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Siddharthnagar News: अंग्रेजों के दमन चक्र के खिलाफ शोहरतगढ़ में भी उठी थी आवाज
Tue, 12 Aug 2025 11:10 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
Updated Tue, 12 Aug 2025 11:10 PM IST
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शोहरतगढ़। चौरीचौरा जन विद्रोह के बाद अंग्रेजों का दमन चक्र चला तो नेपाल सीमा से सटा शोहरतगढ़ क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं रहा। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आंदोलन को धारदार बनाने में जुटे थे, वहीं ब्रिटिश हुकूमत उन पर कोड़े बरसा रही थी, आजादी के आंदोलन में कई बार जेल जा चुके दो दोस्त बुधईराम और परमेश्वर दत्त पंडित इस यातना में शहीद हो गए थे।
इस बर्बरता दमन के बाद महात्मागांधी ने नवजीवन लिखा था कि खलीलाबाद के बाद शोहरतगढ़ की जनता ने शांति से चौरीचौरा का उत्तर दिया है। सेनानियों की तरफ से हिंसा हुई थी या नहीं, यह पता करने महात्मा गांधी के पुत्र देवास गांधी शोहरतगढ़ भी आए थे। यहां अंग्रेजी हुकूमत के पुलिस अफसरों ने उनके साथ अभद्रता की थी। इसका उल्लेख यश भारती पुरस्कार प्राप्त मणेंद्र मिश्र मशाल ने अपनी पुस्तक बस्ती मंडल के आलोक में स्वतंत्रता संग्राम में भी किया है । वहीं बस्ती गजेटियर में भी दमन का उल्लेख है।
जंग-ए-आजादी की पहली मशाल मई 1857 के आखिरी हफ्ते में जल चुकी थी। इस मशाल को जलाए रखने में शोहरतगढ़ भी पीछे नहीं था। 1857 से लेकर 1922 तक ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध आंदोलन किए गए। स्वतंत्रता संग्राम में भारत माता के कई सपूत ने अपना बलिदान दिया था।
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इस बर्बरता दमन के बाद महात्मागांधी ने नवजीवन लिखा था कि खलीलाबाद के बाद शोहरतगढ़ की जनता ने शांति से चौरीचौरा का उत्तर दिया है। सेनानियों की तरफ से हिंसा हुई थी या नहीं, यह पता करने महात्मा गांधी के पुत्र देवास गांधी शोहरतगढ़ भी आए थे। यहां अंग्रेजी हुकूमत के पुलिस अफसरों ने उनके साथ अभद्रता की थी। इसका उल्लेख यश भारती पुरस्कार प्राप्त मणेंद्र मिश्र मशाल ने अपनी पुस्तक बस्ती मंडल के आलोक में स्वतंत्रता संग्राम में भी किया है । वहीं बस्ती गजेटियर में भी दमन का उल्लेख है।
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जंग-ए-आजादी की पहली मशाल मई 1857 के आखिरी हफ्ते में जल चुकी थी। इस मशाल को जलाए रखने में शोहरतगढ़ भी पीछे नहीं था। 1857 से लेकर 1922 तक ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध आंदोलन किए गए। स्वतंत्रता संग्राम में भारत माता के कई सपूत ने अपना बलिदान दिया था।
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