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टूटा हौसला, ध्वस्त हुआ पोषण मिशन
ब्यूरो/अमर उजाला सिद्धार्थनगर
Updated Sun, 18 Dec 2016 10:38 PM IST
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गंगा गाय महिला डेयरी योजना के चेक बांटते विधायक
- फोटो : अमर उजाला
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सिद्धार्थनगर। कुपोषण के खात्मे के लिए शुरू हुए हौसला पोषण मिशन का हौसला टूट गया है। प्रदेश सरकार की प्राथमिकता वाली यह योजना दो माह से पूरे प्रदेश में ठप पड़ी है। योजना के संचालन के लिए विभाग के पास न धन है और न ही आहरण की अनुमति। ख्यालों में दूध-घी बंट रहा है और जुबानी में मौसमी फल का वितरण किया जा रहा है। संसाधनों से बेबस महकमा कागजों में ही कुपोषण मिटाने में जुटा हुआ है।
प्रदेश स्तर पर हौसला पोषण मिशन की शुरुआत 15 जुलाई से हुई थी। मंशा थी कि प्रदेश का बचपन स्वस्थ और खुशहाल हो। इसके तहत गर्भवती महिलाओं व पांच वर्ष तक के बच्चों को आंगनबाड़ी केंद्रों पर प्रतिदिन मीनू के अनुसार दूध, दही, घी और मौसमी फल दिया जाना था। मुख्यमंत्री की प्राथमिकता वाली इस योजना में कोई बाधा न आए, इसलिए तीन माह का एडवांस धन और आहरण की अनुमति भी जारी कर दी गई थी।
जैसे-तैसे योजना तीन माह तक तो चली, मगर उसके बाद से इस पर ब्रेक लग गया। अक्टूबर से इस योजना में न तो धनराशि आवंटित हुई है और न ही किसी को आहरण की अनुमति दी गई है। नतीजा पोषण मिशन ध्वस्त हो चुका है। जिले में 10 अगस्त से लागू होने और सितंबर में कार्यकर्ताओं की हड़ताल के चलते विभाग ने इसे किसी तरह खींचकर नवंबर मध्य तक चालू रखा।
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मगर अब यहां भी इस योजना का क्रियान्वयन पूरी तरह ठप है। चुनावी दहलीज पर खड़े प्रदेश में आचार संहिता की आहट से अब कोई जोखिम लेने को तैयार नहीं है। ऐसे में बच्चों और माताओं को कुपोषण से मुक्ति दिलाने के प्रयास दम तोड़ रहे हैं। जिला कार्यक्रम अधिकारी अजय कुमार त्रिपाठी का कहना है कि हौसला पोषण मिशन में धन की कमी नहीं है। अलबत्ता 36 लाख रुपये जिले में एडवांस पड़े हैं, जबकि एक माह का खर्च 34 लाख का है। मगर धनराशि के अग्रिम आहरण की अनुमति नहीं मिली है।
यह सिर्फ एक जिले की समस्या नहीं है, पूरे प्रदेश का हाल है। हमारे यहां योजना 10 अगस्त से लागू हुई थी, लिहाजा सितंबर में हड़ताल के चलते नवंबर तक इसे क्रियान्वित कराया गया। फिलहाल यह योजना बंद है। पत्राचार किया जा रहा है। उम्मीद है कि शीघ्र ही आहरण की अनुमति मिल जाएगी।
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प्रदेश स्तर पर हौसला पोषण मिशन की शुरुआत 15 जुलाई से हुई थी। मंशा थी कि प्रदेश का बचपन स्वस्थ और खुशहाल हो। इसके तहत गर्भवती महिलाओं व पांच वर्ष तक के बच्चों को आंगनबाड़ी केंद्रों पर प्रतिदिन मीनू के अनुसार दूध, दही, घी और मौसमी फल दिया जाना था। मुख्यमंत्री की प्राथमिकता वाली इस योजना में कोई बाधा न आए, इसलिए तीन माह का एडवांस धन और आहरण की अनुमति भी जारी कर दी गई थी।
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जैसे-तैसे योजना तीन माह तक तो चली, मगर उसके बाद से इस पर ब्रेक लग गया। अक्टूबर से इस योजना में न तो धनराशि आवंटित हुई है और न ही किसी को आहरण की अनुमति दी गई है। नतीजा पोषण मिशन ध्वस्त हो चुका है। जिले में 10 अगस्त से लागू होने और सितंबर में कार्यकर्ताओं की हड़ताल के चलते विभाग ने इसे किसी तरह खींचकर नवंबर मध्य तक चालू रखा।
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मगर अब यहां भी इस योजना का क्रियान्वयन पूरी तरह ठप है। चुनावी दहलीज पर खड़े प्रदेश में आचार संहिता की आहट से अब कोई जोखिम लेने को तैयार नहीं है। ऐसे में बच्चों और माताओं को कुपोषण से मुक्ति दिलाने के प्रयास दम तोड़ रहे हैं। जिला कार्यक्रम अधिकारी अजय कुमार त्रिपाठी का कहना है कि हौसला पोषण मिशन में धन की कमी नहीं है। अलबत्ता 36 लाख रुपये जिले में एडवांस पड़े हैं, जबकि एक माह का खर्च 34 लाख का है। मगर धनराशि के अग्रिम आहरण की अनुमति नहीं मिली है।
यह सिर्फ एक जिले की समस्या नहीं है, पूरे प्रदेश का हाल है। हमारे यहां योजना 10 अगस्त से लागू हुई थी, लिहाजा सितंबर में हड़ताल के चलते नवंबर तक इसे क्रियान्वित कराया गया। फिलहाल यह योजना बंद है। पत्राचार किया जा रहा है। उम्मीद है कि शीघ्र ही आहरण की अनुमति मिल जाएगी।