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फौलादी इरादों से तोड़ा मुश्किलों का पहाड़
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यात्रीकर अधिकारी शैहफर किदवई।
- फोटो : SITAPUR
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सीतापुर। वक्त से लड़कर जो नसीब बदल दे, इंसान वही जो अपनी तकदीर बदल दे... कल क्या होगा कभी मत सोचो, क्या पता कल वक्त खुद अपनी तस्वीर बदल दे। जी हां, यह बात जिले की कई अफसर बेटियों पर बिल्कुल सटीक बैठ रही है, जिन्होंने फौलादी इरादों से मुश्किलों का ‘पहाड़’ गिराकर कामयाबी का रास्ता तैयार कर लिया। आज ये बेटियां किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। कामयाबी के लिए संघर्ष कर रहीं जिले की कई बेटियों के लिए प्रेरणादायक हैं।
मेहनत पर भरोसा कर कामयाबी के शिखर पर पहुंचने का ये जज्बा उन महिलाओं में हैं, जिन्हें समाज अबला, बेचारी और कमजोर कहता रहा है, लेकिन अब यह सारी बातें आज की नारी के जज्बे और हौसले के आगे हार चुकी हैं। समय के साथ तेजी से बेटियों की सोच बदली है। इन्होंने संघर्ष को अपनी ताकत बनाई है। मां-बाप के सपनों को पूरा कर अपने अरमानों को भी साकार किया है। पेश है एक रिपोर्ट-
मां बनी प्रेरणादायक, पति ने दिया साथ
एआरटीओ प्रशासन के पद पर माला बाजपेयी तैनात हैं। वे मूल रूप से रायबरेली की रहने वाली हैं। वे बताती हैं कि उन्होंने टीचिंग से अपने कॅरिअर की शुरुआत की थी। स्नातक की पढ़ाई के बाद नौकरी में आ गईं थीं। इसके बाद शादी हो गई। शादी के बाद जीवन में कई खुशियां आईं। जिला लेखाधिकारी के पद पर चयन हो गया। 2011 तक इस पद के दायित्वों को संभाला।
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इसके बाद 2011 में पीसीएस की परीक्षा पास कर एआरटीओ बन गईं। वे बताती हैं कि उनकी इस कामयाबी के पीछे मां और पति का बहुत सहयोग है। मां प्रेरणादायक हैं। मां लगातार पढ़ने पर फोकस करती थीं। वह बताती हैं कि जैसे पुरुषों की कामयाबी के पीछे महिला का हाथ होता है, वैसे ही उनकी तरक्की में उनके पति का हाथ है।
बेटियों को नहीं माननी चाहिए हार
जिले में यात्रीकर अधिकारी की जिम्मेदारी सैफर किदवई संभाल रहीं हैं। उनकी कहानी संघर्षों भरी है। वे तीन बहनें है। भाई नहीं हैं। वे बताती हैं कि उनकी शुरुआती शिक्षा लखनऊ के एक कॉलेज से हुई, लेकिन घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। पिता हसीन अहमद किदवई बिल्डर के साथ काम करते थे। माता सुरैया किदवई धागा बनाने वाली एक कंपनी में काम करती थीं।
पढ़ाई के समय पैसों को लेकर कई बार समस्याएं खड़ी हुईं, लेकिन माता-पिता ने एक बेटी को कामयाब बनाने के लिए सारे प्रयास किए, जिससे पढ़ाई में रुकावट न आए। मां-बाप हौसला बढ़ाते गए। मां-बाप का सपना था कि बेटी सरकारी अफसर बने। सैफर किदवई बताती हैं कि मां-बाप के सपनों को पूरा करने के लिए उन्होंने जी जान लगा दिया। दूरदर्शन में भी काम किया। ट्यूशन भी पढ़ाया। वह कहती हैं कि बेटियों को हार नहीं माननी चाहिए।
मां और अधिकारी दोनों का निभा रहीं फर्ज
