{"_id":"570d429c4f1c1bf90f4a6b2d","slug":"bay-ceiling-scorched-in-the-sun-are-now-helpless","type":"story","status":"publish","title_hn":"बे-छत धूप में अब झुलस रहे बेबस","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
बे-छत धूप में अब झुलस रहे बेबस
अमर उजाला ब्यूरो सिद्धार्थनगर
Updated Wed, 13 Apr 2016 12:16 AM IST
विज्ञापन
गेहूं की फसल राख
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
कल तक जिन घरों में हंसी-ठहाकों के बीच खुशी का माहौल था, आज वहां मायूसी की चादर पसरी है। रिश्तेदार-नातेदार खुशियां बांटने आने वाले थे, अब गम बांट कर जा रहे हैं। यह किसी एक
घर की कहानी नहीं, बल्कि पूरे गांव का कमोबेश यही हाल है। कोई ऐसा नहीं बचा, जो पड़ोसी का दर्द साझा कर सके। खुद के जख्म ही इतने गहरे हैं कि उन्हें भरने में लंबा वक्त लगेगा। 48 घंटे बाद भी किसी को छत नसीब नहीं हुई है। रात तो फिर भी कट जा रही है, मगर तपती दोपहरी में सिर छिपाना आसान नहीं है।
ढेबरुआ थाना क्षेत्र के कचरिहवा टोले में रविवार को आग लगी थी। आग की प्रचंड लपटों ने 70 आशियाने जला दिए थे। इन परिवारों के सिर से छत छिन चुकी है। अब मारे-मारे फिर रहे हैं। परिस्थिति को भांपते हुए कुछ ने अपने महिलाओं-बच्चों को रिश्तेदारों के पास भेज दिया है।
विज्ञापन
रिश्तेदार कब तक शरण देंगे, यह भय भी पीड़ितों के मन में बार-बार साल रहा है। डरा-सहमा हर कोई भविष्य के उजाले की किरण ढूंढ रहे हैं। गांव में सोमवार को पहुंचे कुछ जनप्रतिनिधियों ने मदद के नाम पर कुछ छिटपुट सामग्री जरूर दी थी, लेकिन सैकड़ों परिवारों के बीच में यह सहायता ऊंट के मुंह में जीरा के बराबर ही है। तकदीर पर आंसू बहाती आंखें रहनुमा की राह ताक रही हैं।
खाली हो गई झोली, अब कैसे उठेगी डोली
कचरिहवा टोला निवासी रामकुमार के बेटी की शादी 24 अप्रैल को तय है। पूर परिवार इसकी तैयारी में जुटा था। पूरे साज-बाज के साथ बेटी को डोली में बैठाने की तैयारी थी, मगर अब परिवार को यह तक नहीं सूझ रहा कि शादी कैसे होगी। विवाह की सारी खुशियां काफूर हो गई है। आग में घरबार के साथ पिता के अरमान भी खाक हो गए हैं। गांव की ही पियारे देवी की बेटी का गौना भी दो दिन बाद होना है। आग में सब कुछ जलने के बाद बेटी की विदाई को लेकर मां सशंकित है। आग में पूरा गांव तबाह हुआ है, लिहाजा यह भी नहीं समझ आ रहा कि मदद की गुहार किससे करे।
बेटे के ब्रह्मभोज के लिए नहीं बचा एक दाना
कचरिहवा के सुखना देवी के लड़के रामलाल की मृत्यु कुछ दिन पहले हो गई थी। 15 अप्रैल को ब्रह्मभोज होना है। बेटे को मोक्ष दिलाने के लिए मां के पास अब इस आयोजन के लिए कुछ नहीं बचा। पूरी गृहस्थी और फसल आग की भेंट चढ़ने के बाद खुद का पेट भरने के लिए दूसरे के भरोसे रहना पड़ रहा है। ऐसे में ब्रह्मभोज के लिए राशन-पानी का इंतजाम कैसे होगा? पूरा परिवार यही सोचकर परेशान है। लोग रह-रहकर उस पल को कोस रहे हैं जब आग ने धधक कर उनके खेत राख में बदल दिए।
पांच दिन बाद आएगी बारात, चिंता में कट रही रात
