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टीपू के सहारे सुल्तान बनने में सपाई
ब्यूरो/अमर उजाला सिद्धार्थनगर
Updated Sun, 23 Oct 2016 10:37 PM IST
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हज हाउस का उद्धाटन करते सीएम अखिलेश यादव व आजम खान
- फोटो : अमर उजाला
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सिद्धार्थनगर। प्रदेश स्तर पर समाजवादी पार्टी में मची घमासान का असर जिले में भी दिखने लगा है। दो गुटों के बीच बंटती पार्टी में कार्यकर्ता अपनी जगह तलाशने लगे हैं। कई नेताओं के पोस्टर से ‘टीपू’ की तस्वीरें गायब होने लगी हैं। वह ‘टीपू’ के सहारे जिले की राजनीति का ‘सुल्तान’ बनने की कतार में आगे बढ़ रहे हैं। वहीं चाचा समर्थक भी खुद को पार्टी का सच्चा सेवक बताने से पीछे नहीं है। फिलहाल प्रदेश स्तर की उथल-पुथल उनके लिए गले की हड्डी बनी हुई है।
समाजवादी पुरोधाओं वाली इस सरजमीं पर कई चेहरे ऐसे हैं, जिनकी सपा के शीर्ष नेताओं तक पैठ है। इसमें सपा के टिकट पर निर्वाचित जनप्रतिनिधि हैं तो कई वरिष्ठ पदाधिकारी भी। साढ़े चार साल की सत्ता में इन रिश्तों को जाहिर करने में उन्होंने कसर नहीं छोड़ी। प्रदर्शन इस तरह था कि हर कोई इन चेहरों और उनके नेताओं से भली-भांति परिचित हो चुका है। अलग-अलग नेताओं तक पकड़ के बाद भी वह एक मुलायम डोर से बंधे हुए थे।
मगर ताजा घटनाक्रम और अपनों के बीच बढ़ती तल्खी ने उनकी मुश्किलें बढ़ा दी हैं। कार्यकर्ता असमंजस में हैं कि वह चाचा की छतरी के नीचे आएं या टीपू की बादशाहत स्वीकार करें। चुनावी समर नजदीक आने के साथ इस चयन को लेकर उनकी अकुलाहट बढ़ती जा रही है। भले ही वह तटस्थ होकर सार्वजनिक तौर पर चुप्पी साधे हुए हैं, लेकिन उनके अंदर की कुंठा और भविष्य के इरादे सोशल मीडिया या बैनर-पोस्टर पर नजर आने लगे हैं।
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कुछ ने तो बकायदे एक खेमे के प्रति निष्ठा जाहिर करनी शुरू भी कर दी है। बीते 15 अक्टूबर को मुख्यमंत्री की रैली के इर्द-गिर्द लगी होर्डिंग में भी इसका अक्श दिखा था, जो अब तेज होने लगा है। जिले में विभिन्न स्थानों पर लगे उनके पोस्टर-होर्डिंग में यह नजदीकी साफ झलक रही है तो सोशल मीडिया में हो रहे पोस्ट और कमेंट से भी उनकी निष्ठा का अंदाजा लगाया जा सकता है। फेसबुक के जो पोस्ट कल तक समाजवादी रंग से सराबोर होते थे, अचानक से उदासीन हो गए हैं। बैनर-पोस्टर व अन्य प्रचार सामग्री से भी कई चेहरे गायब दिख रहे हैं। यह बदलाव क्या असर दिखाएगा, यह तो समय बताएगा, फिलहाल सपा खेमे में पूरी तरह मायूसी और सियापा ही छाया हुआ है।
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समाजवादी पुरोधाओं वाली इस सरजमीं पर कई चेहरे ऐसे हैं, जिनकी सपा के शीर्ष नेताओं तक पैठ है। इसमें सपा के टिकट पर निर्वाचित जनप्रतिनिधि हैं तो कई वरिष्ठ पदाधिकारी भी। साढ़े चार साल की सत्ता में इन रिश्तों को जाहिर करने में उन्होंने कसर नहीं छोड़ी। प्रदर्शन इस तरह था कि हर कोई इन चेहरों और उनके नेताओं से भली-भांति परिचित हो चुका है। अलग-अलग नेताओं तक पकड़ के बाद भी वह एक मुलायम डोर से बंधे हुए थे।
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मगर ताजा घटनाक्रम और अपनों के बीच बढ़ती तल्खी ने उनकी मुश्किलें बढ़ा दी हैं। कार्यकर्ता असमंजस में हैं कि वह चाचा की छतरी के नीचे आएं या टीपू की बादशाहत स्वीकार करें। चुनावी समर नजदीक आने के साथ इस चयन को लेकर उनकी अकुलाहट बढ़ती जा रही है। भले ही वह तटस्थ होकर सार्वजनिक तौर पर चुप्पी साधे हुए हैं, लेकिन उनके अंदर की कुंठा और भविष्य के इरादे सोशल मीडिया या बैनर-पोस्टर पर नजर आने लगे हैं।
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कुछ ने तो बकायदे एक खेमे के प्रति निष्ठा जाहिर करनी शुरू भी कर दी है। बीते 15 अक्टूबर को मुख्यमंत्री की रैली के इर्द-गिर्द लगी होर्डिंग में भी इसका अक्श दिखा था, जो अब तेज होने लगा है। जिले में विभिन्न स्थानों पर लगे उनके पोस्टर-होर्डिंग में यह नजदीकी साफ झलक रही है तो सोशल मीडिया में हो रहे पोस्ट और कमेंट से भी उनकी निष्ठा का अंदाजा लगाया जा सकता है। फेसबुक के जो पोस्ट कल तक समाजवादी रंग से सराबोर होते थे, अचानक से उदासीन हो गए हैं। बैनर-पोस्टर व अन्य प्रचार सामग्री से भी कई चेहरे गायब दिख रहे हैं। यह बदलाव क्या असर दिखाएगा, यह तो समय बताएगा, फिलहाल सपा खेमे में पूरी तरह मायूसी और सियापा ही छाया हुआ है।