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अप्रैल व मई में जारी हुए 280 मृत्यु प्रमाणपत्र
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सीतापुर। कोरोना की दूसरी लहर लोगों की जिंदगी पर भारी पड़ी। कोरोना के पीक टाइम की बात की जाए तो अप्रैल व मई माह में 280 लोगों की मौत हुई। मौतों का ये आंकड़ा केवल सीतापुर नगर पालिका क्षेत्र का है। इसकी तस्दीक नगर पालिका की ओर से जारी मृत्यु प्रमाणपत्र कर रहे हैं। अन्य महीनों की अपेक्षा इन दो माह में मौतों की संख्या में काफी इजाफा हुआ है। इन मौतों के पीछे जानकार कोविड की बेकाबू लहर भी बता रहे है।
कोरोना की दूसरी लहर में लोगों ने अपनों को कुछ ही देर में दुनिया छोड़कर जाते हुए देखा है। किसी का बेटा चल गया तो किसी की मां छोड़कर चली गई। बीते अप्रैल व मई माह में कोरोना पीक पर था। उस समय हालात यह थे कि गोपालघाट से लेकर शमशान घाटों में शवों की लंबी-लंबी लाइनें लगती थी। एक दिन में 10 से 15 तक अंतिम संस्कार किए गए। सुबह से अंतिम संस्कार का शुरू होता सिलसिला सूरज ढलने से पहले तक जारी रहता था।
नगर पालिका के मुताबिक अप्रैल माह में 69 लोगों के मौत के प्रमाणपत्र दिए गए। मई में यह आंकड़ा काफी अधिक हो गया। 211 मृत्यु प्रमाणपत्र जारी किए गए। इनका अंतिम संस्कार नगर पालिका इलाके में ही हुआ। नगर पालिका का कहना है कि वैसे आम दिनों में एक माह में 50-60 प्रमाणपत्र जारी किए जाते थे, जिसमें कुछ पुराने लोगों के मौत के प्रमाणपत्र भी शामिल होते थे।
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लेकिन मई में यह सब रिकार्ड टूट गए। एक ही माह में सर्वाधिक आवेदन आने से अब नगर पालिका इनके प्रमाणपत्र बनवाने में जुटा हुआ है। इतनी अधिक मौतों के पीछे कारण स्पष्ट नहीं हो सका है। मृत्यु प्रमाणपत्र में मौत के कारण का कोई जिक्र नहीं है। फिर भी जानकार इन मौतों को कोविड से जोड़कर देख रहे हैं। इसमें अधिकांश लोगों की मौत इलाज के दौरान अस्पताल में हुई। मौत का कारण स्पष्ट नहीं था। जब अन्य महीनों की अपेक्षा मौत का आंकड़ा बढ़ा तो हर कोई हैरान है।
सरकारी आंकड़े इससे जुदा
अगर स्वास्थ्य विभाग माने तो जिले में अब तक पहली व दूसरी लहर को मिलाकर महज 177 लोगों की मौत कोविड से होना बताई गई है। अगर दूसरी लहर की बात की जाए तो बीती अप्रैल से अब तक कोविड से करीब 90 लोगों की मौत हुई है। बाकी लोगों की मौत मार्च से पहले पहली लहर में हुई थी। लेकिन इन आंकड़ों के बाद जब मौत के प्रमाणपत्र जारी हो रहे हैं तो मौतों की संख्या में काफी इजाफा हुआ है।
मौतों के आंकड़े छिपाने पर पर उठते रहे सवाल
जिस समय कोरोना पीक पर था, उस समय मौतों की संख्या भी काफी तेजी से बढ़ रही थी। सरकारी आंकड़ों में मौतों की संख्या नहीं बढ़ाई जा रही थी। कई लोगों की मौत डॉक्टर की पुष्टि के बाद कोविड से हुई। लेकिन जिले के आंकड़ों में संख्या नहीं बढ़ाई गई है। मौत के आंकड़े छुपाने की कई खबर उस समय समाचार पत्रों ने प्रकाशित हुई थी।
