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Sonebhadra News: अद्भुत है 1250 किलो सोने से बनी बंशीधर की प्रतिमा, खोदाई में मिली थी

Sun, 25 Aug 2024 10:38 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Sun, 25 Aug 2024 10:38 PM IST
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Amazing statue of Banshidhar made of 1250 kg gold, found during excavation
सोनभद्र के विंढमगंज कस्बा से महज 10 किमी की दूरी पर झारखंड राज्य की सीमा पर बांकी नदी के किनारे बंशीधर का ऐतिहासिक मंदिर स्थित है। इस मंदिर में स्थापित भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा 32 मन सोने (करीब साढ़े 1250 किलोग्राम) से निर्मित है।
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बंशीधर की इस प्रतिमा का दिव्य दर्शन भक्तों को निहाल कर देता है। हर साल जन्माष्टमी पर यहां दर्शन-पूजन के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं। यहां भगवान श्रीकृष्ण की करीब साढ़े चार फीट ऊंची प्रतिमा है।
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इस प्रतिमा में भगवान श्रीकृष्ण जमीन में काफी नीचे तक धंसे शेषनाग के फन पर निर्मित 24 पंखुड़ियों वाले विशाल कमल पुष्प पर विराजमान हैं। उनके बगल में ही श्रीराधारानी की अष्टधातु की प्रतिमा भी स्थापित है।
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भगवान श्रीकृष्ण की इस प्रतिमा पर आज तक किसी तरह का पॉलिश नहीं किया गया है। बावजूद प्रतिमा की चमक धूमिल नहीं हुई है। आमतौर पर पहले मंदिर बनता है, इसके बाद देवी-देवताओं की प्रतिमा स्थापित की जाती है, पर यहां पहले भगवान श्रीकृष्ण आए, इसके बाद मंदिर का निर्माण हुआ।
मंदिर के नाम पर झारखंड सरकार ने शहर का नाम श्रीबंशीधर नगर कर दिया। मंदिर के प्रस्तर लेख और पुजारी स्व. सिद्धेश्वर तिवारी की लिखित पुस्तक के अनुसार संवत 1885 में श्रीकृष्ण की अनन्य भक्त नगर गढ़ के महाराज स्व. भवानी सिंह की विधवा रानी शिवमणि देवी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी को उपवास रखकर भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लीन थीं।

आधी रात में भगवान श्रीकृष्ण ने रानी के स्वप्न में आकर दर्शन दिए और रानी के आग्रह पर नगर उंटारी लाने की अनुमति दी। रानी अपने लाव लश्कर के साथ करीब 20 किमी पश्चिम सीमावर्ती उत्तर प्रदेश के दुद्धी थाना क्षेत्र के शिवपहरी नामक पहाड़ी पर पहुंचीं और स्वयं फावड़ा चलाकर खोदाई शुरू की।

खोदाई के दौरान श्रीकृष्ण की यह दिव्य प्रतिमा प्राप्त हुई। इस प्रतिमा को हाथी से नगर उंटारी लाया गया। इतिहासकारों का मानना है कि यह प्रतिमा मराठा शासकों के द्वारा बनवाई गई होगी। उन्होंने वैष्णव धर्म का काफी प्रचार प्रसार किया था और मूर्तियां भी बनवाई थीं। मुगलों के आक्रमण से बचाने के लिए मराठों ने इस प्रतिमा को शिवपहरी नामक पहाड़ी के अंदर छुपा दिया होगा।
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