सिद्धार्थनगर: कई काल खंडों के इतिहास को समेटे है भारतभारी, हनुमान जी को यहीं लगा था भरत का बाण
भरत कुंड जलाशय, प्राचीन शिव मंदिर, रामजानकी मंदिर, मां दुर्गा व हनुमान जी का मंदिर यहां की शोभा बढ़ाने के साथ ही श्रद्धालुओं को आकर्षित कर रहा है। यहां पर स्थित भरत कुंड सरोवर का पानी स्वच्छ व निर्मल रहता है। इस सरोवर में अवांछित एक तिनका भी नहीं दिखाई देता। इनमें मौजूद मछलियों के शिकार पर प्रतिबंध है।
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सिद्धार्थनगर जिले के डुमरियागंज तहसील क्षेत्र के भारतभारी स्थित धार्मिक एवं पौराणिक महत्व के प्रमुख तीर्थ स्थल अपने दामन में इतिहास के कई कालखंडों का रहस्य समेटे है। पौराणिक महत्व के अलावा ऐतिहासिक धरोहर के रूप में प्रसिद्ध इस स्थल पर कार्तिक पूर्णिमा को लगने वाले मेले में क्षेत्रीय लोगों के अलावा देश के विभिन्न शहरों से लोग आते हैं। वे यहां पवित्र सरोवर में स्नान कर पूजा पाठ करते हैं।
भरत कुंड जलाशय, प्राचीन शिव मंदिर, रामजानकी मंदिर, मां दुर्गा व हनुमान जी का मंदिर यहां की शोभा बढ़ाने के साथ ही श्रद्धालुओं को आकर्षित कर रहा है। यहां पर स्थित भरत कुंड सरोवर का पानी स्वच्छ व निर्मल रहता है। इस सरोवर में अवांछित एक तिनका भी नहीं दिखाई देता। इनमें मौजूद मछलियों के शिकार पर प्रतिबंध है।
यही कारण है कि इसमें बड़ी-बड़ी मछलियां जल कीड़ा करती हैं तो हर कोई देखता रह जाता है। यहां पर कार्तिक पूर्णिमा के अलावा विभिन्न त्योहारों पर भी मेले का आयोजन होता है। जिसमें भारी संख्या में लोग शामिल होकर पवित्र सरोवर में स्नान कर पूजा अर्चना करते हैं। यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है।
सांप्रदायिक सौहार्द को मजबूत कर रहा भारतभारी
भारतभारी स्थित प्राचीन पोखरे के एक छोर पर शिवलिंग स्थापित है तो दूसरी तरफ पीर बाबा का स्थान है। जहां पर दोनों समुदायों के लोग अपनी मिन्नतों के लिए जाते हैं। भारतभारी सदियों से सांप्रदायिक एकता और आपसी सौहार्द को मजबूती प्रदान करने का काम कर रहा है। कार्तिक पूर्णिमा के एक सप्ताह तक चलने वाले मेले में सभी धर्म समुदाय के लोग शामिल होते हैं।
हनुमान जी को यहीं लगा था भरत का बाण
ऐसी मान्यता है कि त्रेता युग में श्रीराम रावण युद्ध के दौरान जब मेघनाथ लक्ष्मण पर वीरघातिनी शक्ति बाण का प्रयोग किया और लक्ष्मण मूर्च्छित हो गए थे। सुषेन वैद्य के कहने पर हनुमान जी संजीवनी बूटी लेकर आकाश मार्ग से लौट रहे थे, तो इसी स्थल पर पूजा कर रहे भरत ने अयोध्या का कोई शत्रु समझ कर बाण चला दिया था। बाण लगने से हनुमान जी पर्वत के साथ वहीं गिर पड़े थे, जिससे उक्त स्थल पर सरोवर का उदय हुआ था।
एक अन्य मान्यता यह भी है कि महाराज दुष्यंत के पुत्र भरत ने इसे अपनी राजधानी बनाया था। इस कारण इसका नाम भारतभारी पड़ा, जो बहुत बड़े नगर के रूप में स्थापित हुआ था। एक अन्य मान्यता के अनुसार, राम रावण युद्ध में जब रावण के वध के लिए श्रीराम पर ब्रह्म हत्या आरोप लगा था।
कोई पुरोहित उसके निवारण के लिए तैयार नहीं हुआ तो गुरु वशिष्ठ ने कन्नौज से दो बालकों को अयोध्या लाकर जनेऊ कराकर यज्ञ पूर्ण कराया तब उनका ब्रह्म हत्या दोष दूर हुआ। लेकिन वापस घर जाने पर बालकों को उनके घर वालों ने त्याग दिया। फलस्वरूप वे पुन: वशिष्ठ जी से मिले तब श्रीराम ने बाण चला कर कहा कि जहां यह बाण गिरे, वहीं अपना निवास स्थान बना कर जीवन व्यतीत करें। वह बाण भारतभारी में गिरा, जिससे इस विशाल सरोवर का निर्माण हुआ।
भारतभारी का इतिहास में भी है वर्णन
गोरखपुर विश्वविद्यालय में संरक्षित हैं यहां पर मिले अवशेष
कई वर्ष पूर्व बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास विभाग के प्रोफेसर सतीश चंद्र व एसएन सिंह सहित गोरखपुर विश्वविद्यालय के डॉ. कृष्णा नंद त्रिपाठी ने भारतभारी का स्थलीय निरीक्षण करके मूर्तियों, धातुओं पुरा अवशेषों के अवलोकन के बाद टीले के नीचे एक समृद्ध सभ्यता होने की बात कही थी। लोगों का कहना है कि भारतभारी में प्राचीन टीले व कुएं के नीचे दीवारों के बीच में खुदाई के दौरान कहीं-कहीं लगभग आठ फीट लंबे नर कंकाल मिलते हैं, जो छूते ही राख में तब्दील हो जाते हैं। शोधकर्ताओं द्वारा भारतभारी से ले जाए गए अवशेषों को गोरखपुर विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास विभाग के संग्रहालय में संरक्षित किया गया है। इसे वहां पर देखा जा सकता है।