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तराई में गिद्ध संरक्षण : दावे बड़े-बड़े, पर, जटायु के जीवन पर खतरा बरकरार

Wed, 07 Jan 2026 11:20 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर Updated Wed, 07 Jan 2026 11:20 PM IST
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Siddharthnagar News: Vulture conservation in the Terai region: Lofty claims, but the threat to Jatayu's life remains
- प्राकृतिक संतुलन बरकरार रखने के लिहाज से अहम हैं गिद्ध
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- जिले के सीमावर्ती जंगलों में अभी तक कोई औपचारिक गिद्ध सुरक्षित क्षेत्र घोषित नहीं किया गया
सिद्धार्थनगर। इंडो-नेपाल कॉरिडोर के तराई जंगलों में जटायु (गिद्ध) की वापसी को वन विभाग और विशेषज्ञ संरक्षण की सफलता के रूप में पेश कर रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और है। सुरक्षित फीडिंग साइट्स, सामुदायिक भागीदारी और निगरानी की बातें तो हो रही हैं, लेकिन कई इलाकों में गिद्ध संरक्षण अब भी सीमित संसाधनों और अधूरे अमल के भरोसे चल रहा है।
वन विभाग के मुताबिक सिद्धार्थनगर, दुधवा, बनबासा और बिजनौर जैसे इलाकों में गिद्धों की संख्या में बढ़ोतरी दर्ज की गई है, लेकिन जिले के सीमावर्ती जंगलों में अभी तक कोई औपचारिक ‘वॉल्चर सेफ जोन (गिद्ध सुरक्षित क्षेत्र)’ घोषित नहीं किया गया। विशेषज्ञों का कहना है कि बिना सुरक्षित जोन के गिद्धों की स्थायी आबादी पर खतरा मंडराता रहेगा।
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पक्षी और इको सिस्टम (पारिस्थितिकी तंत्र) विशेषज्ञ डॉ. अभिषेक बताते हैं कि सबसे बड़ी चिंता डाइक्लोफेनाक को लेकर है।डाइक्लोफेनाक एक दर्द निवारक दवा है, जो पशुओं को दी जाती है। पशुओं के मर जाने के बाद उनका शव खुले में छोड़ दिया जाता है। गिद्ध जब उनका मांस खाते हैं तो इस दवा के असर उनके शरीर पर होता है। इससे उनकी किडनी खराब हो जाती है, जिससे उनकी मौत हो जाती है। इसकी वजह गिद्धों की आबादी में भारी गिरावट आई। सरकार ने 2006 में पशु चिकित्सा में डाइक्लोफेनाक के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया था। इसके बावजूद ग्रामीण क्षेत्रों में यह दवा अब भी आसानी से उपलब्ध है। पशुपालकों में इसके घातक असर को लेकर जागरूकता बेहद सीमित है। वन अधिकारी बताते हैं कि बिजली निगम और वन विभाग के बीच समन्वय की कमी भी संरक्षण की राह में बाधा बन रही है। तराई क्षेत्र में फैली हाईटेंशन लाइनें और खुले बिजली के तार गिद्धों के लिए जानलेवा साबित हो रहे हैं, लेकिन संवेदनशील इलाकों में अभी तक तारों की शिफ्टिंग या बर्ड-डायवर्टर लगाने का काम नगण्य है।
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स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि गिद्धों की मौजूदगी से मृत पशुओं की समस्या तो कम हुई है, लेकिन संरक्षण से जुड़ी योजनाओं की जानकारी उन्हें समय पर नहीं मिलती। कई पंचायतों में न तो नियमित जागरूकता शिविर हुए और न ही सुरक्षित शव निस्तारण की वैकल्पिक व्यवस्था बनाई गई।
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संरक्षण को दी जाए प्राथमिकता
पक्षी विशेषज्ञों के अनुसार, यदि सिद्धार्थनगर-नेपाल सीमा को जोड़ते हुए एक समर्पित ‘तराई गिद्ध संरक्षण कॉरिडोर’ विकसित किया जाए, डाइक्लोफेनाक की सख्त निगरानी हो और स्थानीय समुदाय को आर्थिक-सामाजिक रूप से जोड़ा जाए, तभी यह वापसी टिकाऊ हो सकती है। वन विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी मानते हैं, गिद्धों की संख्या बढ़ना सकारात्मक संकेत है, लेकिन संरक्षण को प्राथमिकता न दी गई तो यह सुधार फिर से पलट सकता है। ग्राउंड सर्वे और वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, दुधवा राष्ट्रीय उद्यान में लगभग 100 गिद्ध, बनबासा में 50 से 150 और बिजनौर में 40 से 100 गिद्ध सक्रिय हैं। सिद्धार्थनगर के नजदीकी जंगलों में 20 से 50 गिद्ध नियमित रूप से देखे जा रहे हैं। इन साइट्स पर देखे जा रहे नए घोसले स्थिर आबादी की बढ़ती आमद का संकेत हैं।


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इस तरह बहाल होगा इको सिस्टम
डीएफओ नीला एम. बताती हैं कि गिद्धों की उपस्थिति से मरे पशुओं से फैलने वाली बीमारियों का खतरा कम होगा। क्योंकि मृत पशु लंबे समय तक खेतों और रास्तों पर नहीं रहेंगे। अन्य स्कैवेंजर जैसे कुत्ते और चूहे भी नियंत्रित होते रहते हैं।
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