्तर पर खुदाई का कार्य शुरू कर दिया जाएगा। पूर्व संध्या पर विकास महकमा इसकी तैयारियों में जुटा रहा। चतरा ब्लाक मुख्यालय पर भी इसको लेकर उत्साह की स्थिति बनी रही। रोजगार की दृष्टि से भी इस पहल को काफी अहम माना जा रहा है।
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चतरा ब्लाक के करद से निकलकर इलाहाबाद के टोंस नदी में मिलने वाली बेलन नदी का पुरातात्विक महत्व है। पूर्व में पुरातत्वविद जीआर शर्मा के निर्देशन में बेलन नदी घाटी सभ्यता को लेकर हुई खुदाई के बाद भारतीय पुरातत्व ओर प्रागैतिहासिक संस्कृतियां पुस्तक में भी यहां का जिक्र किया गया है। इसके पेज 189 पर स्पष्ट उल्लेख है कि बेलन घाटी यानी सोनभद्र के आस-पास उच्च पुरापाषाण काल संस्कृति के अवशेष मिले हैं। कार्बन तिथि के आधार पर इसे सत्रह हजार वर्ष प्राचीन माना गया है। जिले में भूजल और सिंचाई के लिहाज से भी नदी की स्थिति महत्वपूर्ण है लेकिन तपिश के समय नदी का ज्यादातर भाग सूख जाता है। इसको देखते हुए इसके उत्पत्ति स्थल की खुदाई और इसके जरिए नदी के पुनर्जीवन की मांग लंबे समय से उठाई जा रही है। दो साल पहले लोगों ने जनजागरण भी किया था। अब जब लॉकडाउन के चरण में मनरेगा से गांवों में ज्यादा से ज्यादा रोजगार की योजना बन रही है। ऐसे समय में करद में बेलद नदी के उत्पत्ति स्थल पर शुरू होने वाले खुदाई कार्य को नदी के पुनर्जीवन और पुरातात्विक विरासत दोनों लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
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सोमवार को भूमिपूजन कर कार्य की आधारशिला रखी जाएगी। दो-तीन दिन में खुदाई कार्य शुरू हो जाएगा। फिलहाल दो से तीन माह तक खुदाई कार्य चलाए जाने की योजना है।
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-अजय कुमार द्विवेदी, सीडीओ सोनभद्र।
जनपदवासियों के लिए खुशी का क्षण है। जिले में पुरातात्विक और पौराणिक महत्व की ढेरों धरोहर हैं। उसमें अति महत्वपूर्ण बेलन नदी के उत्पत्ति स्थल की खुदाई नदी को पुनर्जीवन देगी। वहीं सिंचाई, जल संकट जैसी समस्याओं से राहत और पुरातात्विक समृद्धि को मजबूती मिलेगी।
- रवि प्रकाश चौबे, संयोजक गुप्त काशी ट्रस्ट।
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