फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Sonebhadra News ›   ज्वालामुखी देवी

ज्वालामुखी देवी

Thu, 11 Oct 2018 10:49 PM IST
Updated Thu, 11 Oct 2018 10:49 PM IST
विज्ञापन
ज्वालामुखी देवी

विज्ञापन
शक्तिनगर। क्षेत्र में स्थित ज्वालादेवी मंदिर का पौराणिक इतिहास रहा है। यूपी के साथ मप्र, छत्तीसगढ़, बिहार, व झारखंड के सीमावर्ती इलाके के लाखों श्रद्वालु शारदीय व चैत्र नवरात्र के साथ सालभर दर्शन पूजन करते है। पौराणिक कथा के अनुसार इस स्थान पर मां सती के जिह्वा का अग्र भाग कट कर गिरा था। कई सालों से जल रही अखंड ज्योति भी श्रद्घा का केंद्र बनी है।
पौराणिक एवं धार्मिक महत्ता के साथ आस्था केंद्र शक्तिपीठ मां ज्वालामुखी मंदिर में आदिकाल से परिक्षेत्र के वनवासी, गिरवासी व आदिवासियों की पूजित देवी रही हैं। पौराणिक कथा के अनुसार प्रजापति दक्ष ने बृहस्पति शव नाम के यज्ञ का अनुष्ठान किया जिसमें सभी देवता यक्ष किन्नर गंधर्व को आमंत्रित किया गया किंतु देवाधिदेव शिव को न तो आमंत्रित किया गया ना तो उनका स्थान ही रखा गया। पिता के यहां यज्ञ की सूचना पाकर सती बिना महादेव की अनुमति के पिता के यहां चली गई। राजा दक्ष की यज्ञ स्थल पर शिव स्थान न देख एवं शिव की निंदा सुनकर उन्होंने अपने शरीर को यज्ञ कुंड में आहूत कर दिया। सूचना पर पहुंचे भगवान शिव ने उनके शरीर को अपने कंधे पर लेकर उन्मुक्त भाव से त्रिलोक में घूमने लगी। इस दौरान सती के शरीर के खंड व आभूषण जिन जिन स्थानों पर गिरे उन्ही स्थानों को शक्तिपीठ कहा गया।
विज्ञापन

ज्वालादेवी शक्तिपीठ के तीर्थ पुरोहितों के अनुसार शक्ति स्वरूपा मां भगवती के जीभ के अग्रभाग का छोटा सा हिस्सा सिंगरौली के रानीबारी नामक गांव में गिरा था जो बाद में चलकर ज्वालामुखी मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। पुजारियों ने पौराणिक कथाओं का जिक्र करते हुए बताया कि श्रृंगी ऋषि की तपोस्थली सिंगरौली राज्य के कुंवर उदित नारायण सिंह गहरवार को मां ज्वाला देवी ने स्वप्न दिया था। सपने में देवी ने कहा कि हे राजन तुम्हारे राज्य की राजधानी गहरवार समीप रानी बारी गांव में नीम और बेल के जंगल में मेरी प्रतिभा पड़ी है जिसकी तुम आराधना करो, तुम्हारे राज्य में सुख शांति और समृद्धि होगी तथा तुम्हारे राज्य का यश पूरे विश्व में फैले गा प्रेरणा स्वरूप राजा ने खोज कराया और प्रतिमा को प्राप्त किया राजा प्रतिमा को लेकर अपने राजधानी की ओर जाना चाहते थे काफी प्रयास के बाद राजा प्रतिमा को ले जाने में असफल रहे तब राजपूतों के सुझाव से मां ज्वाला देवी का स्थापना कराया गया। चैत्र शुक्ल पक्ष रामनवमी के दिन मंदिर का जीर्णोद्धार करते हुए मां की प्रतिमा को स्थापित कर विधि विधान से पूजा किया गया काशी के विद्वान पंडित तीर्थ पुरोहित गंगाधर मिश्र की नियुक्ति मठपति के रूप में किया गया तभी से प्रति वर्ष चैत्र रामनवमी में एक माह का विशाल मेला के साथ चैत्र व शारदीय नवरात्र में भक्तों का तांता लगता है। इस दौरान लाखों श्रद्धालु नारियल, चुनरी माला फूल चढ़ाकर मनचाहा फल प्राप्त करते हैं। नवरात्र के दौरान मां के भक्त जवारी जुलूस लेकर हाथों में जवार, मशाल, त्रिशूल, खप्पर व तलवार इत्यादि के साथ ढोल मजीरा के साथ नाचते गाते देवी दर्शन को आते हैं
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed