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खत्म हो रहे वन, खतरे में जीवन

Updated Sun, 04 Jun 2017 10:23 PM IST
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सिद्धार्थनगर। पर्यावरण संरक्षण की मुहिम जिले में दम तोड़ रही है। वनों के साथ पर्यावरण बचाने की जिम्मेदारी वन विभाग को दी गई है, लेकिन विभाग के पास न धन है और न कोई संसाधन। कागजी आंकड़ों और लोगों के नैतिक दायित्वों के भरोसे विभाग ने पर्यावरण को छोड़ दिया है। विभाग के पास बातें खूब हैं, लेकिन योजना कोई नहीं। नतीजा हरियाली लुप्त हो रही है तो जीवनदायिनी नदियां भी प्रदूषण से कराह रही हैं।
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हिमालय की तराई में स्थित जिले की आबोहवा अभी भी अन्य पड़ोसी जिलों की अपेक्षा काफी बेहतर है। मगर पर्यावरण संरक्षण की उपेक्षा और बढ़ते प्रदूषण का यही हाल रहा तो जल्द ही यहां भी स्वस्थ वातावरण सपना रह जाएगा। सरकारी आंकड़ों पर गौर करें तो जिले में 2300 हेक्टेयर वन क्षेत्र है।

वनों का सर्वाधिक घनत्व सदर तहसील क्षेत्र में है। जनपद के सृजन काल से ही यह दायरा बरकरार है, जबकि वन विभाग हर साल हरियाली को बढ़ाने के लिए लाखों पौधे लगा रहा है। यकीनन हर साल बड़ी तादाद में पेड़ कट भी रहे हैं, लेकिन उनके सापेक्ष पौधरोपण की संख्या कई गुना अधिक है। वर्ष 2016 में ही सघन अभियान चलाकर जिले में 6 लाख से अधिक पौधे रोपे गए थे। देख-रेख व सुरक्षा के अभाव में तमाम पौधे लापता हो गए हैं। हालांकि विभागीय रिकार्ड में 95 फीसदी पौधे सुरक्षित हैं। इससे पहले वर्ष 2015-16 में तीन लाख और 2014-15 में पौने चार लाख पौधे रोपे गए हैं। हरियाली के नाम पर इस साल भी वन विभाग ने दो लाख पौधे लगाने का लक्ष्य रखा है। इतनी संख्या में पौधरोपण से जिले में हर तरफ हरियाली नजर आती, लेकिन हकीकत ठीक उल्टा है। गांवों में भी हरियाली ढूंढने पर नजर आती है। साफ है कि जंगल तेजी से साफ हो रहे हैं। वन माफिया हरे पेड़ों की धड़ल्ले से कटाई कर रहे हैं। सुरक्षा का पहरेदार वन विभाग चैन की नींद सो रहा है। हाईवे निर्माण में ही 14 हजार से अधिक हरे पेड़ काटे जा चुके हैं, इन वृक्षों के बदले कहां पौधरोपण हुआ, इसे बताने वाला कोई नहीं।
इस बाबत डीएफओ बीके मिश्र का कहना है कि जनवरी-फरवरी में सर्वे किया गया था तो गत वर्ष लगाए गए 6 लाख पौधों में से 95 फीसदी सुरक्षित थे। पौधों की नियमित निगरानी हो रही है। सूखने या खराब होने पर उनकी जगह नए पौधे लगाए जा रहे हैं। यह सतत चलने वाली प्रक्रिया है। उन्होंने दावा किया कि अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा जिले का वातावरण अभी भी काफी शुद्ध है। पर्यावरण संरक्षण को लोगों की नैतिक जिम्मेदारी बताई। कहा कि सिर्फ सरकारी तंत्र के भरोसे पर्यावरण की सुरक्षा नहीं हो सकती। सबको जागरूक होना होगा।

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