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लव-कुश से जुड़ा है कटेश्वरनाथ का इतिहास

Mon, 14 Jul 2014 05:31 AM IST
Siddhartha nagar
Siddhartha nagar Updated Mon, 14 Jul 2014 05:31 AM IST
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डुमरियागंज। भगवान भोलेनाथ की भक्ति का महीना सावन की शुरुआत रविवार से हो गई। हर तरफ बम-बम भोले के जयकारे लगने लगे हैं। कांवड़ लेकर भक्त शिव मंदिर पहुंचने लगे हैं। जिले में कई ऐसे शिव मंदिर हैं, जिनकी ख्याति दूर-दूर तक फैली है। यहां जिले के साथ ही नेपाल के भी भक्त जल चढ़ाने आते हैं। तहसील क्षेत्र के पूर्वी छोर पर स्थित कटेश्वरनाथ धाम ऐसा ही है। यह अपने में पौराणिक महत्व समेटे है। सड़वा, पड़री गांव के पास यह पवित्र धाम स्थित है। कहा जाता है कि यहां जलाभिषेक से मुराद पूरी होती है।
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किंवदंती के अनुसार कटेश्वरनाथ धाम स्थित शिव मंदिर का निर्माण कई हजार साल पहले इसी गांव के दिलमान चौधरी ने कराया था। पहले इस स्थान पर खंडहर तथा झाड़ झंखाड़ था। फसल बोने के लिए खेत तैयार करते समय कुदाल जमीन के अंदर गड़े शिवलिंग से टकराया। इससे खून की धार बह निकली। यह बात कुछ ही देर में आसपास फैल गई। दिलमान शिवलिंग बाहर निकाल उस स्थान पर मंदिर का निर्माण कराकर उसे स्थापित करा दिया। इसके बाद यहां भक्त जुटने लगे। मंदिर के उत्तर में श्रद्धालुओं के लिए विशाल तालाब का निर्माण कराया गया है। चौधरी परिवार अब नेपाल के झंडेनगर में रहता है। लेकिन सावन के पहले सोमवार व शिवरात्रि के दिन भोलेनाथ का दर्शन करने उनके परिवार के लोग आते हैं। यहां पार्वती की मूर्ति भी स्थापित है।
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नाम की भिन्नता को लेकर कई मत हैं। कुछ लोगों का कहना है कि दिलमान चौधरी की कुदाल से शिवलिंग कट गया था। इसी निशान की वजह से इसे कटेश्वरनाथ कहा जाता है। यह भी कहानी प्रचलित है कि नेपाल स्थित जनकपुर जाते समय लव, कुश ने इसी स्थान पर शिव की मूर्ति की स्थापना कर पूजा अर्चना की थी। तभी से यहां पूजा अर्चना होने लगी। लव-कुश के नाम पर ही इसका नाम कुशेश्वरनाथ धाम पड़ा था। बाद में कटेश्वरनाथ हो गया। बलरामपुर, बस्ती व नेपाल में नवनिर्मित मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा कटेश्वरनाथ में स्थापित शिवलिंग के स्पर्श के बाद ही की जाती है। पूरे सावन यहां कांवड़ियों का जमावड़ा लगा रहता है। भक्त कांवड़ में जल भरकर नंगे जयकारा लगाते हुए पहुंचते हैं।
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