{"_id":"6a15f14a096c3e1c9c00c8fd","slug":"homes-are-destroyed-every-monsoon-with-more-than-25-houses-facing-danger-siddharthnagar-news-c-7-1-gkp1046-1334067-2026-05-27","type":"story","status":"publish","title_hn":"Siddharthnagar News: हर मानसून में उजड़ता आशियाना, 25 से अधिक घरों पर मंडराया खतरा","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Siddharthnagar News: हर मानसून में उजड़ता आशियाना, 25 से अधिक घरों पर मंडराया खतरा
विज्ञापन
बूढ़ी राप्ती से हर साल जंग, 16 घर नदी में समाए; 25 से अधिक पर मंडराया खतरा
सिद्धार्थनगर। मानसून के दिन जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं हथिवड़ताल गांव स्थित तिवारीडीह टोला के लोगों की बेचैनी बढ़ गई है। हर वर्ष बाढ़ और नदी कटान की त्रासदी झेल रहे ग्रामीणों को इस बार भी अपने आशियाने उजड़ने का डर सता रहा है। बीते वर्षों में नदी कटान की वजह से 16 से अधिक घर नदी में समा चुके हैं, जिससे कई परिवार विस्थापित हो गए। क्षेत्र में बचे 25 से अधिक कई मकान कटान के मुहाने पर खड़े हैं। यह हाल तब है बूढ़ी राप्ती में हर साल बाढ़ आती है। लोगों का कहना है कि हर साल प्रशासन से गुहार लगाने के बावजूद स्थायी समाधान नहीं हो पाया है।
ग्रामीणों का कहना है कि लखनापार बांध और बूढ़ी राप्ती नदी के बीच स्थित तिवारीडीह टोला के किनारे सिंचाई विभाग द्वारा मनरेगा योजना के तहत करीब तीन वर्ष पूर्व कटाव निरोधक कार्य कराया गया था लेकिन वह अब पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुका है। सुरक्षा के लिए लगाए गए बोल्डर और अन्य संरचनाएं बह चुकी हैं, जिससे नदी का कटाव तेजी से बढ़ रहा है। ग्रामीणों ने आशंका जताई है कि यदि समय रहते प्रभावी बचाव कार्य नहीं कराया गया तो इस बार मानसून में कई और घर नदी में समा सकते हैं। लोगों ने प्रशासन और सिंचाई विभाग से तत्काल कटान रोकने के लिए ठोस कदम उठाने की मांग की है।
ग्रामीण बोले- कटान के मुहाने पर जिंदगी, अब तो यह नियति है हमारी
वर्तमान में गांव के शैलेंद्र नाथ त्रिपाठी, महेश, रघुवीर, बाबूराम, महावीर, शिवप्रसाद, अकाले और घनश्याम के मकान नदी कटान से सटे हुए हैं। ग्रामीणों को हर समय यह भय सताता रहता है कि कहीं उनका घर भी नदी में समा न जाए। गांव निवासी अधिवक्ता वीरेंद्र नाथ त्रिपाठी का कहना है कि हर साल बाढ़ और कटान की विभीषिका झेलना यहां के लोगों की नियति बन चुकी है। बाढ़ के दौरान कई परिवारों को पलायन करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो इस बार मानसून में कई परिवार बेघर हो सकते हैं।
विज्ञापन
-- -- -- -- -- --
अभी से शुरू कर दी पलायन की तैयारी
अभी से लोगों ने पलायन की तैयारी शुरू कर दी है। गांव निवासी पूर्व क्षेत्र पंचायत सदस्य घनश्याम कहते हैं कि दिन हो या रात हर समय नदी के पानी पर ही नजर रहती है। कब उसमें उफान आ जाए और फिर यहां से पलायन की तैयारी की जाए। हम लोगों ने पलायन की तैयारी शुरू कर दी है।
-- -- -- -- -- -- --
विस्थापन का दर्द झेल रहे
कटान से साधुसरन, नरोत्तम, मोहरत, शोहरत, कौशल, दशरथ, चंद्रिका, भुवाल, पुजारी, कन्हैया, अंबिका व राजाराम के घर नदी में विलीन हो चुके हैं। इनमें मोहरत, दशरथ, सोहरत, कन्हैया, भुवाल, दिनेश ने तो बांध के किनारे ही अपना आशियाना बना लिया है। वहीं कटान से बेघर हुए साधुसरन और कौशल भी दूसरी जगह अपना ठिकाना बनाने को मजबूर हो गए। जबकि कुछ लोगों ने नगर पंचायत उसका व आसपास घर बना लिया है।
