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चीन के विश्वविद्यालय में बिखेरी हिंदी भाषा की चमक
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सीतापुर। जिले के पिछड़े इलाके गांजर में जन्मी एक शख्सियत ने भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गौरवान्वित किया है। मातृभाषा हिंदी की चमक चीन के विश्वविद्यालय में आज भी बिखर रही है। इसका श्रेय सीतापुर के गांजरी इलाके में जन्मे डॉ. गंगा प्रसाद शर्मा को जाता है। हिंदी साहित्य के इस कोहिनूर की चमक से समूचा देश रोशन है। साहित्य जगत में इनके नाम कई अभूतपूर्व उपलब्धियां दर्ज हैं।
इनकी प्रमुख रचनाओं में शामिल हिंदी कहानी सलवटें, अफसर का कुत्ता और पुलिसिया व्यायाम चीन के विश्वविद्यालय में स्नातक चतुर्थ वर्ष के पाठ्यक्रम में शामिल हैं। डॉ. गगा प्रसाद शर्मा का लिखा शोध पत्र एन इंट्रोडक्टरी हिंदी रीडर और ए कैंसाइज ग्लोसरी ऑफ अरेबिक एंड पर्सियन टर्म्स हिंदी भाषी आईएएस प्रोबेशनर्स को पढ़ाया जाता है।
जिले के ब्लॉक रामपुर मथुरा क्षेत्र के शमशेर नगर के साधारण परिवार में एक नवंबर 1962 को जन्में डॉ. गंगा प्रसाद शर्मा वर्तमान में डेज्योर्ग अंतरराष्ट्रीय भाषा संस्थान सूरत में बतौर संरक्षक अपनी सेवाएं दे रहे हैं। जूनियर तक की शिक्षा गांव फिर महमूदाबाद और उच्च शिक्षा लखनऊ विश्वविद्यालय से प्राप्त करने वाले डॉ. गंगा प्रसाद शिक्षण के कार्य से जुड़ गए।
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इसके साथ हिंदी साहित्य का सृजन भी करते रहे। लाल बहादुर शास्त्री आईएएस एकेडमी मंसूरी में प्रोफेसर रहे। विदेश मंत्रालय द्वारा चीन में चेयरपर्सन व चीन के विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के रूप में सेवाएं दीं। इसी दौरान उनकी लिखी कहानियां चीन के विश्वविद्यालय में स्नातक के पाठ्यक्रम में शामिल की गईं।
चीन में डॉ. गंगा प्रसाद शर्मा ने तीन साल तक हिंदी शिक्षण का कार्य किया। इन्हें दूतावास के माध्यम से ईरान के कल्चरल एक्सचेंज जाने का अवसर भी मिल चुका है। हिंदी के प्रति अपने महत्वपूर्ण योगदान के लिए इन्हें साहित्य शिरोमणि सम्मान व तुलसी सम्मान सहित कई पुरस्कार व सम्मान मिल चुके हैं। डॉ. गंगा प्रसाद शर्मा कहते हैं कि हिंदी स्वत: विकसित हो रही है। आज यह रोजगार देने वाली भाषा बन गई है।
डॉ. गंगा प्रसाद की प्रमुख रचनाएं
इनकी प्रमुख रचनाओं में सप्तपदी, समय की शिला पर के सहयोगी, दारा हुआ आकाश, हर जवा योजना प्रधान के हरम में, सोई हुई संवेदना, अफसर का कुत्ता, पुलिसिया व्यायाम, आधुनिक भारत के बहुरंगी दृश्य, दलित साहित्य का स्वरूप विकास और प्रवृत्तियां, स्त्रीलिंग शब्द माला व व्यावहारिक शब्द कोष आदि शामिल हैं।
हिंदी साहित्य की अनमोल धरोहर हैं पढ़ीस
जिले की सिधौली तहसील क्षेत्र के अंबरपुर गांव में जन्में बलभद्र प्रसाद पढ़ीस हिंदी साहित्य की अनमोल धरोहर हैं। वर्ष 1933 में पढ़ीस का काव्य संग्रह चकल्लस प्रकाशित हुआ। इनकी प्रमुख रचनाओं में आवा बसंतु छावा बसंतु, उयि क्येतने बड़े बहादुर हयिं, कयिस कयिस कनजिया हउ, कठपुतरी, उयि अउर आयिं हम अउर आन और पद्य रचनाओं में दिखला देते एक बार, लजीजी, चंद्र खिलौना, हूक आदि शामिल हैं। ईश्वर ने हिंदी साहित्य के इस सबसे बड़े हस्ताक्षर को मात्र 45 साल की अवस्था में वर्ष 1943 में हमसे छीन लिया। हिंदी साहित्य में पढ़ीस के योगदान से नई पीढ़ी आज भी प्रेरणा लेती है।
