{"_id":"588f78684f1c1b981de8043f","slug":"not-realizing-the-dream-of-the-white-revolution","type":"story","status":"publish","title_hn":"श्वेत क्रांति का सपना नहीं हुआ साकार","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
श्वेत क्रांति का सपना नहीं हुआ साकार
ब्यूरो/अमर उजाला सिद्धार्थनगर
Updated Mon, 30 Jan 2017 11:01 PM IST
विज्ञापन
कोआपरेटिव डेयरी फाउंडेशन प्लांट
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
सिद्धार्थनगर। जिले में श्वेत क्रांति योजना दम तोड़ चुकी है। दुग्ध उत्पादकों का सपना साकार नहीं हो सका। पशुपालक को दुग्ध उत्पादन को बेचने में दुश्वारियों का सामना करना पड़ रहा है। दो साल पहले जिले में स्थापित दुग्ध खरीद केंद्र को बस्ती स्थानांतरित कर दिया गया। अब दूध को बेचने के लिए उत्पादकों को भटकना पड़ रहा है।
पशुपालन विभाग के आंकड़ों के अनुसार जिले में कामधेनु योजना के 3, मिनी कामधेनु योजना के 6 व माइक्रो कामधेनु योजना के 5 यूनिट स्थापित हैं। इन सभी यूनिटों में 850 दुधारु पशु हैं। एक दुधारु पशु का प्रतिदिन औसत उत्पादन 12 लीटर है। इस लिहाज से प्रतिदिन 10 हजार 200 लीटर दुग्ध का उत्पादन किया जाता है। इसके अलावा अन्य छोटे स्तर के पशुपालकों के पास करीब 10 हजार दुधारु पशु हैं। सभी पशुपालक, उत्पादन को बेचने के लिए खुले बाजार का सहारा लेते हैं। सदर ब्लॉक के ग्राम दुर्जनपुर निवासी पशुपालक संध्या यादव कहती हैं कि दूध को बेचने के लिए मुख्यालय पर दुकान खोलनी पड़ी।
पीसीडीएफ ने दुग्ध को खरीदने में कोई विशेष रुचि नहीं दिखाई। लग्न के समय उत्पादन का वाजिब मूल्य मिल जाता है। पशुपालक ध्रुव नारायण सिंह कहते हैं कि योजना को लागू कराने के समय उत्पादन को खरीदने की भी बात कही गई थी। लेकिन पीसीडीएफ के खरीद करने में आनाकानी करने के बाद मुख्यालय पर बेचने की मजबूरी आ गई है। श्याम कुंवर कहते हैं कि पीसीडीएफ को दुग्ध बेचने के बाद भुगतान समय से नहीं मिलता है। भुगतान भी कम व बस्ती तक दौड़ लगाने के बाद मिलता है। बांसी निवासी तिलक राम यादव कहते है कि उत्पादन करने के बाद मिष्ठान व पनीर बनाकर बेचा जा रहा है।
विज्ञापन
इस संबंध में सीवीओ डॉ. फणीश सिंह ने कहा कि दुग्ध उत्पादन की बिक्री के संबंध में आयुक्त कृषि उत्पादन से पत्राचार किया गया था। आयुक्त स्तर से भी पीसीडीएफ को निर्देशित किया गया था। लेकिन कोई सार्थक कदम नहीं उठाया गया। महाप्रबंधक पीसीडीएफ एसपी सिंह ने कहा कि दुग्ध खरीद के लिए बने जिले के यूनियन को मंडल स्तर से संचालित किया जा रहा है। जिले पर किसानों से प्रतिदिन औसत 1000 लीटर दुग्ध की खरीद की जाती है। सप्ताह की खरीद होने के बाद भुगतान किया जाता है।
विज्ञापन
पशुपालन विभाग के आंकड़ों के अनुसार जिले में कामधेनु योजना के 3, मिनी कामधेनु योजना के 6 व माइक्रो कामधेनु योजना के 5 यूनिट स्थापित हैं। इन सभी यूनिटों में 850 दुधारु पशु हैं। एक दुधारु पशु का प्रतिदिन औसत उत्पादन 12 लीटर है। इस लिहाज से प्रतिदिन 10 हजार 200 लीटर दुग्ध का उत्पादन किया जाता है। इसके अलावा अन्य छोटे स्तर के पशुपालकों के पास करीब 10 हजार दुधारु पशु हैं। सभी पशुपालक, उत्पादन को बेचने के लिए खुले बाजार का सहारा लेते हैं। सदर ब्लॉक के ग्राम दुर्जनपुर निवासी पशुपालक संध्या यादव कहती हैं कि दूध को बेचने के लिए मुख्यालय पर दुकान खोलनी पड़ी।
विज्ञापन
पीसीडीएफ ने दुग्ध को खरीदने में कोई विशेष रुचि नहीं दिखाई। लग्न के समय उत्पादन का वाजिब मूल्य मिल जाता है। पशुपालक ध्रुव नारायण सिंह कहते हैं कि योजना को लागू कराने के समय उत्पादन को खरीदने की भी बात कही गई थी। लेकिन पीसीडीएफ के खरीद करने में आनाकानी करने के बाद मुख्यालय पर बेचने की मजबूरी आ गई है। श्याम कुंवर कहते हैं कि पीसीडीएफ को दुग्ध बेचने के बाद भुगतान समय से नहीं मिलता है। भुगतान भी कम व बस्ती तक दौड़ लगाने के बाद मिलता है। बांसी निवासी तिलक राम यादव कहते है कि उत्पादन करने के बाद मिष्ठान व पनीर बनाकर बेचा जा रहा है।
विज्ञापन
इस संबंध में सीवीओ डॉ. फणीश सिंह ने कहा कि दुग्ध उत्पादन की बिक्री के संबंध में आयुक्त कृषि उत्पादन से पत्राचार किया गया था। आयुक्त स्तर से भी पीसीडीएफ को निर्देशित किया गया था। लेकिन कोई सार्थक कदम नहीं उठाया गया। महाप्रबंधक पीसीडीएफ एसपी सिंह ने कहा कि दुग्ध खरीद के लिए बने जिले के यूनियन को मंडल स्तर से संचालित किया जा रहा है। जिले पर किसानों से प्रतिदिन औसत 1000 लीटर दुग्ध की खरीद की जाती है। सप्ताह की खरीद होने के बाद भुगतान किया जाता है।