{"_id":"6a992797ff16a0cb0503dd2b","slug":"body-of-siddharthnagar-youth-missing-after-nepal-floods-effigy-made-of-kush-and-kaas-grass-2026-09-03","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"नेपाल त्रासदी: अपनों की लाश भी न मिली तो कुश-कास से बनाई प्रतिमा, फिर दी अंतिम विदाई- सभी की आंखे नम","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
नेपाल त्रासदी: अपनों की लाश भी न मिली तो कुश-कास से बनाई प्रतिमा, फिर दी अंतिम विदाई- सभी की आंखे नम
Thu, 03 Sep 2026 01:24 PM IST
Rohit Singh
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
Published by: Rohit Singh
Updated Thu, 03 Sep 2026 01:24 PM IST
सार
परिजनों की सबसे बड़ी पीड़ा यह है कि वे अपनों की मौत की खबर सुनने के बाद भी उनका चेहरा नहीं देख सके। न शव मिला, न आखिरी बार माथा छूकर विदा करने का अवसर। कई दिनों तक सर्च ऑपरेशन में उम्मीद लगाए बैठे परिवारों ने आखिरकार यह मानकर धार्मिक प्रक्रिया पूरी की कि शायद उनके अपने अब कभी वापस नहीं आएंगे।
विज्ञापन
कुश-कास का बनाकर तैयार किया प्रतीकात्मक शव
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
भोटेकोशी की भयावह बाढ़ ने न जाने कितने परिवारों से उनके अपने छीन लिए। किसी को आखिरी बार अपनों का चेहरा तक देखने का मौका नहीं मिला तो किसी को अंतिम संस्कार के लिए शव भी नसीब नहीं हुआ।
विज्ञापन
कई दिनों तक नदी और मलबे में तलाश के बाद भी जब अपनों का कोई सुराग नहीं मिला तो परिजनों का इंतजार टूटने लगा। आखिरकार उन्होंने दिल पर पत्थर रखकर कुश और कास से अपने लापता परिजनों की प्रतीकात्मक देह बनाई और अंतिम संस्कार शुरू कर दिया।
विज्ञापन
विज्ञापन
बुधवार को कई परिवारों ने कुश-कास से लापता लोगों की प्रतिमाएं तैयार कीं। इन्हें अपने बिछड़े परिजन का प्रतीक मानकर धार्मिक रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार किया गया। जिस हाथ से कभी अपने को गले लगाया होगा, उसी हाथ से अब परिजनों को प्रतीकात्मक देह को अंतिम विदाई देनी पड़ी। इस दौरान माहौल बेहद गमगीन रहा।
परिजनों की सबसे बड़ी पीड़ा यह है कि वे अपनों की मौत की खबर सुनने के बाद भी उनका चेहरा नहीं देख सके। न शव मिला, न आखिरी बार माथा छूकर विदा करने का अवसर। कई दिनों तक सर्च ऑपरेशन में उम्मीद लगाए बैठे परिवारों ने आखिरकार यह मानकर धार्मिक प्रक्रिया पूरी की कि शायद उनके अपने अब कभी वापस नहीं आएंगे।
भोटेकोशी में आई बाढ़ और भूस्खलन ने नेपाल-चीन सीमा क्षेत्र में भारी तबाही मचाई है। तेज बहाव में कई लोग बह गए और अनेक लोगों के मलबे में दबे होने की आशंका है। राहत और बचाव दल अब भी खतरनाक परिस्थितियों में मलबा हटाकर लापता लोगों की तलाश कर रहे हैं।
शव नहीं मिला, फिर भी अंतिम विदाई देनी पड़ी...
बुद्धिजीवियों का कहना है कि परिजनों के लिए यह सिर्फ एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि अपनों को खोने की उस पीड़ा को स्वीकार करने की कोशिश है, जिसकी कोई तस्वीर, कोई आखिरी मुलाकात और कोई अंतिम स्पर्श उनके पास नहीं है। कुश-कास से बनाई गई वह प्रतीकात्मक देह उनके लिए उसी अपने की आखिरी निशानी बन गई, जिसे वे शायद जिंदगी भर तलाशते रहेंगे।
बुद्धिजीवियों का कहना है कि परिजनों के लिए यह सिर्फ एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि अपनों को खोने की उस पीड़ा को स्वीकार करने की कोशिश है, जिसकी कोई तस्वीर, कोई आखिरी मुलाकात और कोई अंतिम स्पर्श उनके पास नहीं है। कुश-कास से बनाई गई वह प्रतीकात्मक देह उनके लिए उसी अपने की आखिरी निशानी बन गई, जिसे वे शायद जिंदगी भर तलाशते रहेंगे।