{"_id":"6a70db7c08adb959a9098ee1","slug":"siddharthnagar-news-livestock-deaths-and-infertility-caused-by-improper-treatment-siddharthnagar-news-c-227-1-sgkp1033-162276-2026-08-03","type":"story","status":"publish","title_hn":"Siddharthnagar News: गलत इलाज से पशुओं की मौत और बांझपन, कसी जाएगी नकेल","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Siddharthnagar News: गलत इलाज से पशुओं की मौत और बांझपन, कसी जाएगी नकेल
Mon, 03 Aug 2026 11:48 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
Updated Mon, 03 Aug 2026 11:48 PM IST
विज्ञापन
- लगातार गलत इलाज पशुओं के मरने और गलत सीमन डालने से बांझपन की बढ़ती शिकायत को देखते हुए शासन ने लिया निर्णय
- जिला स्तर पर गठित टास्क फोर्स करेगी जांच, बिना किसी डिग्री और अनुभव के गांव में घूम कर इलाज करने वाले पर होगी कार्रवाई
सिद्धार्थनगर। पशु पालकों का आर्थिक शोषण रोकने के लिए शासन ने जनपद स्तर पर टास्क फोर्स गठित की जाएगी। यह झोलाछाप के नेटवर्क की जांच करेगी। इसमें दोषी पाए जाने पर कार्रवाई की जाएगी। जिलाधिकारी की ओर से बनाई जाने वाली टीम में एसडीएम, पशु चिकित्सा विभाग और पुलिस के सदस्य शामिल किए जाएंगे।
नेपाल बाॅर्डर के तराई जनपद में गिने जाने वाले सिद्धार्थनगर जनपद में कृषि के साथ पशुपालन भी किसान करते हैं। पशुपालन बहुत नहीं है लेकिन खुद की जरूरत पूरा करने के लिए लोग गाय और भैंस पाल रखी है। जनपद में गाय और भैंस की बात करें तो इनकी संख्या लगभग डेढ़ लाख के करीब होगी। वहीं, पशु अस्पताल महज 25 और चिकित्सकों की संख्या 20 है। ऐसे में इतने बड़े जनपद में पशुओं के इलाज का संकट है। बीमार होने पर पशुओं का इलाज होना ही है, जिसका फायदा झोलाछाप उठा रहे हैं।
गांव से शहर तक बिना डिग्री और प्रशिक्षित होते हुए पशुओं के बेहतर इलाज और कृत्रिम गर्भाधान कराने का दावा करने वाले झोलाछापों की लापरवाही से पशुओं की जान जा रही है। वे बांझपन का शिकार हो रहे हैं। साथ ही सरकार के नस्ल सुधार की योजना पर भी दम तोड़ रही है। इसके साथ ही अनजान पशुपालकों को बड़ा आर्थिक नुकसान होता है। ऐसे में शासन ने कृत्रिम गर्भाधान में बाहरियों की दखल, नस्ल सुधार में बाधा और पशु पालकों के शोषण को देखते हुए झोलाछाप पर शिकंजा कसने का निर्देश दिए हैं।
विज्ञापन
इसमें मुख्य कार्यकारी अधिकारी पशुधन विकास परिषद डॉ. प्रमोद कुमार सिंह ने कमेटी गठित करके जांच करने के निर्देश दिए हैं। शासन के निर्देश पर गठित होने वाली जिला स्तरीय टास्क फोर्स में पशुपालन विभाग के चिकित्सकों के अलावा अन्य संबंधित विभागों के अधिकारी भी शामिल रहेंगे। टीम गांवों और बाजारों में जांच अभियान चलाएगी। बिना डिग्री, बिना पंजीकरण और बिना अनुमति पशुओं का इलाज करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। साथ ही अवैध सीमन और गर्भाधान के नेटवर्क की भी जांच होगी।
-- -
गलत से इलाज से होता है नुकसान
पशु के जानकारों का कहना गलत इलाज से पशुओं की उत्पादन क्षमता प्रभावित होती है। दूध देने वाले पशुओं की सेहत बिगड़ती है और कई बार उनकी जान तक चली जाती है। वहीं, गलत तरीके से गर्भाधान कराने से पशुओं के दोबारा गर्भधारण नहीं करने की समस्या तेजी से बढ़ रही है। जनपद में बड़ी संख्या में पशुपालक दुग्ध उत्पादन और खेती-किसानी के लिए मवेशियों पर निर्भर हैं लेकिन सरकारी चिकित्सा व्यवस्था सीमित होने का फायदा उठाकर झोलाछाप सक्रिय हो गए हैं। कई मामलों में बिना बीमारी की सही पहचान किए इंजेक्शन लगा दिए जाते हैं, गलत दवाएं दी जाती हैं और अवैध रूप से गर्भाधान कराया जाता है। इसका नतीजा यह होता है कि कई पशुओं की मौत हो जाती है जबकि बड़ी संख्या में गाय-भैंस बांझ हो रही हैं। आर्थिक नुकसान झेलने के बावजूद ग्रामीण अक्सर शिकायत भी नहीं कर पाते। इससे पशुपालकों को लाखों रुपये का आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।