परसेंडी विकासखंड के चेतई का कहना है कि उनके एक परिजन एल-2 जिला अस्पताल में भर्ती थे। करीब आठ दिन एल-2 के बाहर रहा था। उस दौरान एक-एक दिन में आठ से 10 मौतें होती देखी है। वहां जो भी लोग आते थे, वह कोविड से ग्रसित होते थे। लेकिन सरकारी आंकड़ों में एक दिन में 10 मौतें कभी नहीं दिखाई गईं। ऐसे में लोगों ने स्वास्थ्य विभाग पर आंकड़े छिपाने का भी आरोप लगाया था। उसके बाद जब न्यायालय ने संज्ञान लिया तो विभाग ने मौतों की संख्या में इजाफा करना शुरू कर दिया।
कई मौतें ऐसी जिनका नहीं कोई आंकड़ा
अप्रैल व मई में जिला अस्पताल की ओपीडी बंद कर दी गई थी। केवल इमरजेंसी सेवाएं चल रही थी। इमरजेंसी के एक चिकित्सक ने बताया कि उस दौरान इमरजेंसी में ही एक दिन में 8-10 मौतें हो जाती थी। लेकिन इन मौतों का कोई आंकड़ा जिला अस्पताल के पास नहीं रहता था। कई ऐसे मरीज थे, जिनकी हालत गंभीर होती थी।
अस्पताल आते-आते उनकी मौत हो गई। ऐसे में चिकित्सक उनका कोई डाटा अस्पताल में तैयार नहीं करते थे। परिजन सीधे शव लेकर घर चले जाते थे। चिकित्सक का कहना है कि अधिकतर मरीजों में कोविड के लक्षण होते थे। परिजन बताते थे कि किसी को कई दिनों से बुखार आ रहा था तो किसी को सांस लेने में तकलीफ थी तो किसी की पल्स लगातार गिर रही थी। ऐसी मौतों का कोई आंकड़ा नहीं है।
नगर पालिका द्वारा नगरीय क्षेत्र में जिन लोगों की मौत होती हैं, उनके सर्टीफिकेट जारी किए जाते है। इस समय सर्टीफिकेट के लिए काफी भीड़ लग रही है।
- गुरू प्रसाद पांडेय, ईओ
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कोरोना की दूसरी लहर में लोगों ने अपनों को कुछ ही देर में दुनिया छोड़कर जाते हुए देखा है। किसी का बेटा चल गया तो किसी की मां छोड़कर चली गई। बीते अप्रैल व मई माह में कोरोना पीक पर था। उस समय हालात यह थे कि गोपालघाट से लेकर शमशान घाटों में शवों की लंबी-लंबी लाइनें लगती थी। एक दिन में 10 से 15 तक अंतिम संस्कार किए गए। सुबह से अंतिम संस्कार का शुरू होता सिलसिला सूरज ढलने से पहले तक जारी रहता था।
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नगर पालिका के मुताबिक अप्रैल माह में 69 लोगों के मौत के प्रमाणपत्र दिए गए। मई में यह आंकड़ा काफी अधिक हो गया। 211 मृत्यु प्रमाणपत्र जारी किए गए। इनका अंतिम संस्कार नगर पालिका इलाके में ही हुआ। नगर पालिका का कहना है कि वैसे आम दिनों में एक माह में 50-60 प्रमाणपत्र जारी किए जाते थे, जिसमें कुछ पुराने लोगों के मौत के प्रमाणपत्र भी शामिल होते थे।
