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ऑटिज्म से मुक्ति पर की गई चर्चा
Siddhartha nagar
Updated Wed, 03 Apr 2013 05:30 AM IST
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सिद्धार्थनगर। विश्व ऑटिजम दिवस पर मंगलवार को जिला मुख्यालय पर प्रबुद्ध वर्ग की बैठक में विस्तृत चर्चा की गई। लोगों को इस बीमारी के प्रति जागरूक बनाने का संकल्प भी लिया गया।
डॉ. अभय प्रताप सिंह ने कहा कि यह एक अनुवांशिक बीमारी है। इसकी पहचान 18 माह के बच्चे के लक्षणों को देखकर ही किया जा सकता है। यह एक ऐसा वैश्विक रोग है जो हर एक हजार बच्चों में से आठ से 10 में पाया जाता है। इससे पीड़ित बच्चों का सामाजिक विकास नहीं होता है। वह समाज में घुलमिल नहीं पाते हैं। इसके अलावा उनकी सोचने-समझने की शक्ति भी प्रभावित होती है। बताया कि बच्चों में 0 से 03 वर्ष में होने वाला विकास महत्वपूर्ण होता है। इस रोग से ग्रसित बच्चों का इस दौरान विकास पूर्ण नहीं होता है। डॉ. अभय ने चर्चा के दौरान बताया कि इस तरह के बच्चों को बोलने में दिक्कत आती है। साथ ही वह किसी से भी आंख मिलाकर बात नहीं कर पाते हैं। स्वयं को अकेला रखने के अलावा वह अपने में ही खेलते हैं। किसी अन्य बच्चे के साथ खेलना उन्हें रास नहीं आता है।
जीव विज्ञान के प्रवक्ता डॉ. नित्यानंद ने कहा कि यह बीमारी गुणसूत्र समूह के उत्परिवर्तनों के कारण गुणसूत्रों की संख्या बदलने से होती है। इसे ऑटिजम कहते हैं। उन्होंने कहा कि इसमें 21वीं जोड़ी के गुणसूत्र दो के बजाए तीन होते हैं। मानसिक क्षमता औसत से कम होती है।
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लक्षण
सिद्धार्थनगर। चिकित्साधिकारी डॉ. अभय प्रताप सिंह ने बताया कि इस रोग से ग्रसित नवजात बच्चों का सिर गोल, गरदन मोटी और त्वचा खुरदुरी होती है। इस तरह बच्चों की जीभ मोटी होने के साथ ही अंगुलियां ठूंठदार मुख खुला, आंखे तिरछी और मंगोली की भांति वलित होती हैं।
उपचार
सिद्धार्थनगर। डॉ. अभय प्रताप ने बताया कि सघन व्यावहारात्मक चिकित्सा तीन वर्ष से पहले शुरू होनी चाहिए। इसके अलावा स्पीच थैरेपी भी अभिभावकाें को देनी चाहिए। बातचीत में सांकेतिक भाषाओं का इस्तेमाल भी होना चाहिए। माता-पिता के अलावा परिवार के सभी सदस्यों को ऐसे बच्चों से प्यार और सम्मान से बातचीत करनी चाहिए। दैनिक जीवन की व्यावहारात्मक शिक्षा देनी चाहिए।
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डॉ. अभय प्रताप सिंह ने कहा कि यह एक अनुवांशिक बीमारी है। इसकी पहचान 18 माह के बच्चे के लक्षणों को देखकर ही किया जा सकता है। यह एक ऐसा वैश्विक रोग है जो हर एक हजार बच्चों में से आठ से 10 में पाया जाता है। इससे पीड़ित बच्चों का सामाजिक विकास नहीं होता है। वह समाज में घुलमिल नहीं पाते हैं। इसके अलावा उनकी सोचने-समझने की शक्ति भी प्रभावित होती है। बताया कि बच्चों में 0 से 03 वर्ष में होने वाला विकास महत्वपूर्ण होता है। इस रोग से ग्रसित बच्चों का इस दौरान विकास पूर्ण नहीं होता है। डॉ. अभय ने चर्चा के दौरान बताया कि इस तरह के बच्चों को बोलने में दिक्कत आती है। साथ ही वह किसी से भी आंख मिलाकर बात नहीं कर पाते हैं। स्वयं को अकेला रखने के अलावा वह अपने में ही खेलते हैं। किसी अन्य बच्चे के साथ खेलना उन्हें रास नहीं आता है।
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जीव विज्ञान के प्रवक्ता डॉ. नित्यानंद ने कहा कि यह बीमारी गुणसूत्र समूह के उत्परिवर्तनों के कारण गुणसूत्रों की संख्या बदलने से होती है। इसे ऑटिजम कहते हैं। उन्होंने कहा कि इसमें 21वीं जोड़ी के गुणसूत्र दो के बजाए तीन होते हैं। मानसिक क्षमता औसत से कम होती है।
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लक्षण
सिद्धार्थनगर। चिकित्साधिकारी डॉ. अभय प्रताप सिंह ने बताया कि इस रोग से ग्रसित नवजात बच्चों का सिर गोल, गरदन मोटी और त्वचा खुरदुरी होती है। इस तरह बच्चों की जीभ मोटी होने के साथ ही अंगुलियां ठूंठदार मुख खुला, आंखे तिरछी और मंगोली की भांति वलित होती हैं।
उपचार
सिद्धार्थनगर। डॉ. अभय प्रताप ने बताया कि सघन व्यावहारात्मक चिकित्सा तीन वर्ष से पहले शुरू होनी चाहिए। इसके अलावा स्पीच थैरेपी भी अभिभावकाें को देनी चाहिए। बातचीत में सांकेतिक भाषाओं का इस्तेमाल भी होना चाहिए। माता-पिता के अलावा परिवार के सभी सदस्यों को ऐसे बच्चों से प्यार और सम्मान से बातचीत करनी चाहिए। दैनिक जीवन की व्यावहारात्मक शिक्षा देनी चाहिए।