विज्ञापन
- जिला स्तर पर गठित टास्क फोर्स करेगी जांच, बिना किसी डिग्री और अनुभव के गांव में घूम कर इलाज करने वाले पर होगी कार्रवाई
सिद्धार्थनगर। पशु पालकों का आर्थिक शोषण रोकने के लिए शासन ने जनपद स्तर पर टास्क फोर्स गठित की जाएगी। यह झोलाछाप के नेटवर्क की जांच करेगी। इसमें दोषी पाए जाने पर कार्रवाई की जाएगी। जिलाधिकारी की ओर से बनाई जाने वाली टीम में एसडीएम, पशु चिकित्सा विभाग और पुलिस के सदस्य शामिल किए जाएंगे।
नेपाल बाॅर्डर के तराई जनपद में गिने जाने वाले सिद्धार्थनगर जनपद में कृषि के साथ पशुपालन भी किसान करते हैं। पशुपालन बहुत नहीं है लेकिन खुद की जरूरत पूरा करने के लिए लोग गाय और भैंस पाल रखी है। जनपद में गाय और भैंस की बात करें तो इनकी संख्या लगभग डेढ़ लाख के करीब होगी। वहीं, पशु अस्पताल महज 25 और चिकित्सकों की संख्या 20 है। ऐसे में इतने बड़े जनपद में पशुओं के इलाज का संकट है। बीमार होने पर पशुओं का इलाज होना ही है, जिसका फायदा झोलाछाप उठा रहे हैं।
विज्ञापन
गांव से शहर तक बिना डिग्री और प्रशिक्षित होते हुए पशुओं के बेहतर इलाज और कृत्रिम गर्भाधान कराने का दावा करने वाले झोलाछापों की लापरवाही से पशुओं की जान जा रही है। वे बांझपन का शिकार हो रहे हैं। साथ ही सरकार के नस्ल सुधार की योजना पर भी दम तोड़ रही है। इसके साथ ही अनजान पशुपालकों को बड़ा आर्थिक नुकसान होता है। ऐसे में शासन ने कृत्रिम गर्भाधान में बाहरियों की दखल, नस्ल सुधार में बाधा और पशु पालकों के शोषण को देखते हुए झोलाछाप पर शिकंजा कसने का निर्देश दिए हैं।
विज्ञापन
इसमें मुख्य कार्यकारी अधिकारी पशुधन विकास परिषद डॉ. प्रमोद कुमार सिंह ने कमेटी गठित करके जांच करने के निर्देश दिए हैं। शासन के निर्देश पर गठित होने वाली जिला स्तरीय टास्क फोर्स में पशुपालन विभाग के चिकित्सकों के अलावा अन्य संबंधित विभागों के अधिकारी भी शामिल रहेंगे। टीम गांवों और बाजारों में जांच अभियान चलाएगी। बिना डिग्री, बिना पंजीकरण और बिना अनुमति पशुओं का इलाज करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। साथ ही अवैध सीमन और गर्भाधान के नेटवर्क की भी जांच होगी।
गलत से इलाज से होता है नुकसान
पशु के जानकारों का कहना गलत इलाज से पशुओं की उत्पादन क्षमता प्रभावित होती है। दूध देने वाले पशुओं की सेहत बिगड़ती है और कई बार उनकी जान तक चली जाती है। वहीं, गलत तरीके से गर्भाधान कराने से पशुओं के दोबारा गर्भधारण नहीं करने की समस्या तेजी से बढ़ रही है। जनपद में बड़ी संख्या में पशुपालक दुग्ध उत्पादन और खेती-किसानी के लिए मवेशियों पर निर्भर हैं लेकिन सरकारी चिकित्सा व्यवस्था सीमित होने का फायदा उठाकर झोलाछाप सक्रिय हो गए हैं। कई मामलों में बिना बीमारी की सही पहचान किए इंजेक्शन लगा दिए जाते हैं, गलत दवाएं दी जाती हैं और अवैध रूप से गर्भाधान कराया जाता है। इसका नतीजा यह होता है कि कई पशुओं की मौत हो जाती है जबकि बड़ी संख्या में गाय-भैंस बांझ हो रही हैं। आर्थिक नुकसान झेलने के बावजूद ग्रामीण अक्सर शिकायत भी नहीं कर पाते। इससे पशुपालकों को लाखों रुपये का आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।