एलआईयू इंस्पेक्टर अपाला सिंह पर पुलिस की नौकरी के साथ घर की जिम्मेदारियां भी हैं। दोनों ही जिम्मेदारियों को वह बखूबी निभा रहीं हैं। सबसे खास बात यह है कि दोनों ही जिम्मेदारियों में वह किसी तरह की समस्याओं को हावी नहीं होने देती हैं।
वे बताती हैं कि सुबह से शाम तक पुलिस की नौकरी में व्यस्तता रहती है, लेकिन घर पहुंचने पर ड्यूटी का तनाव बच्चों पर बिल्कुल नहीं नजर आने देती हैं। घर में वह एक मां का फर्ज भी बखूबी निभाती हैं। उनका कहना है कि दोनों जगहों पर तालमेल बिठाने में दिक्कतें आती हैं, लेकिन मैनेज करती हैं। वह बताती हैं कि युवतियों को अपना लक्ष्य साधकर आगे बढ़ना चाहिए। कामयाबी जरूर मिलेगी।
सात समंदर पार बजाया डंका
महमूदाबाद की एक होनहार बेटी वासव दत्ता ने सात समंदर पार जिले का डंका बजाया है। महमूदाबाद के वार्ड बीबीपुर निवासी डॉक्टर सुधाकर तिवारी की बेटी वासव दत्ता अमेरिका के टेक्सास शहर में एक कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं। वासव दत्ता से फोन पर बात की गई। उन्होंने कहा कि उनके पिता, माता, भाई बहन ने शिक्षा पर पूरा ध्यान दिया।
इलाहाबाद में बीटेक के दौरान उनका चयन 2006 में बंगलुरु में परियोजना अधिकारी के रूप में हुआ। 2012 में बनारस के रहने वाले राहुल झा से शादी हो गई। वह बताती हैं कि महिलाएं हर क्षेत्र में नाम रोशन कर रही है। उनका मानना है कि लगन और मेहनत से अगर कोई भी काम किया जाए तो वह जाया नहीं जाता।
अधिकारी बन पिता के सपनों को किया पूरा
कहते हैं कि कुछ कर गुजरने का जज्बा हो तो नामुमकिन कुछ भी नहीं है। महमूदाबाद नगर के नई बाजार उत्तरी वार्ड निवासी सुरेंद्र विश्वकर्मा हारमोनियम बनाने का काम करते आ रहे हैं। संगीत को मधुरता देने वाली हरमोनियम बनाकर सुरेंद्र अपनी चार संतानों के साथ परिवार का पेट भी पालते रहे। पिता की मेहनत को उनकी बेटी निहारिका विश्वकर्मा ने व्यर्थ नहीं किया। निहारिका ने जी जान लगाकर मेहनत कर पढ़ाई की और जिला कार्यक्रम अधिकारी बनकर पिता के सपनों को पूरा कर दिया।
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मेहनत पर भरोसा कर कामयाबी के शिखर पर पहुंचने का ये जज्बा उन महिलाओं में हैं, जिन्हें समाज अबला, बेचारी और कमजोर कहता रहा है, लेकिन अब यह सारी बातें आज की नारी के जज्बे और हौसले के आगे हार चुकी हैं। समय के साथ तेजी से बेटियों की सोच बदली है। इन्होंने संघर्ष को अपनी ताकत बनाई है। मां-बाप के सपनों को पूरा कर अपने अरमानों को भी साकार किया है। पेश है एक रिपोर्ट-
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मां बनी प्रेरणादायक, पति ने दिया साथ
एआरटीओ प्रशासन के पद पर माला बाजपेयी तैनात हैं। वे मूल रूप से रायबरेली की रहने वाली हैं। वे बताती हैं कि उन्होंने टीचिंग से अपने कॅरिअर की शुरुआत की थी। स्नातक की पढ़ाई के बाद नौकरी में आ गईं थीं। इसके बाद शादी हो गई। शादी के बाद जीवन में कई खुशियां आईं। जिला लेखाधिकारी के पद पर चयन हो गया। 2011 तक इस पद के दायित्वों को संभाला।
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इसके बाद 2011 में पीसीएस की परीक्षा पास कर एआरटीओ बन गईं। वे बताती हैं कि उनकी इस कामयाबी के पीछे मां और पति का बहुत सहयोग है। मां प्रेरणादायक हैं। मां लगातार पढ़ने पर फोकस करती थीं। वह बताती हैं कि जैसे पुरुषों की कामयाबी के पीछे महिला का हाथ होता है, वैसे ही उनकी तरक्की में उनके पति का हाथ है।
