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जहरीली आबोहवा जिंदगी पर पड़ रही भारी
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सोनभद्र। एनजीटी की सख्ती, केंद्र सरकार की तरफ से एयर क्लीन प्रोग्राम लागू करने के बाद भी सोनभद्र-सिंगरौली में वायु प्रदूषण कम होने का नाम नहीं ले रहा है। मई में तीखी धूप, ज्यादातर समय आसमान स्वच्छ होने के बाद भी एक्यूआई (वायु गुणवत्ता सूचकांक) उच्च स्तर पर बना हुआ है। 17 मई को जहां गर्मी के सीजन का अब तक का अधिकतम एक्यूआई 359 दर्ज किया गया। वहीं सोमवार को भी यह आंकड़ा 264 बना रहा। हृदय रोगियों, श्वांस रोगियों और किडनी रोगियों के लिए यह स्थिति काफी खतरनाक मानी जाती है।
हवा-मिट्टी, पानी में मरकरी, फ्लोराइड, आर्सेनिक जैसे खतरनाक तत्वों की अधिकता का दंश झेल रहे सोनांचल में वायु प्रदूषण का लगातार खतरनाक स्तर बना हुआ है। घने कोहरे के सीजन के समय गत 13 दिसंबर को जहां एयर क्वालिटी इंडेक्स 370 दर्ज किया गया था। वहीं तेज धूप के समय अप्रैल में यह अधिकतम 343 और मई में अब तक के आंकड़े में अधिकतम 359 दर्ज किया गया है। सामान्यतया सर्दी के मुकाबले गर्मी के मौसम को वायु प्रदूषण के लिहाज से काफी सुकूनदेह माना जाता है लेकिन जिले में सड़क मार्ग से होता कोयला परिवहन, सोनभद्र और इससे सटे सिंगरौली में रोजाना 21 हजार मेगावाट बिजली उत्पादन के लिए सवा तीन लाख टन कोयला जलाया जाता है, इसके चलते रोजाना बिजलीघरों से निकली एक लाख टन से अधिक राख वायु प्रदूषण का बड़ा कारण बनी हुई है। विशेषज्ञों के मुताबिक सड़क पर वाहनों की बढ़ती संख्या, जगह-जगह टूटी सड़कें भी वायु प्रदूषण को बढ़ावा दिए हुए हैं। बताते चलें कि इस स्थिति को लंग कैंसर, श्वांस संबंधी बीमारी, एलर्जी, किडनी की बीमार का प्रमुख कारण माना जाता है। बावजूद इस स्थित पर न तो अब तक प्रभावी अंकुश लग पाया है, ना ही प्रभावितों के चिकित्सा के लिए ही मुकम्मल इंतजाम किए जा सके हैं। बता दें कि एनजीटी की तरफ से मरकरी के प्रभाव के विस्तृत अध्ययन के लिए केंद्र स्थापित करने, अत्याधुनिक सुविधा युक्त अस्पताल स्थापित कर विशेषज्ञ चिकित्सकों की तैनाती के निर्देश दिए गए हैं, लेकिन इसकी कवायद अब तक सिर्फ फाइलों में उलझी पड़ी है।
मौसमवार बढ़ती-घटती रहती है सूक्ष्म कणों की मात्रा
सोनभद्र। जिले में प्रदूषण पर लंबे समय तक शोध कर चुके पर्यावरण वैज्ञानिक डा. अनिल गौतम बताते हैं कि चाहे सर्दी का मौसम हो या तपिश। दोनों मौसम में यहां प्रदूषण की गंभीर समस्या बनी रहती है। सर्दी के मुकाबले गर्मी में पीएम10 (पार्टिकुलेट मैटर) की अधिकता पर बताया कि इस समय धूल भरी हवाएं चलती हैं। इस कारण पीएम2.5 के मुकाबले इसकी मात्रा बढ़ जाती है। बताते चलें कि हवा में 10माइक्रान के सूक्ष्मकणों की मौजूदगी को पीएम10 के रूप में और 2.5 माइक्रान के सूक्ष्म कणों को पीएम2.5 के रूप में मापा जाता है।
हवा-मिट्टी, पानी में मरकरी, फ्लोराइड, आर्सेनिक जैसे खतरनाक तत्वों की अधिकता का दंश झेल रहे सोनांचल में वायु प्रदूषण का लगातार खतरनाक स्तर बना हुआ है। घने कोहरे के सीजन के समय गत 13 दिसंबर को जहां एयर क्वालिटी इंडेक्स 370 दर्ज किया गया था। वहीं तेज धूप के समय अप्रैल में यह अधिकतम 343 और मई में अब तक के आंकड़े में अधिकतम 359 दर्ज किया गया है। सामान्यतया सर्दी के मुकाबले गर्मी के मौसम को वायु प्रदूषण के लिहाज से काफी सुकूनदेह माना जाता है लेकिन जिले में सड़क मार्ग से होता कोयला परिवहन, सोनभद्र और इससे सटे सिंगरौली में रोजाना 21 हजार मेगावाट बिजली उत्पादन के लिए सवा तीन लाख टन कोयला जलाया जाता है, इसके चलते रोजाना बिजलीघरों से निकली एक लाख टन से अधिक राख वायु प्रदूषण का बड़ा कारण बनी हुई है। विशेषज्ञों के मुताबिक सड़क पर वाहनों की बढ़ती संख्या, जगह-जगह टूटी सड़कें भी वायु प्रदूषण को बढ़ावा दिए हुए हैं। बताते चलें कि इस स्थिति को लंग कैंसर, श्वांस संबंधी बीमारी, एलर्जी, किडनी की बीमार का प्रमुख कारण माना जाता है। बावजूद इस स्थित पर न तो अब तक प्रभावी अंकुश लग पाया है, ना ही प्रभावितों के चिकित्सा के लिए ही मुकम्मल इंतजाम किए जा सके हैं। बता दें कि एनजीटी की तरफ से मरकरी के प्रभाव के विस्तृत अध्ययन के लिए केंद्र स्थापित करने, अत्याधुनिक सुविधा युक्त अस्पताल स्थापित कर विशेषज्ञ चिकित्सकों की तैनाती के निर्देश दिए गए हैं, लेकिन इसकी कवायद अब तक सिर्फ फाइलों में उलझी पड़ी है।
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मौसमवार बढ़ती-घटती रहती है सूक्ष्म कणों की मात्रा
सोनभद्र। जिले में प्रदूषण पर लंबे समय तक शोध कर चुके पर्यावरण वैज्ञानिक डा. अनिल गौतम बताते हैं कि चाहे सर्दी का मौसम हो या तपिश। दोनों मौसम में यहां प्रदूषण की गंभीर समस्या बनी रहती है। सर्दी के मुकाबले गर्मी में पीएम10 (पार्टिकुलेट मैटर) की अधिकता पर बताया कि इस समय धूल भरी हवाएं चलती हैं। इस कारण पीएम2.5 के मुकाबले इसकी मात्रा बढ़ जाती है। बताते चलें कि हवा में 10माइक्रान के सूक्ष्मकणों की मौजूदगी को पीएम10 के रूप में और 2.5 माइक्रान के सूक्ष्म कणों को पीएम2.5 के रूप में मापा जाता है।
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