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सीतापुर की भूलभुलैया को भूल गई सरकार

Sun, 17 Apr 2016 11:02 PM IST
Amarujala Bureau
Amarujala Bureau Updated Sun, 17 Apr 2016 11:02 PM IST
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sitapur bhoolbhuliya forgeting
जर्जर हालत में पहुंच गई सीतापुर की भूलभुलैया। - फोटो : अमर उजाला
अपने अतीत में सीतापुर कई ऐतिहासिक धरोहरों को संजोये है। देखरेख के अभाव में ये धरोहर बदहाली का शिकार होते जा रहे हैं। राजतंत्र के दौर की इमारतें और आजादी मिलने के बाद स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की याद में बनवाए गए शहीद स्तंभ जीर्ण-शीर्ण हालत में पहुंच चुके हैं।
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देश में पर्यटन को बढ़ावा देने तथा ऐतिहासिक इमारतों को सहेजने की अलख जगाने के लिए 18 अप्रैल को ‘वर्ल्ड हैरिटेज डे’ मनाया जाता है, लेकिन सीतापुर में यह आयोजन महज कागजों तक सीमित है। यहां की ऐतिहासिक इमारतें, स्तंभ और स्मारकों के प्रति शासन-प्रशासन पूरी तरह से उदासीन है। भावी पीढ़ी इनका इतिहास भूलती जा रही है। सीतापुर के इन धरोहरों के नाम भी लखनऊ में मौजूद विश्व प्रसिद्ध धरोहरों की तरह ही हैं पर सरकारी उपेक्षा के चलते कोई इन्हें नहीं जानता।
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उपेक्षित लालबाग का शहीद स्तंभ 
शहर का जलियांवाला बाग (लालबाग का शहीद पार्क) मौजूदा वक्त में बेहद खस्ताहाल हो चुका है। यह वही धरती है, जहां 18 अगस्त 1942 को बितानिया हुकूमत के खिलाफ  आजादी के दीवानों ने मोर्चा खोला था। जिससे तिलमिलाई ब्रिटिश सरकार के नुमांदों ने उन पर ताबड़तोड़ गोलियां चलवा दीं।
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इस गोलीकांड में मुन्ना लाल मिश्र, चंद्रभाल मिश्र, रघुवर दयाल, बाबूराम, मैकूलाल, मोहर्रम अली के साथ 10 साल का बालक कल्लूराम शहीद हो गए थे। जबकि दर्जनों स्वतंत्रता संग्राम सेनानी जख्मी हुए थे। शहीदों के खून से लाल इस धरती पर उनकी याद में शहीद स्तंभ बनवाया गया। उपेक्षा के चलते आज यह स्तंभ बदहाली की कगार पर है। 

खंडहर होती जा रही शिक्षाविद की जन्मस्थली 
सीतापुर की माटी में जन्में आचार्य नरेंद्र देव ने पूरी दुनिया में समाजवाद का झंडा बुलंद किया। महान शिक्षाविद तथा आजादी की लड़ाई के महानायक आचार्य नरेंद्र देव का जन्म शहर के तामसेनगंज में स्थित ‘मुरली निवास‘ में हुआ था। यह कोठी आज देखरेख के अभाव में खंडहर होती जा रही है।

पेक्षा का आलम यह कि महान शिक्षाविद की जन्म स्थली में आज तक उनकी एक अदद प्रतिमा तक नहीं लगवाई जा सकी है। शासन-प्रशासन के अलावा किसी स्वयं सेवी संस्था को भी ‘मुरली निवास’ की सुध नहीं आई है। 

अस्तित्व बचाने की जद्दोजहद में इमामबाड़ा
इतिहास के पन्नों में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज खैराबाद का इमामबाड़ा आज अपना अस्तित्व बचाने की जद्दोजहद कर रहा है। बेहतरीन नक्काशी की बेजोड़ मिसाल बने इस इमामबाडे़ का निर्माण नवाब आसिफुद्दौला ने सन् 1838 में कराया था। बुजुर्ग बताते हैं कि नवाब साहब ने अपनी शेरवानी व टोपी की बेहतरीन सिलाई से खुश होकर ‘मक्का दर्जी’ के लिए यह इमामबाड़ा बनवाया था। अनूठी कलाकारी की झलक पेश करती यह ऐतिहासिक इमारत आज बदहाल होती जा रही है।


भूलभुलैया को भूली सरकार
खैराबाद की भूलभुलैया भी उपेक्षा का दंश झेल रही है। शासन-प्रशासन की उदासीनता का आलम यह है, कि पिछले दो दशकों से यहां कोई झांकने तक नहीं पहुंचा है। अपनी खूबसूरती के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध मुगलकाल की इस भूलभुलैया की तुलना लखनऊ के भूलभुलैया से की जाने लगी। इसका निर्माण नवाब आसिफुद्दौला ने कराया था। उपेक्षा से बदहाल होती जा रही भूलभुलैया को अब बंद कर दिया गया है। 
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