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‘डोली की जगह उठ गई बहन की अर्थी’
ब्यूरो/अमर उजाला सिद्धार्थनगर
Updated Mon, 06 Nov 2017 10:57 PM IST
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लोहिया कला भवन में नाटक का मंचन करते कलाकार।
- फोटो : अमर उजाला
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सिद्धार्थनगर। बहन की शादी के लिए एक भाई को कितने जतन करने पड़ते हैं, इसे बिहार के कलाकारों ने लोहिया कला भवन के मंच पर जीवंत किया। गरीबी और घोर अभाव में जिंदगी काटता भाई अपनी इकलौती बहन को नई साड़ी में विदा करने का अरमान पूरा करने के लिए झूठ बोलकर पैसा इकट्ठा करता है, मगर जब सच से पर्दा उठता है तो डोली की जगह बहन की अर्थी उठ रही होती है।
दिलों को झकझोरती ऐसी ही कहानी थी नवोन्मेष नाट्य उत्सव की चौथी शाम को प्रस्तुत नाटक ‘जनवासा’ की।
बिहार के रंगकर्मियों से अभिनीत इस नाटक ने दर्शकों को झकझोर दिया। बहन की शादी का अरमान संजोया भाई जनवासे में बारात का इंतजार कर रहा था और दूसरी ओर बहन की अर्थी उठ रही थी। इस बेहद मार्मिक दृश्य के साथ मंच पर पर्दा गिर रहा था तो दीर्घा में बैठे दर्शकों की आंखें भी छलक रही थी। दीप प्रज्ज्वलन के साथ शुरू हुआ नाटक भूदानी भाई और उनकी संस्था के इर्द-गिर्द घूमता है। संस्था में काम करने वाले पल्ला और उसकी बहन भागदेई मुख्य पात्र हैं।
दोनों रथ और मौर बनाने वाले कारीगर हैं। उन्हें जो पारिश्रमिक मिलता है, उससे मुश्किल से दाल -रोटी चलती है। देर से भागदेई की शादी तय होती है। पल्ला की खुशी का ठिकाना नहीं होता। वो बहन को नई साड़ी पहनाकर विदा करना चाहता है। यही उसकी छोटी सी तमन्ना है। इसे पूरी करने के लिए वो बहुत कोशिश करता है, मगर जब रुपयों की व्यवस्था नहीं होती तब वो बहन को ही कुष्ठ रोगी बताकर रुपयों की व्यवस्था करता है।
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द्वंद्व यहीं से पैदा होता है। जनवासा में काठ के घोड़े पर नाचता पल्ला के पैर उस समय थम जाते हैं, जब उससे भूदानी भाई मुखातिब होते हैं। झूठ बोलकर बहन की शादी के लिए पैसा इकठ्ठा करने के कारण उसका रिश्ता टूट जाता है। इससे आहत बहन आत्महत्या कर लेती है और पल्ला जनवासा में बारात का इंतजार करता रह जाता है। नाटक का लेखन रवींद्र भारती और परिकल्पना व निर्देशन राजेश राजा ने किया। इस मौके पर डीएम कुणाल सिल्कू सहित अन्य लोग मौजूद रहे। संचालन नवोन्मेष के विजित सिंह ने किया।
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दिलों को झकझोरती ऐसी ही कहानी थी नवोन्मेष नाट्य उत्सव की चौथी शाम को प्रस्तुत नाटक ‘जनवासा’ की।
बिहार के रंगकर्मियों से अभिनीत इस नाटक ने दर्शकों को झकझोर दिया। बहन की शादी का अरमान संजोया भाई जनवासे में बारात का इंतजार कर रहा था और दूसरी ओर बहन की अर्थी उठ रही थी। इस बेहद मार्मिक दृश्य के साथ मंच पर पर्दा गिर रहा था तो दीर्घा में बैठे दर्शकों की आंखें भी छलक रही थी। दीप प्रज्ज्वलन के साथ शुरू हुआ नाटक भूदानी भाई और उनकी संस्था के इर्द-गिर्द घूमता है। संस्था में काम करने वाले पल्ला और उसकी बहन भागदेई मुख्य पात्र हैं।
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दोनों रथ और मौर बनाने वाले कारीगर हैं। उन्हें जो पारिश्रमिक मिलता है, उससे मुश्किल से दाल -रोटी चलती है। देर से भागदेई की शादी तय होती है। पल्ला की खुशी का ठिकाना नहीं होता। वो बहन को नई साड़ी पहनाकर विदा करना चाहता है। यही उसकी छोटी सी तमन्ना है। इसे पूरी करने के लिए वो बहुत कोशिश करता है, मगर जब रुपयों की व्यवस्था नहीं होती तब वो बहन को ही कुष्ठ रोगी बताकर रुपयों की व्यवस्था करता है।
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द्वंद्व यहीं से पैदा होता है। जनवासा में काठ के घोड़े पर नाचता पल्ला के पैर उस समय थम जाते हैं, जब उससे भूदानी भाई मुखातिब होते हैं। झूठ बोलकर बहन की शादी के लिए पैसा इकठ्ठा करने के कारण उसका रिश्ता टूट जाता है। इससे आहत बहन आत्महत्या कर लेती है और पल्ला जनवासा में बारात का इंतजार करता रह जाता है। नाटक का लेखन रवींद्र भारती और परिकल्पना व निर्देशन राजेश राजा ने किया। इस मौके पर डीएम कुणाल सिल्कू सहित अन्य लोग मौजूद रहे। संचालन नवोन्मेष के विजित सिंह ने किया।