-- -- -- -- -- -
इन गांवों ने भी झेली है कटान की पीड़ा
नदी कटान की मार से उसका क्षेत्र के छितरापार, जोगिया के फत्तेपुर और टलडिहवा गांवों में भारी तबाही हो चुकी है। बीते वर्षों में इन गांवों के डेढ़ सौ से अधिक परिवारों के घर नदी में समा गए, जिससे लोग बेघर होकर पलायन को मजबूर हुए। सबसे अधिक प्रभावित छितरापार गांव रहा, जहां अकेले 100 से अधिक मकान नदी की भेंट चढ़ चुके हैं। गांव निवासी परमेश्वर और रामकीरत यादव बताते हैं कि घर नदी में समा जाने के बाद उन्हें दूसरे स्थान पर जाकर बसना पड़ा। उन्होंने कहा कि हर साल कटान का दायरा बढ़ता जा रहा है, जिससे ग्रामीणों में डर और असुरक्षा का माहौल बना रहता है।वहीं राप्ती नदी किनारे बसे संगलदीप और अमरिया गांव भी कटान की चपेट में आ चुके हैं। यहां भी कई मकान नदी में विलीन हो जाने से अनेक परिवार बेघर हो चुके हैं। ग्रामीणों ने प्रशासन से स्थायी कटान निरोधक कार्य कराने की मांग की है।
-- -- -- --
सिंचाई विभाग का ये भी तर्क-सीधे सुरक्षा देना संभव नहीं
सिंचाई विभाग का कहना है कि विभागीय स्तर पर केवल बांधों की सुरक्षा के लिए ही कटाव निरोधक कार्य कराए जाते हैं। ऐसे में नदी और बांध के बीच बसे तिवारीडीह टोला को विभागीय परियोजना के तहत सीधे सुरक्षा देना संभव नहीं है। हालांकि विभाग ने यह जरूर कहा कि मनरेगा अथवा वर्तमान में संचालित जीरामजी योजना के तहत यहां कटान निरोधक कार्य कराया जा सकता है।
जहां भी जरूरत होगी, वहां काम कराए जाएंगे
सभी संवेदनशील स्थलों पर बचाव एवं मरम्मत कार्य कराए गए हैं। वर्तमान में कई कटान स्थलों पर कार्य कराए जा रहे है। जहां भी जरूरत होगी विभागीय नियमों के अनुसार सुरक्षात्मक कार्य कराए जाएंगे। इसमें किसी प्रकार की लापरवाही नहीं की जा रही है।
कृपाशंकर भारती, अधिशासी अभियंता, ड्रेनेज खंड
विज्ञापन
सिद्धार्थनगर। मानसून के दिन जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं हथिवड़ताल गांव स्थित तिवारीडीह टोला के लोगों की बेचैनी बढ़ गई है। हर वर्ष बाढ़ और नदी कटान की त्रासदी झेल रहे ग्रामीणों को इस बार भी अपने आशियाने उजड़ने का डर सता रहा है। बीते वर्षों में नदी कटान की वजह से 16 से अधिक घर नदी में समा चुके हैं, जिससे कई परिवार विस्थापित हो गए। क्षेत्र में बचे 25 से अधिक कई मकान कटान के मुहाने पर खड़े हैं। यह हाल तब है बूढ़ी राप्ती में हर साल बाढ़ आती है। लोगों का कहना है कि हर साल प्रशासन से गुहार लगाने के बावजूद स्थायी समाधान नहीं हो पाया है।
ग्रामीणों का कहना है कि लखनापार बांध और बूढ़ी राप्ती नदी के बीच स्थित तिवारीडीह टोला के किनारे सिंचाई विभाग द्वारा मनरेगा योजना के तहत करीब तीन वर्ष पूर्व कटाव निरोधक कार्य कराया गया था लेकिन वह अब पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुका है। सुरक्षा के लिए लगाए गए बोल्डर और अन्य संरचनाएं बह चुकी हैं, जिससे नदी का कटाव तेजी से बढ़ रहा है। ग्रामीणों ने आशंका जताई है कि यदि समय रहते प्रभावी बचाव कार्य नहीं कराया गया तो इस बार मानसून में कई और घर नदी में समा सकते हैं। लोगों ने प्रशासन और सिंचाई विभाग से तत्काल कटान रोकने के लिए ठोस कदम उठाने की मांग की है।
