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जीवंत हुई सेवामुक्त कर्मचारी की पीड़ा
ब्यूरो/अमर उजाला सिद्धार्थनगर
Updated Sun, 05 Nov 2017 10:53 PM IST
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आगरा के कलाकारों ने नाटकीय अंदाज में किया कथावाचन
- फोटो : अमर उजाला
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सिद्धार्थनगर। नवोन्मेष नाट्य उत्सव की तीसरी शाम मुंबई के रंगकर्मियों के नाम रही। नाटक ‘सल्तनत’ में कलाकारों ने एक कर्मचारी की सेवानिवृत्ति के बाद की स्थिति को मंच पर जीवंत किया। पत्नी की मौत के बाद वह परिवार में उपेक्षित हो जाता है। बेटे और बहू थोड़ा स्नेह जताते हैं तो सिर्फ इसलिए की पेंशन और जीपीएफ का पैसा वह हासिल कर सकें। करीब डेढ़ घंटे तक चले इस मंचन को देख दर्शक भावुक हो उठे।
लोहिया कला भवन में अतिथियों ने परंपरानुसार 21 दीप प्रज्ज्वलित कर नाटक की शुरुआत कराई। मंच पर प्रस्तुत कलाकारों ने पहले दृश्य से ही दर्शकों को बांध दिया। दो शादीशुदा बेटों का पिता सेवानिवृत्ति के बाद घर में ही रहता है। पत्नी की मृत्यु हो चुकी है और बेटे-बहू के पास पिता से बात करने का समय नहीं है। बेटों के लिए पिता पूर्णत: अनुपयोगी वस्तु के समान हो चुके हैं। थोड़ा बहुत सम्मान बेटे देते भी हैं तो सिर्फ इसलिए कि उनके पेंशन और जीपीएफ के पैसे उन्हें भी मिल सके। पिता घर में पूर्णत: अकेला पड़ जाता है। उसके पास पैसे तो हैं, लेकिन वो उनसे खुशियां नहीं खरीद सकता। वो घर आने वाले हर शख्स से बात करना चाहता है, मगर कोई उसे समय नहीं देता है।
अकेलापन उसे मानसिक रोगी बना देता है। स्थिति यह होती है कि वो अपनी मरी हुई पत्नी को जीवित मानकर दिन भर उससे बातें करता रहता है। बेटों के अनेक प्रयास के बावजूद पिता अपनी सल्तनत (संपत्ति) का एक अंश भी उन्हें नहीं देता है। पिता की भूमिका निभा रहे विनय शर्मा ने अपने प्रभावशाली अभिनय से दर्शकों का दिल जीत लिया। नाटक का निर्देशन प्रतीक पचौरी ने किया। इस दौरान बड़ी संख्या में अधिकारी-कर्मचारी व प्रबुद्ध लोग मौजूद रहे।
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लोहिया कला भवन में अतिथियों ने परंपरानुसार 21 दीप प्रज्ज्वलित कर नाटक की शुरुआत कराई। मंच पर प्रस्तुत कलाकारों ने पहले दृश्य से ही दर्शकों को बांध दिया। दो शादीशुदा बेटों का पिता सेवानिवृत्ति के बाद घर में ही रहता है। पत्नी की मृत्यु हो चुकी है और बेटे-बहू के पास पिता से बात करने का समय नहीं है। बेटों के लिए पिता पूर्णत: अनुपयोगी वस्तु के समान हो चुके हैं। थोड़ा बहुत सम्मान बेटे देते भी हैं तो सिर्फ इसलिए कि उनके पेंशन और जीपीएफ के पैसे उन्हें भी मिल सके। पिता घर में पूर्णत: अकेला पड़ जाता है। उसके पास पैसे तो हैं, लेकिन वो उनसे खुशियां नहीं खरीद सकता। वो घर आने वाले हर शख्स से बात करना चाहता है, मगर कोई उसे समय नहीं देता है।
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अकेलापन उसे मानसिक रोगी बना देता है। स्थिति यह होती है कि वो अपनी मरी हुई पत्नी को जीवित मानकर दिन भर उससे बातें करता रहता है। बेटों के अनेक प्रयास के बावजूद पिता अपनी सल्तनत (संपत्ति) का एक अंश भी उन्हें नहीं देता है। पिता की भूमिका निभा रहे विनय शर्मा ने अपने प्रभावशाली अभिनय से दर्शकों का दिल जीत लिया। नाटक का निर्देशन प्रतीक पचौरी ने किया। इस दौरान बड़ी संख्या में अधिकारी-कर्मचारी व प्रबुद्ध लोग मौजूद रहे।
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