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सरकार की तमाम कवायदों के बाद भी पेंशन पाना आसान नहीं
Updated Sun, 17 Dec 2017 01:34 AM IST
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तमाम कवायदों के बाद भी पेंशन पाना आसान नहीं
सीतापुर। सरकार की तमाम कवायदों के बाद भी पेंशनरों के लिए पेंशन प्राप्त करना आसान नहीं हो सका। केंद्र व प्रदेश सरकारें बुजुर्ग पेंशनरों की सहूलियत के लिए समय-समय पर तमाम नियम बनाती रहतीं हैं लेकिन सेवानिवृत्त कर्मचारियों को विभागीय दफ्तर से कोषागार और बैंक के बीच भागदौड़ से निजत नहीं मिल सकी। धक्के खाने के बाद भी समय से पेंशन नहीं मिल पाती है।
सरकार बुजुर्ग पेंशनरों की सुविधा के लिए कुछ नियम सरल करके हुए कई सुविधाएं मुहैया कराने का निर्देश दिया था लेकिन अफसरों की लापरवाही से नियमों का सही तरीके से पालन नहीं हो पा रहा है।
जिले में कुल पेंशनरों की संख्या 14,342 है। इन सभी समस्याओं की शुरुआत उनके अपने विभागीय दफ्तर से ही होती हैं। सेवानिवृत्त के बाद दस्तावेज मुकम्मल कराने के लिए उन्हें काफी पापड़ बेलने पड़ते हैं।
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फिर कोषागार कार्यालय में नियमों का हवाला देकर उन्हें दौड़ाया जाता है। रही-सही कसर बैंक में पूरी हो जाती है। पेंशनरों के लिए बैंक का काम निपटाना किसी लड़ाई जीतने से कम नहीं होता है।
बुजुर्ग पेंशनर किसी तरह लाठी टेक कर बैंक पहुंच गया तो वहां भीड़ देख लाइन में खड़े होने का साहस नहीं जुटा पाता है।
बैंककर्मियों का रवैया भी पेंशनरों के प्रति अच्छा नहीं रहता है। पेंशनरों का दर्द है, कि बैंक कर्मी जानकारी देने की तो बात दूर बुजुर्गों से सीधे मुंह बात तक नहीं करते हैं।
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सीतापुर। सरकार की तमाम कवायदों के बाद भी पेंशनरों के लिए पेंशन प्राप्त करना आसान नहीं हो सका। केंद्र व प्रदेश सरकारें बुजुर्ग पेंशनरों की सहूलियत के लिए समय-समय पर तमाम नियम बनाती रहतीं हैं लेकिन सेवानिवृत्त कर्मचारियों को विभागीय दफ्तर से कोषागार और बैंक के बीच भागदौड़ से निजत नहीं मिल सकी। धक्के खाने के बाद भी समय से पेंशन नहीं मिल पाती है।
सरकार बुजुर्ग पेंशनरों की सुविधा के लिए कुछ नियम सरल करके हुए कई सुविधाएं मुहैया कराने का निर्देश दिया था लेकिन अफसरों की लापरवाही से नियमों का सही तरीके से पालन नहीं हो पा रहा है।
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जिले में कुल पेंशनरों की संख्या 14,342 है। इन सभी समस्याओं की शुरुआत उनके अपने विभागीय दफ्तर से ही होती हैं। सेवानिवृत्त के बाद दस्तावेज मुकम्मल कराने के लिए उन्हें काफी पापड़ बेलने पड़ते हैं।
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फिर कोषागार कार्यालय में नियमों का हवाला देकर उन्हें दौड़ाया जाता है। रही-सही कसर बैंक में पूरी हो जाती है। पेंशनरों के लिए बैंक का काम निपटाना किसी लड़ाई जीतने से कम नहीं होता है।
बुजुर्ग पेंशनर किसी तरह लाठी टेक कर बैंक पहुंच गया तो वहां भीड़ देख लाइन में खड़े होने का साहस नहीं जुटा पाता है।
बैंककर्मियों का रवैया भी पेंशनरों के प्रति अच्छा नहीं रहता है। पेंशनरों का दर्द है, कि बैंक कर्मी जानकारी देने की तो बात दूर बुजुर्गों से सीधे मुंह बात तक नहीं करते हैं।