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पचीसा गांव पर मंडरा रहा अस्तित्व का संकट
सीतापुर
Updated Mon, 05 Sep 2016 11:32 PM IST
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सीतापुर के रेउसा इलाके में कटान करती घाघरा नदी।
- फोटो : अमर उजाला
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घाघरा नदी के टापू पर बसे पचीसा गांव के अस्तित्व पर अब संकट के बादल मंडराने लगे हैं। यहां पर नदी तेजी से कटान कर रही है, टापू का 60 प्रतिशत हिस्सा हाल ही में कटकर बह गया है, जो बचा है, उस पर भी घाघरा नदी का कहर टूट रहा है। यह टापू करीब चार किलोमीटर चौड़ा था।
जिस पर 300 के आसपास परिवार बसे हुए हैं। इसी टापू पर खेती और इसी टापू पर उनका घर था। इस बार नदी ने टापू पर जबरदस्त तरीके से कटान की है। उधर प्रशासन घाघरा नदी का पानी घटने के बाद पूरी तरह से बेफिक्र हो गया है।
गांव के रामसिंह, पप्पू, रामलाल, जयपाल आदि ग्रामीणों का कहना है कि नदी का कहर इस कदर बरपा कि, यहां बसे करीब 150 परिवारों को तीन बार अपने स्थान बदलने पड़े। पहले नदी ने काटा, तो पीड़ित परिवारों ने दूसरे स्थान पर डेरा डाला।
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नदी ने उस स्थान को भी काट डाला। इस तरह से तीन बार घाघरा ने टापू पर जबरदस्त तरीके से कटान की है। अब टापू का जो हिस्सा बचा है, वह करीब एक किलोमीटर के आसपास ही है। ग्रामीणों का कहना है कि नदी ने टापू का तकरीबन 60 प्रतिशत हिस्सा काट दिया है।
जिसकी वजह से इस टापू पर बसे परिवार बचे हुए हिस्से में ही सिमट कर रह गए हैं। यहां पर नाम मात्र खेती बची है, जिसकी वजह से टापू पर बसे परिवार अब टापू को छोड़ने का मन बना रहे हैं। यहां पर बसे परिवारों को अब इस टापू का अस्तित्व मिटने का डर सता रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि जो नदी टापू के 60 प्रतिशत हिस्से को निगल सकती है। वह नदी किस वक्त बचे हुए 40 प्रतिशत हिस्से को हजम कर जाए, कोई भरोसा नही है। ग्रामीण दहशत में हैं, हर परिवार का मुखिया अब सुरक्षित ठिकानों की तलाश में जुटा हुआ है।
सुरक्षित ठिकाना मिलते ही तमाम परिवार टापू को छोड़ देंगे। उधर प्रशासन घाघरा नदी का पानी घटने के बाद पूरी तरह से बेफिक्र हो गया है। अधिकारियों का मानना है कि अब नदी में जितना पानी है, उसे ग्रामीण नाव के सहारे आसानी से पार कर सकते हैं।
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जिस पर 300 के आसपास परिवार बसे हुए हैं। इसी टापू पर खेती और इसी टापू पर उनका घर था। इस बार नदी ने टापू पर जबरदस्त तरीके से कटान की है। उधर प्रशासन घाघरा नदी का पानी घटने के बाद पूरी तरह से बेफिक्र हो गया है।
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गांव के रामसिंह, पप्पू, रामलाल, जयपाल आदि ग्रामीणों का कहना है कि नदी का कहर इस कदर बरपा कि, यहां बसे करीब 150 परिवारों को तीन बार अपने स्थान बदलने पड़े। पहले नदी ने काटा, तो पीड़ित परिवारों ने दूसरे स्थान पर डेरा डाला।
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नदी ने उस स्थान को भी काट डाला। इस तरह से तीन बार घाघरा ने टापू पर जबरदस्त तरीके से कटान की है। अब टापू का जो हिस्सा बचा है, वह करीब एक किलोमीटर के आसपास ही है। ग्रामीणों का कहना है कि नदी ने टापू का तकरीबन 60 प्रतिशत हिस्सा काट दिया है।
जिसकी वजह से इस टापू पर बसे परिवार बचे हुए हिस्से में ही सिमट कर रह गए हैं। यहां पर नाम मात्र खेती बची है, जिसकी वजह से टापू पर बसे परिवार अब टापू को छोड़ने का मन बना रहे हैं। यहां पर बसे परिवारों को अब इस टापू का अस्तित्व मिटने का डर सता रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि जो नदी टापू के 60 प्रतिशत हिस्से को निगल सकती है। वह नदी किस वक्त बचे हुए 40 प्रतिशत हिस्से को हजम कर जाए, कोई भरोसा नही है। ग्रामीण दहशत में हैं, हर परिवार का मुखिया अब सुरक्षित ठिकानों की तलाश में जुटा हुआ है।
सुरक्षित ठिकाना मिलते ही तमाम परिवार टापू को छोड़ देंगे। उधर प्रशासन घाघरा नदी का पानी घटने के बाद पूरी तरह से बेफिक्र हो गया है। अधिकारियों का मानना है कि अब नदी में जितना पानी है, उसे ग्रामीण नाव के सहारे आसानी से पार कर सकते हैं।