{"_id":"614a1a0c8ebc3eb72e5e6a67","slug":"gardeners-spending-their-old-age-in-old-age-ashram-sitapur-news-lko5966183180","type":"story","status":"publish","title_hn":"बेगाने होकर वृद्धा आश्रम में बुढ़ापा बिता रहे बागवान","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
बेगाने होकर वृद्धा आश्रम में बुढ़ापा बिता रहे बागवान
विज्ञापन
नैमिषारण्य स्थित वृद्घा आश्रम। - संवाद
- फोटो : SITAPUR
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
सीतापुर। मानो तो गंगा मां हूं, न मानो तो बहता पानी...। यह गीत इस समय बिल्कुल सही बैठ रहा है। दरअसल, आपको इसी समाज की दो तस्वीरें देखने को मिलेंगी। एक मन को सुकून पहुंचाने वाली और दूसरा पीड़ादायक के साथ चिंताजनक भी है। हम बात कर रहे हैं दुनिया से गुजर चुके पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण और श्राद्ध कर उन्हें खुश करने की सदियों से चली आ रही परंपरा की।
सनातन धर्म में पितृ पक्ष में श्राद्ध किया जाता है। पितृ पक्ष शुरू हो गए हैं। लोग पूर्वजों को खुश करने के लिए श्राद्ध कर रहे हैं। इससे स्वर्गवासी हो चुके पितरों को खुशी मिलती है। पर इसका एक दूसरा पहलू भी है। जिसे देख और सुनकर आपके मन को पीड़ा होगी। जिला मुख्यालय से करीब 30 किमी. दूर नैमिषारण्य स्थित वृद्धाश्रम, जहां पर जीते जी बांगवा बेेगाने होकर अपनों से दूर बुढ़ापा बिताने को मजबूर हैं।
जहां एक ओर लोग आज पूर्वजों को खुश करने के लिए उनका श्राद्ध कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ बेटों ने जीवित मां-बाप का तिरस्कार कर उन्हें वृद्धाश्रम के सहारे छोड़ दिया या फिर बहू, बेटों की बेरुखी की वजह से वृद्ध मां-बाप को जब कोई और सहारा नहीं मिला तो वृद्धाश्रम को नया आशियाना बना लिया। इन बुजुर्गों की पीड़ा को शब्दों में बयां कर पाना आसान नहीं है, लेकिन तस्वीर यह बताती है कि हम किस समाज में जी रहे हैं। कौन से सभ्य समाज की बातें हम सार्वजनिक मंचों से करते हैं।
विज्ञापन
फिर भी बच्चों के लिए कर रहे दुआ
थाना नैमिषारण्य इलाके के करखिला गांव निवासी 74 साल के सियाराम काफी समय से वृद्धाश्रम में रह रहे हैं। इनके दो बेटे और एक बेटी है। इनका कहना है कि अपनों की बेरुखी ने उन्हें यहां पर रहने को मजबूर कर दिया, लेकिन कोई बात नहीं। हम तो अपने परिवार के लिए हमेशा सलामती की दुआ करेंगे। दुख तो होता है।
बच्चों ने घर से निकाला
बंभौरा गांव की रहने वाली 70 साल की माया देवी वृद्धाश्रम में पांच सालों से रह रही हैं। इनके दो बेटे हैं, लेकिन बुढ़ापे में किसी ने सहारा नहीं दिया। वह कहती हैं कि बच्चों ने घर से निकाल दिया तो श्राद्ध करने के कोई मायने नहीं। उनका कहना है कि फिर भी वे एक मां हैं। मां के दिल से कभी भी बेटे के लिए बद्दुआ नहीं निकल सकती है। परिवार खुश रहे।
जरूरत पर नहीं बने सहारा
शहर कोतवाली इलाके के एक गांव के रहने वाले 62 साल के कौशल किशोर की कहानी भी वृद्धाश्रम में रह रहे बुजुर्गों से जुदा नहीं है। इनका कहना है कि उनके दो बेटे और दो बेटियां हैं, लेकिन जरूरत पड़ी तो कोई सहारा नहीं बना। बच्चों ने मुंह फेर लिया। कहीं जाने का कोई रास्ता नहीं दिखा तो सीधा वृद्धाश्रम चला आया। अब यहीं पर बाकी की जिंदगी कटेगी। बच्चे खुश रहें, यही दुआ है।
विज्ञापन
सनातन धर्म में पितृ पक्ष में श्राद्ध किया जाता है। पितृ पक्ष शुरू हो गए हैं। लोग पूर्वजों को खुश करने के लिए श्राद्ध कर रहे हैं। इससे स्वर्गवासी हो चुके पितरों को खुशी मिलती है। पर इसका एक दूसरा पहलू भी है। जिसे देख और सुनकर आपके मन को पीड़ा होगी। जिला मुख्यालय से करीब 30 किमी. दूर नैमिषारण्य स्थित वृद्धाश्रम, जहां पर जीते जी बांगवा बेेगाने होकर अपनों से दूर बुढ़ापा बिताने को मजबूर हैं।
विज्ञापन
जहां एक ओर लोग आज पूर्वजों को खुश करने के लिए उनका श्राद्ध कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ बेटों ने जीवित मां-बाप का तिरस्कार कर उन्हें वृद्धाश्रम के सहारे छोड़ दिया या फिर बहू, बेटों की बेरुखी की वजह से वृद्ध मां-बाप को जब कोई और सहारा नहीं मिला तो वृद्धाश्रम को नया आशियाना बना लिया। इन बुजुर्गों की पीड़ा को शब्दों में बयां कर पाना आसान नहीं है, लेकिन तस्वीर यह बताती है कि हम किस समाज में जी रहे हैं। कौन से सभ्य समाज की बातें हम सार्वजनिक मंचों से करते हैं।
विज्ञापन
फिर भी बच्चों के लिए कर रहे दुआ
थाना नैमिषारण्य इलाके के करखिला गांव निवासी 74 साल के सियाराम काफी समय से वृद्धाश्रम में रह रहे हैं। इनके दो बेटे और एक बेटी है। इनका कहना है कि अपनों की बेरुखी ने उन्हें यहां पर रहने को मजबूर कर दिया, लेकिन कोई बात नहीं। हम तो अपने परिवार के लिए हमेशा सलामती की दुआ करेंगे। दुख तो होता है।
बच्चों ने घर से निकाला
बंभौरा गांव की रहने वाली 70 साल की माया देवी वृद्धाश्रम में पांच सालों से रह रही हैं। इनके दो बेटे हैं, लेकिन बुढ़ापे में किसी ने सहारा नहीं दिया। वह कहती हैं कि बच्चों ने घर से निकाल दिया तो श्राद्ध करने के कोई मायने नहीं। उनका कहना है कि फिर भी वे एक मां हैं। मां के दिल से कभी भी बेटे के लिए बद्दुआ नहीं निकल सकती है। परिवार खुश रहे।
जरूरत पर नहीं बने सहारा
शहर कोतवाली इलाके के एक गांव के रहने वाले 62 साल के कौशल किशोर की कहानी भी वृद्धाश्रम में रह रहे बुजुर्गों से जुदा नहीं है। इनका कहना है कि उनके दो बेटे और दो बेटियां हैं, लेकिन जरूरत पड़ी तो कोई सहारा नहीं बना। बच्चों ने मुंह फेर लिया। कहीं जाने का कोई रास्ता नहीं दिखा तो सीधा वृद्धाश्रम चला आया। अब यहीं पर बाकी की जिंदगी कटेगी। बच्चे खुश रहें, यही दुआ है।