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सदर सीट पर भाजपा को अपनों से मिलती रही है चुनौती

Wed, 09 Feb 2022 12:21 AM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Wed, 09 Feb 2022 12:21 AM IST
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In Sadar seat, BJP has been getting challenges from loved ones
सीतापुर। कहते हैं कि राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं होता है... जी हां। कुछ ऐसा ही हाल इन दिनों सदर विधानसभा सीट को लेकर है। अब इसे संयोग कहें या फिर कुछ और... कुछ भी हो, लेकिन कहीं न कहीं भाजपा के लिए मुश्किलें जरूर बढ़ रही हैं। अब इससे पार्टी को कितना नुकसान और फायदा होता है, इसका सटीक आंकलन अभी कर पाना आसान नहीं है, लेकिन इतना तय है कि सदर सीट पर ऐसा पहली बार नहीं है, जब भाजपा को कोई अपना चुनौती दे रहा है। इससे पहले भी अपने ही बागी बनकर पार्टी की साख पर बट्टा लगाने का काम करते रहे हैं।
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सदर विधानसभा क्षेत्र के राजनीतिक इतिहास से रूबरू कराने के लिए आपको फ्लैश बैक में ले चलते हैं। अतीत में झांकने पर बात छह बार के विधायक रहे राजेंद्र गुप्त की करनी जरूरी है। 1977 में जनता पार्टी के टिकट से राजेंद्र गुप्त सदर विधानसभा क्षेत्र की सीट से विधायक बने थे। इसके बाद से वह लगातार इस सीट से छह बार विधायक चुने जाते रहे।
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1993 तक राजेंद्र गुप्त ने जीत का परचम फहराया। सियासत को करीब से जानने वालों की माने तो 1995 में नगर पालिका अध्यक्ष का चुनाव भाजपा के टिकट से राधेश्याम जायसवाल को लड़ाया गया, इसमें उन्हें कामयाबी मिली। वह पहली बार नगर पालिका अध्यक्ष बने। इसके बाद 1996 में राजेंद्र गुप्त के ही शिष्य राधेश्याम जायसवाल ने विधानसभा के चुनाव में उनके ही सामने ताल ठोंक दी। चुुनावी दंगल में राधेश्याम जायसवाल को जीत नसीब हुई, जबकि राजनीतिक गुरु राजेंद्र गुप्त को पराजय का सामना करना पड़ा।
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वह इसके बाद भी चुनाव लड़े, लेकिन जीत नहीं सके। 2012 तक राधेश्याम जायसवाल सपा के टिकट से सदर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ते रहे और जीतते भी रहे, लेकिन 2017 के चुनाव के चुनाव में राधेश्याम जायसवाल मोदी लहर में इस सीट पर साइकिल की रफ्तार दौड़ाने में कामयाब नहीं हो सके।
भाजपा के टिकट से राकेश राठौर विधायक बने, लेकिन उनका कुछ महीनों का ही कार्यकाल ठीक ठाक गुजरा। उसके बाद पार्टी के विधायक रहते हुए भी उन्हें सरकार का सिस्टम, व्यवस्थाएं और नीतियां रास नहीं आईं। लिहाजा उन्होंने बगावती तेवर अख्तियार कर लिया। सरकार के खिलाफ बोले। जमकर भड़ास निकाली। इसके वायरल हुए ऑडियो, वीडियो भी खूब चर्चा में रहे। मसलन, पूरे कार्यकाल में विधायक राकेश राठौर विधायक रहते हुए सरकारी कार्यक्रमों, योजनाओं से दूर रहे। इसके बाद चुनावी बिगुल बजने के कुछ महीने पहले ही पार्टी को अलविदा कर वह सपा में चले गए।
अब 2022 के विधानसभा के चुनावी दंगल में भाजपा ने सदर विधानसभा क्षेत्र से बतौर प्रत्याशी राकेश राठौर गुरु को उतार दिया। बस, यहीं से बगावत और तेज हो गई। सदर सीट या फिर महोली से टिकट मिलने के आश्वासन पर टिके भाजपा नेता साकेत मिश्रा डगमगा गए या यूं कहें कि बागी बन गए। निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में नामांकन दाखिल कर खुलेआम पार्टी को चुनौती दे डाली। नामांकन वापसी की तारीख तक अटकलें लगाई जा रही थी कि शायद वह पर्चा वापस ले लें, लेकिन ऐसा हुआ नहीं।
आशंकाओं, चर्चाओं को दरकिनार कर वह आखिर तक मैदान में डटे रहे। चुनाव चिह्न मिल चुका है। अब किला फतह करने की मंशा से मैदान में हैं। कामयाबी कितनी मिलती है, यह तो 10 मार्च के नतीजे बताएंगे, लेकिन उनके बागी होने से पार्टी की मुश्किलें जरूर बढ़ी हैं।
पार्टी के लिए बन रहे चुनौती
टिकट न मिलने के बाद से बागी हुए भाजपा नेता साकेत मिश्रा का समय के साथ हर दिन तेवर और भी तल्ख होते जा रहे हैं। वह हर दिन पार्टी के लिए चुनौती बनते जा रहे हैं। भाजपा के नेताओं पर संगीन इल्जाम लगाकर सियासी माहौल को लगातार गरमा रहे हैं। टिकट न मिलने के अगले ही दिन अपने घर पर मीडिया बुलाकर मंशा को स्पष्ट करते हुए भाजपा के नेताओं पर आरोप लगाए थे। फेसबुक लाइव भी किया था। वह मामला शांत हुआ नहीं था कि मंगलवार को फिर से आरोप लगाकर सियासी तापमान बढ़ा दिया।

सियासी गुणा-गणित में उलझ रहे समीकरण
साकेत मिश्रा के बागी होने के बाद से सदर सीट पर समीकरण सियासी गुणा-गणित में उलझ गए हैं। सियासी पंडितों की माने तो ब्राम्हण चेहरा होने की वजह से साकेत को बिरादरी का वोट मिलेगा, कितना मिलेगा, यह कह पाना मुमकिन नहीं। वहीं, दूसरी तरफ वकालत इस बात की भी हो रही है कि पार्टी का जो कैडर वोटर है वह तो प्रत्याशी को ही मिलेगा। ऐसे में ब्राह्मण वोटों में बिखराव की आशंका है। किधर ज्यादा झुकाव है और किधर कम, यह तो समय बताएगा।
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