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लेकिन मई में यह सब रिकार्ड टूट गए। एक ही माह में सर्वाधिक आवेदन आने से अब नगर पालिका इनके प्रमाणपत्र बनवाने में जुटा हुआ है। इतनी अधिक मौतों के पीछे कारण स्पष्ट नहीं हो सका है। मृत्यु प्रमाणपत्र में मौत के कारण का कोई जिक्र नहीं है। फिर भी जानकार इन मौतों को कोविड से जोड़कर देख रहे हैं। इसमें अधिकांश लोगों की मौत इलाज के दौरान अस्पताल में हुई। मौत का कारण स्पष्ट नहीं था। जब अन्य महीनों की अपेक्षा मौत का आंकड़ा बढ़ा तो हर कोई हैरान है।
सरकारी आंकड़े इससे जुदा
अगर स्वास्थ्य विभाग माने तो जिले में अब तक पहली व दूसरी लहर को मिलाकर महज 177 लोगों की मौत कोविड से होना बताई गई है। अगर दूसरी लहर की बात की जाए तो बीती अप्रैल से अब तक कोविड से करीब 90 लोगों की मौत हुई है। बाकी लोगों की मौत मार्च से पहले पहली लहर में हुई थी। लेकिन इन आंकड़ों के बाद जब मौत के प्रमाणपत्र जारी हो रहे हैं तो मौतों की संख्या में काफी इजाफा हुआ है।
मौतों के आंकड़े छिपाने पर पर उठते रहे सवाल
जिस समय कोरोना पीक पर था, उस समय मौतों की संख्या भी काफी तेजी से बढ़ रही थी। सरकारी आंकड़ों में मौतों की संख्या नहीं बढ़ाई जा रही थी। कई लोगों की मौत डॉक्टर की पुष्टि के बाद कोविड से हुई। लेकिन जिले के आंकड़ों में संख्या नहीं बढ़ाई गई है। मौत के आंकड़े छुपाने की कई खबर उस समय समाचार पत्रों ने प्रकाशित हुई थी।
परसेंडी विकासखंड के चेतई का कहना है कि उनके एक परिजन एल-2 जिला अस्पताल में भर्ती थे। करीब आठ दिन एल-2 के बाहर रहा था। उस दौरान एक-एक दिन में आठ से 10 मौतें होती देखी है। वहां जो भी लोग आते थे, वह कोविड से ग्रसित होते थे। लेकिन सरकारी आंकड़ों में एक दिन में 10 मौतें कभी नहीं दिखाई गईं। ऐसे में लोगों ने स्वास्थ्य विभाग पर आंकड़े छिपाने का भी आरोप लगाया था। उसके बाद जब न्यायालय ने संज्ञान लिया तो विभाग ने मौतों की संख्या में इजाफा करना शुरू कर दिया।
कई मौतें ऐसी जिनका नहीं कोई आंकड़ा
अप्रैल व मई में जिला अस्पताल की ओपीडी बंद कर दी गई थी। केवल इमरजेंसी सेवाएं चल रही थी। इमरजेंसी के एक चिकित्सक ने बताया कि उस दौरान इमरजेंसी में ही एक दिन में 8-10 मौतें हो जाती थी। लेकिन इन मौतों का कोई आंकड़ा जिला अस्पताल के पास नहीं रहता था। कई ऐसे मरीज थे, जिनकी हालत गंभीर होती थी।
अस्पताल आते-आते उनकी मौत हो गई। ऐसे में चिकित्सक उनका कोई डाटा अस्पताल में तैयार नहीं करते थे। परिजन सीधे शव लेकर घर चले जाते थे। चिकित्सक का कहना है कि अधिकतर मरीजों में कोविड के लक्षण होते थे। परिजन बताते थे कि किसी को कई दिनों से बुखार आ रहा था तो किसी को सांस लेने में तकलीफ थी तो किसी की पल्स लगातार गिर रही थी। ऐसी मौतों का कोई आंकड़ा नहीं है।
नगर पालिका द्वारा नगरीय क्षेत्र में जिन लोगों की मौत होती हैं, उनके सर्टीफिकेट जारी किए जाते है। इस समय सर्टीफिकेट के लिए काफी भीड़ लग रही है।
- गुरू प्रसाद पांडेय, ईओ