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नेपाल की धरोहर है सिरसिहवा का पुराना मंदिर
ब्यूरो/अमर उजाला सिद्धार्थनगर
Updated Mon, 18 Apr 2016 10:49 PM IST
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बढ़नी का प्रचीन शिव मंदिर।
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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तथागत की धरा पर जहां मौजूद अनमोल धरोहरों को संजोने में यहां का पुरातत्व विभाग उदासीन हैं, वहीं पड़ोसी राष्ट्र नेपाल में स्थित सिरसिहवा का शिव मंदिर आज भी अपनी प्राचीनता के लिए पूरे नेपाल में चर्चित है। 727 वर्ष पुराने इस मंदिर की मान्यताओं के कारण यहां दर्शन-पूजन के लिए दूर-दराज से लोग बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। समय के थपेड़ों के बावजूद मंदिर की प्राचीनता बरकरार है।
बढनी सीमा से सटे कृष्णानगर से 3 किमी दूर स्थित सिरसिहवा बाजार कभी नेपाल के तराई का मुख्य व्यापारिक केंद्र था। यहां के दो व्यापारी बंधुओं ने वर्ष 1290 में शिव मंदिर का निर्माण कराया था। मंदिर की स्थापना से जुड़े शिलापट्ट पर यह तिथि आज भी अंकित है।
तब से तमाम आपदाएं आई, मगर मंदिर के पुरातन स्वरूप को आज भी सरकारें आज भी संजोए हुए हैं। मंदिर के पुजारी 70 वर्षीय बद्री प्रसाद मिश्र व पूर्व प्रधान मुक्तेश्वर मिश्र बताते हैं कि 727 वर्ष पहले इस बाजार में दो भाई भोनू व निहाल वैश्य कमलापुरी रहते थे।
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जिनकी कोई संतान नहीं थी। पास के ही गांव कटिहार निवासी एक युवक की शादी के कुछ दिनों बाद गौना आने से पहले ही मौत पर उसकी पत्नी सती होने लगी। सती होने से पूर्व उसने व्यापारी भाइयों को संतान सुख के लिए शिवाला मंदिर व पोखरा बनवाने को कहा।
दोनों भाइयों ने तीन विशाल मंदिर, 27 कुआं, छह पोखरे का निर्माण करवाया। यह मंदिर नेपाल के सिरसिहवा, पटना, बसंतपुर मोतीपुर में आज भी मौजूद हैं। इसके बाद व्यापारियों को दो पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। कालांतर में यह परिवार यहां से जाकर भारत के निवासी हो गए।
बताया जाता है उनके वंशज गोंडा के नवाबगंज में आज भी हैं। लोगों की आस्था का प्रतीक सिरसिहवा का के 727 वर्ष पुराने इस शिव मंदिर में पूजा-आराधना मन्नतें करने आज भी बड़ी संख्या में लोग आते हैं।
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बढनी सीमा से सटे कृष्णानगर से 3 किमी दूर स्थित सिरसिहवा बाजार कभी नेपाल के तराई का मुख्य व्यापारिक केंद्र था। यहां के दो व्यापारी बंधुओं ने वर्ष 1290 में शिव मंदिर का निर्माण कराया था। मंदिर की स्थापना से जुड़े शिलापट्ट पर यह तिथि आज भी अंकित है।
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तब से तमाम आपदाएं आई, मगर मंदिर के पुरातन स्वरूप को आज भी सरकारें आज भी संजोए हुए हैं। मंदिर के पुजारी 70 वर्षीय बद्री प्रसाद मिश्र व पूर्व प्रधान मुक्तेश्वर मिश्र बताते हैं कि 727 वर्ष पहले इस बाजार में दो भाई भोनू व निहाल वैश्य कमलापुरी रहते थे।
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जिनकी कोई संतान नहीं थी। पास के ही गांव कटिहार निवासी एक युवक की शादी के कुछ दिनों बाद गौना आने से पहले ही मौत पर उसकी पत्नी सती होने लगी। सती होने से पूर्व उसने व्यापारी भाइयों को संतान सुख के लिए शिवाला मंदिर व पोखरा बनवाने को कहा।
दोनों भाइयों ने तीन विशाल मंदिर, 27 कुआं, छह पोखरे का निर्माण करवाया। यह मंदिर नेपाल के सिरसिहवा, पटना, बसंतपुर मोतीपुर में आज भी मौजूद हैं। इसके बाद व्यापारियों को दो पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। कालांतर में यह परिवार यहां से जाकर भारत के निवासी हो गए।
बताया जाता है उनके वंशज गोंडा के नवाबगंज में आज भी हैं। लोगों की आस्था का प्रतीक सिरसिहवा का के 727 वर्ष पुराने इस शिव मंदिर में पूजा-आराधना मन्नतें करने आज भी बड़ी संख्या में लोग आते हैं।