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Sonebhadra News: भोलेनाथ के आंगन में बरसे अबीर-गुलाल, भक्तों ने खेली होली

Mon, 10 Mar 2025 10:59 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Mon, 10 Mar 2025 10:59 PM IST
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Abeer-gulal rained in the courtyard of Bholenath, devotees played Holi
सोनभद्र/घोरावल। रंगभरी एकादशी पर सोमवार को भक्तों ने भगवान शिव और माता पार्वती के साथ हाेली खेली। मंदिरों में पहुंचकर उन्हें अबीर-गुलाल लगाए और कीर्तन-भजन किया। इस दौरान प्रभु का आकर्षक श्रृंगार भी किया गया। देर रात तक भक्ति गीतों पर भक्त झूमते रहे।
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रॉबर्ट्सगंज के पुरानी सब्जी मंडी स्थित दुग्धेश्वर महादेव मंदिर में देर शाम हुए कार्यक्रम में शिव परिवार की मूर्ति का भव्य श्रृंगार किया गया। इसके बाद महिलाओं ने होली गीत गाए।
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भजन संध्या का समापन महिलाओं ने एक-दूसरे को अबीर गुलाल लगाकर की। गोविंद केशरी ने शिव परिवार की दिव्य आरती की। इस अवसर पर उमा केशरी, प्रतिभा देवी, सपना, किरण देवी, सीमा, बीना केशरी, श्वेता, पूजा, सरिता, रीता, बबीता, निशु आदि मौजूद रहे। उधर, घोरावल स्थित गुप्तकाशी शिवद्वार धाम में रंगभरी एकादशी पर श्रद्धालुओं ने उमामहेश्वर को अबीर गुलाल लगाकर उनका आशीर्वाद लिया। इस अवसर पर श्रीउमामहेश्वर की प्रतिमा, ज्योतिर्लिंग, श्रीगणेश जी, श्रीहनुमानजी, श्रीनंदीश्वर और अन्य प्रतिमाओं का अबीर, गुलाल, फूल, माला, बेलपत्र से श्रृंगार किया गया। मुख्य पुजारी सुरेश गिरि ने बताया कि रंगभरी एकादशी को भगवान शिवशंकर एवं माता पार्वती का गौना हुआ था। इस उपलक्ष्य में प्रतिवर्ष फाल्गुन मास में रंगभरी एकादशी के दिन भक्त भगवान भोलेनाथ और माता जगदंबा को अबीर गुलाल लगाते हैं। देर शाम तक चले पूजन और मंगला आरती के बाद भक्तों को प्रसाद वितरित किया गया। इस मौके पर रामसूचित गिरि, अजय गिरि, शिवराज गिरि, संजय मोदनवाल, अरविंद गिरि, मोनू गिरि आदि मौजूद रहे।
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जमकर खेली होली, उड़ाया अबीर-गुलाल
बभनी/विंढमगंज। रंगोत्सव की परंपराएं अनूठी हैं। सोमवार को कहीं रंगभरी एकादशी मनाई तो आदिवासी अंचल के गांवों ने रंग-अबीर के साथ होली खेली। अलग-अलग मान्यताओं के चलते रविवार की रात होलिका दहन किया गया और सोमवार की सुबह होलिका की राख उड़ाते हुए जमकर होली खेली गई। इस दौरान सुरक्षा को लेकर जिम्मेदार चौकन्ने रहे।

बभनी के मगरमांड गांव में ग्राम देवता के प्रकोप से बचने के लिए ग्रामीण चार दिन पहले ही रंगों का त्योहार होली मना लेते हैं। वर्षों से चली आ रही इस परंपरा का निर्वहन करते हुए ग्रामीणों ने रविवार की रात होलिका दहन किया। फाग, चौताल गाए। सोमवार की सुबह से ही मानर की थाप गांव में गूंजती रही। गांव के रामसुंदर, रामचंद्र, लालशाह, हूबलाल, जगनरायन, कामेश्वर, जयसिंह, मुनदेव, रामखेलावन, प्रदीप कुमार आदि ने बताया कि गांव की जो बेटियां ससुराल जा चुकी होती हैं, वे भी अपने मायके आकर होली मनाती हैं। ग्रामीणों के मुताबिक सालों पहले होली के दिन कोई विपदा आई थी, इसके बाद ग्राम देवता को मनाया गया और तभी से चार दिन पहले होली मनाने की परंपरा शुरू हुई। उधर, विंढमगंज के बैरखड़ गांव में भी सोमवार को होली मनाई गई। रविवार की रात परंपरानुसार होलिका जलाई गई। निवर्तमान ग्राम प्रधान उदय पाल कहते हैं कि गांव में जिंदा होली मनाने की परंपरा काफी पुरानी है। गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि बहुत पहले एक बार गांव में भारी धन जन की क्षति हुई थी। महामारी जैसी स्थिति हो गई थी। उसका निदान ढूंढने के लिए आदिवासियों ने काफी पहल की। सर्वसम्मति से चार-पांच दिन पहले होली मनाने का निर्णय लिया गया। मानर की थाप पर थिरकते हुए मनरूप गहवां, छोटेलाल सिंह, रामकिशुन सिंह, लालमोहन गोंड ने बताया कि होलिका दहन के अगले दिन यानि सोमवार को होलिका दहन के अवशेष को उड़ाते हुए दिनभर होली खेलते हुए अपने ईष्ट देव की आराधना एवं पूजा की गई।
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