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इनकी प्रमुख रचनाओं में शामिल हिंदी कहानी सलवटें, अफसर का कुत्ता और पुलिसिया व्यायाम चीन के विश्वविद्यालय में स्नातक चतुर्थ वर्ष के पाठ्यक्रम में शामिल हैं। डॉ. गगा प्रसाद शर्मा का लिखा शोध पत्र एन इंट्रोडक्टरी हिंदी रीडर और ए कैंसाइज ग्लोसरी ऑफ अरेबिक एंड पर्सियन टर्म्स हिंदी भाषी आईएएस प्रोबेशनर्स को पढ़ाया जाता है।
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जिले के ब्लॉक रामपुर मथुरा क्षेत्र के शमशेर नगर के साधारण परिवार में एक नवंबर 1962 को जन्में डॉ. गंगा प्रसाद शर्मा वर्तमान में डेज्योर्ग अंतरराष्ट्रीय भाषा संस्थान सूरत में बतौर संरक्षक अपनी सेवाएं दे रहे हैं। जूनियर तक की शिक्षा गांव फिर महमूदाबाद और उच्च शिक्षा लखनऊ विश्वविद्यालय से प्राप्त करने वाले डॉ. गंगा प्रसाद शिक्षण के कार्य से जुड़ गए।
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इसके साथ हिंदी साहित्य का सृजन भी करते रहे। लाल बहादुर शास्त्री आईएएस एकेडमी मंसूरी में प्रोफेसर रहे। विदेश मंत्रालय द्वारा चीन में चेयरपर्सन व चीन के विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के रूप में सेवाएं दीं। इसी दौरान उनकी लिखी कहानियां चीन के विश्वविद्यालय में स्नातक के पाठ्यक्रम में शामिल की गईं।
चीन में डॉ. गंगा प्रसाद शर्मा ने तीन साल तक हिंदी शिक्षण का कार्य किया। इन्हें दूतावास के माध्यम से ईरान के कल्चरल एक्सचेंज जाने का अवसर भी मिल चुका है। हिंदी के प्रति अपने महत्वपूर्ण योगदान के लिए इन्हें साहित्य शिरोमणि सम्मान व तुलसी सम्मान सहित कई पुरस्कार व सम्मान मिल चुके हैं। डॉ. गंगा प्रसाद शर्मा कहते हैं कि हिंदी स्वत: विकसित हो रही है। आज यह रोजगार देने वाली भाषा बन गई है।
डॉ. गंगा प्रसाद की प्रमुख रचनाएं
इनकी प्रमुख रचनाओं में सप्तपदी, समय की शिला पर के सहयोगी, दारा हुआ आकाश, हर जवा योजना प्रधान के हरम में, सोई हुई संवेदना, अफसर का कुत्ता, पुलिसिया व्यायाम, आधुनिक भारत के बहुरंगी दृश्य, दलित साहित्य का स्वरूप विकास और प्रवृत्तियां, स्त्रीलिंग शब्द माला व व्यावहारिक शब्द कोष आदि शामिल हैं।
हिंदी साहित्य की अनमोल धरोहर हैं पढ़ीस
जिले की सिधौली तहसील क्षेत्र के अंबरपुर गांव में जन्में बलभद्र प्रसाद पढ़ीस हिंदी साहित्य की अनमोल धरोहर हैं। वर्ष 1933 में पढ़ीस का काव्य संग्रह चकल्लस प्रकाशित हुआ। इनकी प्रमुख रचनाओं में आवा बसंतु छावा बसंतु, उयि क्येतने बड़े बहादुर हयिं, कयिस कयिस कनजिया हउ, कठपुतरी, उयि अउर आयिं हम अउर आन और पद्य रचनाओं में दिखला देते एक बार, लजीजी, चंद्र खिलौना, हूक आदि शामिल हैं। ईश्वर ने हिंदी साहित्य के इस सबसे बड़े हस्ताक्षर को मात्र 45 साल की अवस्था में वर्ष 1943 में हमसे छीन लिया। हिंदी साहित्य में पढ़ीस के योगदान से नई पीढ़ी आज भी प्रेरणा लेती है।