उसका बाजार ब्लाक के रीवा नानकार निवासी चंद्रिका तिवारी की रातें भी चिंता में कट रही हैं। रविवार को ही सीवान में लगी आग से घर समेत 60 बीघा गेहूं की फसल जल गई थी। लगातार दो फसलों की बर्बादी के बाद पिता को आस थी कि गेहूं बेचकर बेटी के हाथ पीले करेगा। बारात की भव्य अगवानी होगी, मगर अब सब सपना हो चुका है। विवाह के लिए कपड़ा, बिस्तर, बेड, सोफा सहित जो सामान खरीदे गए थे, वह आग की भेंट चढ़ चुका है। अब बारात की अगुवाई और बिटिया की विदाई कैसे होगी, इस चिंता ने उनकी रातों की नींद छीन ली है। अब बेटी की विदाई के लिए रिश्तेदारों से मदद का ही भरोसा बाकी रह गया।
विज्ञापन
घर की कहानी नहीं, बल्कि पूरे गांव का कमोबेश यही हाल है। कोई ऐसा नहीं बचा, जो पड़ोसी का दर्द साझा कर सके। खुद के जख्म ही इतने गहरे हैं कि उन्हें भरने में लंबा वक्त लगेगा। 48 घंटे बाद भी किसी को छत नसीब नहीं हुई है। रात तो फिर भी कट जा रही है, मगर तपती दोपहरी में सिर छिपाना आसान नहीं है।
विज्ञापन
ढेबरुआ थाना क्षेत्र के कचरिहवा टोले में रविवार को आग लगी थी। आग की प्रचंड लपटों ने 70 आशियाने जला दिए थे। इन परिवारों के सिर से छत छिन चुकी है। अब मारे-मारे फिर रहे हैं। परिस्थिति को भांपते हुए कुछ ने अपने महिलाओं-बच्चों को रिश्तेदारों के पास भेज दिया है।
विज्ञापन
रिश्तेदार कब तक शरण देंगे, यह भय भी पीड़ितों के मन में बार-बार साल रहा है। डरा-सहमा हर कोई भविष्य के उजाले की किरण ढूंढ रहे हैं। गांव में सोमवार को पहुंचे कुछ जनप्रतिनिधियों ने मदद के नाम पर कुछ छिटपुट सामग्री जरूर दी थी, लेकिन सैकड़ों परिवारों के बीच में यह सहायता ऊंट के मुंह में जीरा के बराबर ही है। तकदीर पर आंसू बहाती आंखें रहनुमा की राह ताक रही हैं।
खाली हो गई झोली, अब कैसे उठेगी डोली
कचरिहवा टोला निवासी रामकुमार के बेटी की शादी 24 अप्रैल को तय है। पूर परिवार इसकी तैयारी में जुटा था। पूरे साज-बाज के साथ बेटी को डोली में बैठाने की तैयारी थी, मगर अब परिवार को यह तक नहीं सूझ रहा कि शादी कैसे होगी। विवाह की सारी खुशियां काफूर हो गई है। आग में घरबार के साथ पिता के अरमान भी खाक हो गए हैं। गांव की ही पियारे देवी की बेटी का गौना भी दो दिन बाद होना है। आग में सब कुछ जलने के बाद बेटी की विदाई को लेकर मां सशंकित है। आग में पूरा गांव तबाह हुआ है, लिहाजा यह भी नहीं समझ आ रहा कि मदद की गुहार किससे करे।
बेटे के ब्रह्मभोज के लिए नहीं बचा एक दाना
कचरिहवा के सुखना देवी के लड़के रामलाल की मृत्यु कुछ दिन पहले हो गई थी। 15 अप्रैल को ब्रह्मभोज होना है। बेटे को मोक्ष दिलाने के लिए मां के पास अब इस आयोजन के लिए कुछ नहीं बचा। पूरी गृहस्थी और फसल आग की भेंट चढ़ने के बाद खुद का पेट भरने के लिए दूसरे के भरोसे रहना पड़ रहा है। ऐसे में ब्रह्मभोज के लिए राशन-पानी का इंतजाम कैसे होगा? पूरा परिवार यही सोचकर परेशान है। लोग रह-रहकर उस पल को कोस रहे हैं जब आग ने धधक कर उनके खेत राख में बदल दिए।
पांच दिन बाद आएगी बारात, चिंता में कट रही रात
उसका बाजार ब्लाक के रीवा नानकार निवासी चंद्रिका तिवारी की रातें भी चिंता में कट रही हैं। रविवार को ही सीवान में लगी आग से घर समेत 60 बीघा गेहूं की फसल जल गई थी। लगातार दो फसलों की बर्बादी के बाद पिता को आस थी कि गेहूं बेचकर बेटी के हाथ पीले करेगा। बारात की भव्य अगवानी होगी, मगर अब सब सपना हो चुका है। विवाह के लिए कपड़ा, बिस्तर, बेड, सोफा सहित जो सामान खरीदे गए थे, वह आग की भेंट चढ़ चुका है। अब बारात की अगुवाई और बिटिया की विदाई कैसे होगी, इस चिंता ने उनकी रातों की नींद छीन ली है। अब बेटी की विदाई के लिए रिश्तेदारों से मदद का ही भरोसा बाकी रह गया।