बेटियों को नहीं माननी चाहिए हार
जिले में यात्रीकर अधिकारी की जिम्मेदारी सैफर किदवई संभाल रहीं हैं। उनकी कहानी संघर्षों भरी है। वे तीन बहनें है। भाई नहीं हैं। वे बताती हैं कि उनकी शुरुआती शिक्षा लखनऊ के एक कॉलेज से हुई, लेकिन घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। पिता हसीन अहमद किदवई बिल्डर के साथ काम करते थे। माता सुरैया किदवई धागा बनाने वाली एक कंपनी में काम करती थीं।
पढ़ाई के समय पैसों को लेकर कई बार समस्याएं खड़ी हुईं, लेकिन माता-पिता ने एक बेटी को कामयाब बनाने के लिए सारे प्रयास किए, जिससे पढ़ाई में रुकावट न आए। मां-बाप हौसला बढ़ाते गए। मां-बाप का सपना था कि बेटी सरकारी अफसर बने। सैफर किदवई बताती हैं कि मां-बाप के सपनों को पूरा करने के लिए उन्होंने जी जान लगा दिया। दूरदर्शन में भी काम किया। ट्यूशन भी पढ़ाया। वह कहती हैं कि बेटियों को हार नहीं माननी चाहिए।
मां और अधिकारी दोनों का निभा रहीं फर्ज
एलआईयू इंस्पेक्टर अपाला सिंह पर पुलिस की नौकरी के साथ घर की जिम्मेदारियां भी हैं। दोनों ही जिम्मेदारियों को वह बखूबी निभा रहीं हैं। सबसे खास बात यह है कि दोनों ही जिम्मेदारियों में वह किसी तरह की समस्याओं को हावी नहीं होने देती हैं।
वे बताती हैं कि सुबह से शाम तक पुलिस की नौकरी में व्यस्तता रहती है, लेकिन घर पहुंचने पर ड्यूटी का तनाव बच्चों पर बिल्कुल नहीं नजर आने देती हैं। घर में वह एक मां का फर्ज भी बखूबी निभाती हैं। उनका कहना है कि दोनों जगहों पर तालमेल बिठाने में दिक्कतें आती हैं, लेकिन मैनेज करती हैं। वह बताती हैं कि युवतियों को अपना लक्ष्य साधकर आगे बढ़ना चाहिए। कामयाबी जरूर मिलेगी।
सात समंदर पार बजाया डंका
महमूदाबाद की एक होनहार बेटी वासव दत्ता ने सात समंदर पार जिले का डंका बजाया है। महमूदाबाद के वार्ड बीबीपुर निवासी डॉक्टर सुधाकर तिवारी की बेटी वासव दत्ता अमेरिका के टेक्सास शहर में एक कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं। वासव दत्ता से फोन पर बात की गई। उन्होंने कहा कि उनके पिता, माता, भाई बहन ने शिक्षा पर पूरा ध्यान दिया।
इलाहाबाद में बीटेक के दौरान उनका चयन 2006 में बंगलुरु में परियोजना अधिकारी के रूप में हुआ। 2012 में बनारस के रहने वाले राहुल झा से शादी हो गई। वह बताती हैं कि महिलाएं हर क्षेत्र में नाम रोशन कर रही है। उनका मानना है कि लगन और मेहनत से अगर कोई भी काम किया जाए तो वह जाया नहीं जाता।
अधिकारी बन पिता के सपनों को किया पूरा
कहते हैं कि कुछ कर गुजरने का जज्बा हो तो नामुमकिन कुछ भी नहीं है। महमूदाबाद नगर के नई बाजार उत्तरी वार्ड निवासी सुरेंद्र विश्वकर्मा हारमोनियम बनाने का काम करते आ रहे हैं। संगीत को मधुरता देने वाली हरमोनियम बनाकर सुरेंद्र अपनी चार संतानों के साथ परिवार का पेट भी पालते रहे। पिता की मेहनत को उनकी बेटी निहारिका विश्वकर्मा ने व्यर्थ नहीं किया। निहारिका ने जी जान लगाकर मेहनत कर पढ़ाई की और जिला कार्यक्रम अधिकारी बनकर पिता के सपनों को पूरा कर दिया।