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हल्लौर के मोहर्रम की देश भर में है अलग पहचान

Tue, 10 Aug 2021 10:30 PM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Tue, 10 Aug 2021 10:30 PM IST
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Hallaur's Muharram has a different identity across the country
हल्लौर के मोहर्रम की देश भर में है अलग पहचान
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हल्लौर। हल्लौर का मोहर्रम पूरे देश में अपनी अलग पहचान रखता है। मोहर्रम का चांद दिखने के बाद सवा दो महीने अय्याम-ए-अजा के रूप में मनाया जाता है। इस बीच बारहा हजार से अधिक आबादी वाले इस कस्बे में सिर्फ गम का माहौल छाया रहता है।
हल्लौर के मोहर्रम का इतिहास बेहद पुराना है। हल्लौर को आबाद करने वाले शाह अब्दुल रसूल भी सूफी विद्वान थे, जो ईरान से हिंदुस्तान आए थे। आज के सैय्यद उन्हीं के वंश से हैं। इमाम हुसैन के साथ कर्बला में शहीद उनके साथियों की शहादत पर खेराजे अकीदत पेश करने के लिए कस्बे में जगह-जगह ताजिया रखने के लिए चौक बना हुआ है, जहां महिलाएं मोहर्रम का चांद होते ही अपने हाथों की चूड़ियां तोड़ देती हैं। उनके शरीर पर नाम मात्र का भी कोई सुहाग चिह्न नहीं रहता है। यह स्थिति दो महीने आठ दिनों तक रहती है। मोहर्रम के लिए ताजिया का निर्माण एक महीने पहले ही आरंभ हो जाता है। यहां का ऐतिहासिक ताजिया तीस फिट का बड़ा ताजिया बकरीद पर्व से पहले ही बनना शुरू हो जाता है।
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कस्बे में एक दर्जन से अधिक सार्वजनिक इमामबाड़े हैं। इसमें चांद रात से ही मजलिस का सिलसिला प्रारंभ हो जाता है, जो पूरे सवा दो महीने तक चलता है। सात मोहर्रम को सुबह हल्लौर की दो प्रसिद्ध अंजुमने क्रमश: अंजुमन गुलदस्ता मातम और अंजुमन फरोग मातम के बैनर तले निकाले जाने वाले जुलूस पूरे कस्बे में दिन भर गश्त करता है। रात में इमाम हसन के बेटे हजरत कासिम की याद में मेंहदी का जुलूस बरामद होता है। आठ मोहर्रम को दरगाह हजरत अब्बास से अलम के साथ मातमी जुलूस निकलता है। उसमें शामिल होने के लिए दूर-दूर तक अकीदतमंद आते हैं। इसमें हिंदुओं समुदाय के लोगों की तादाद रहती है। कई स्थानों पर जंजीर, कमां और तलवार का मातम भी होता है। इस मातम को देखने वाले दांतों तले उंगलियां भले ही दबा लेते हों, मगर मातमदारों के जोश में जरा भी कमी नहीं आती है। इसी रात इमाम हुसैन के अट्ठारह साल के बेटे अली अकबर की याद में ताबूत का जुलूस निकलता है। नौ मोहर्रम की रात होते ही सभी घरों में छोटे-बड़े ताजिये रखे जाते हैं।
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इमामबाड़े की चौक पर रखा जाने वाला तीस फिट का ताजिया पूरे क्षेत्र के श्रद्धालुओं लिए आकर्षक का केंद्र रहता है। चालीस दिन बाद इमाम का चेहलुम बनाया जाता है, जिसमें अमारी की शबीह निकाली जाती है। इस दरमियान कस्बे में ऐसी मजलिसों का भी आयोजन भी होता है, जिसको खिताब करने मुल्क के मशहूर जाकिर और धार्मिक उलेमा आते हैं। सवा दो महीने के आखिरी दिन यानी आठ रबीअव्वल को अय्याम-ए-अजा का अंतिम दिन मनाया जाता है। इसमें अमारी, जुलजनाह की शबीह के साथ मातमी जुलूस निकाला जाता है।
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