विज्ञापन
ग्रामीण बोले- कटान के मुहाने पर जिंदगी, अब तो यह नियति है हमारी
वर्तमान में गांव के शैलेंद्र नाथ त्रिपाठी, महेश, रघुवीर, बाबूराम, महावीर, शिवप्रसाद, अकाले और घनश्याम के मकान नदी कटान से सटे हुए हैं। ग्रामीणों को हर समय यह भय सताता रहता है कि कहीं उनका घर भी नदी में समा न जाए। गांव निवासी अधिवक्ता वीरेंद्र नाथ त्रिपाठी का कहना है कि हर साल बाढ़ और कटान की विभीषिका झेलना यहां के लोगों की नियति बन चुकी है। बाढ़ के दौरान कई परिवारों को पलायन करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो इस बार मानसून में कई परिवार बेघर हो सकते हैं।
विज्ञापन
अभी से शुरू कर दी पलायन की तैयारी
अभी से लोगों ने पलायन की तैयारी शुरू कर दी है। गांव निवासी पूर्व क्षेत्र पंचायत सदस्य घनश्याम कहते हैं कि दिन हो या रात हर समय नदी के पानी पर ही नजर रहती है। कब उसमें उफान आ जाए और फिर यहां से पलायन की तैयारी की जाए। हम लोगों ने पलायन की तैयारी शुरू कर दी है।
विस्थापन का दर्द झेल रहे
कटान से साधुसरन, नरोत्तम, मोहरत, शोहरत, कौशल, दशरथ, चंद्रिका, भुवाल, पुजारी, कन्हैया, अंबिका व राजाराम के घर नदी में विलीन हो चुके हैं। इनमें मोहरत, दशरथ, सोहरत, कन्हैया, भुवाल, दिनेश ने तो बांध के किनारे ही अपना आशियाना बना लिया है। वहीं कटान से बेघर हुए साधुसरन और कौशल भी दूसरी जगह अपना ठिकाना बनाने को मजबूर हो गए। जबकि कुछ लोगों ने नगर पंचायत उसका व आसपास घर बना लिया है।
इन गांवों ने भी झेली है कटान की पीड़ा
नदी कटान की मार से उसका क्षेत्र के छितरापार, जोगिया के फत्तेपुर और टलडिहवा गांवों में भारी तबाही हो चुकी है। बीते वर्षों में इन गांवों के डेढ़ सौ से अधिक परिवारों के घर नदी में समा गए, जिससे लोग बेघर होकर पलायन को मजबूर हुए। सबसे अधिक प्रभावित छितरापार गांव रहा, जहां अकेले 100 से अधिक मकान नदी की भेंट चढ़ चुके हैं। गांव निवासी परमेश्वर और रामकीरत यादव बताते हैं कि घर नदी में समा जाने के बाद उन्हें दूसरे स्थान पर जाकर बसना पड़ा। उन्होंने कहा कि हर साल कटान का दायरा बढ़ता जा रहा है, जिससे ग्रामीणों में डर और असुरक्षा का माहौल बना रहता है।वहीं राप्ती नदी किनारे बसे संगलदीप और अमरिया गांव भी कटान की चपेट में आ चुके हैं। यहां भी कई मकान नदी में विलीन हो जाने से अनेक परिवार बेघर हो चुके हैं। ग्रामीणों ने प्रशासन से स्थायी कटान निरोधक कार्य कराने की मांग की है।
सिंचाई विभाग का ये भी तर्क-सीधे सुरक्षा देना संभव नहीं
सिंचाई विभाग का कहना है कि विभागीय स्तर पर केवल बांधों की सुरक्षा के लिए ही कटाव निरोधक कार्य कराए जाते हैं। ऐसे में नदी और बांध के बीच बसे तिवारीडीह टोला को विभागीय परियोजना के तहत सीधे सुरक्षा देना संभव नहीं है। हालांकि विभाग ने यह जरूर कहा कि मनरेगा अथवा वर्तमान में संचालित जीरामजी योजना के तहत यहां कटान निरोधक कार्य कराया जा सकता है।
जहां भी जरूरत होगी, वहां काम कराए जाएंगे
सभी संवेदनशील स्थलों पर बचाव एवं मरम्मत कार्य कराए गए हैं। वर्तमान में कई कटान स्थलों पर कार्य कराए जा रहे है। जहां भी जरूरत होगी विभागीय नियमों के अनुसार सुरक्षात्मक कार्य कराए जाएंगे। इसमें किसी प्रकार की लापरवाही नहीं की जा रही है।
कृपाशंकर भारती, अधिशासी अभियंता, ड्रेनेज खंड