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दूसरे पड़ाव हरैय्या पहुंची 84 कोसी परिक्रमा

Sat, 05 Mar 2022 12:11 AM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Sat, 05 Mar 2022 12:11 AM IST
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84 kosi parikrama reached the second stop Haraiyya
संदना/रामगढ़ (सीतापुर)। 84 कोसी परिक्रमा शुक्रवार भोर को डंका बजते ही अपने दूसरे पड़ाव हरैय्या की ओर रवाना हो गई। जयश्रीराम के नारे लगाते हुए परिक्रमार्थी आस्था में डूबे आगे बढ़ते चले गए। हाथी-घोड़ों पर सवार परिक्रमार्थियों को देखने के लिए तमाम लोग आतुर दिखे। उनका जगह-जगह पर स्वागत करके आशीर्वाद लिया। इससे पहले परिक्रमार्थी ने पहले पड़ाव कोरौना में विभिन्न मठ-मंदिरों का दर्शन करके पुण्य कमाया। वहां पर रात भर भजन-कीर्तन का सिलसिला चलता रहा।
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गुरुवार को नैमिषारण्य से परिक्रमा की शुरुआत हुई थी। परिक्रमार्थी नैमिषारण्य से करीब 10 किलोमीटर चलकर पहले पड़ाव कोरौना पहुंच गए थे। इसके बाद वहां अपना डेरा जमा लिया था। रात भर भजन-कीर्तन करते रहे। इनके भजन सुनने के लिए तमाम श्रद्धालु मौजूद रहे। कोरौना में रात भर लोग भक्ति के सागर में गोते लगाते रहे। हर तरफ जय श्रीराम व बोल कड़ाकड़ सीताराम की गूंज सुनाई देती रही।
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परिक्रमार्थियों ने दूसरे पड़ाव जनपद हरदोई के हरैय्या जाने से पहले आदि गंगा गोमती में स्नान कर कैलाश आश्रम के दर्शन किए। बाबा खबीसनाथ पर शराब चढ़ाकर पूजा-अर्चना की। मान्यता है कि बाबा खबीसनाथ को बिना शराब चढ़ाए उनकी पूजा पूरी नहीं होती है।
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बाबा खबीसनाथ से मांगी गई हर मनौती जरूर पूरी होती है। परिक्रमार्थी शनिवार सुबह तीसरे पड़ाव नगवा कोथावां के लिए रवाना होंगे। वहां हत्याहरण तीर्थ में स्नान करने के बाद रात्रि विश्राम करेंगे। मान्यता है कि हत्याहरण तीर्थ में स्नान करने से जाने-अनजाने में हुए पापों से भी मुक्ति मिल जाती है।
इस बार परिक्रमा को लेकर प्रशासन द्वारा सही तरीके से तैयारी नहीं कराई गई थी। इसका खामियाजा परिक्रमार्थियों को उठाना पड़ा। पहले पड़ाव से दूसरे पड़ाव के बीच परिक्रमा मार्ग की मरम्मत न होने से बजड़ी उखड़ी हुई पड़ी रही। पत्थर इधर-उधर पड़े होने से सबसे अधिक दिक्कत दंडवत करने वाले परिक्रमार्थियों को हुई। वहीं कुछ परिक्रमार्थी नंगे पाव ही परिक्रमा कर रहे थे। इससे उनके पाव में पत्थर चुभते रहे लेकिन आस्था के सैलाब में वे आगे बढ़ते चले गए।
परिक्रमा जब अपने पहले पड़ाव कोरौना पहुंची तो वहां परिक्रमार्थियों के सामने जगह का संकट खड़ा हो गया। आस-पड़ोस के खेतों में कटीले तार लगे हुए थे। खुली जगह बहुत ही कम बची थी। ऐसे में किसी परिक्रमार्थी ने सड़क पर डेरा जमाया तो कोई किसी के दरवाजे पर ही अपना आसन बना लिया। परिक्रमार्थियों में इस बार मार्ग की बदहाली को लेकर काफी आक्रोश बना रहा।
कैलाश मंदिर के बारे में बताया जाता है 1857 की लड़ाई में नानाजी पेशवा द्वारा इस मंदिर का निर्माण कराया गया था। बताते हैं कि जब अंग्रेजों से नानाजी पेशवा की लड़ाई चल रही थी तो नानाजी पेशवा छुपते-छुपाते यहां आए थे। उस समय यहां बहुत घना जंगल था। तब उन्होंने मंदिर का निर्माण कराया था। कैलाश आश्रम से महज छह किलोमीटर की दूरी पर सोनिकपुर नाम का स्थान है जो हरदोई जिले में आता है।

वहां के राजा वाणासुर हुआ करते थे। स्कंद पुराण के अनुसार वो यहां कैलाश आश्रम में रोज भगवान भोलेनाथ के शिवलिंग पर जल चढ़ाने के लिए आया करते थे। उनकी लड़की ऊषा व भगवान कृष्ण के पोते अनुरुद्ध की सगाई यहीं पर हुई थी। प्राचीन मान्यता के अनुसार यहां पर कोई झूठी कसम नहीं खा सकता है। अगर कोई ऐसा करता है तो उसे महादेव तुरंत दंड देते हैं।
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