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घर-घर जाकर एएनएम मधुमेह की जांच करेंगी
siddharthnagar/नीरज मिश्र
Updated Sun, 02 Dec 2018 10:28 PM IST
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सिद्धार्थनगर। एएनएम घर-घर जाकर गर्भवती महिलाओं के मधुमेह की जांच करेंगी। एनएचएम के तहत शुरू हुई इस योजना में सिद्धार्थनगर जिले के अलावा गोरखपुर मंडल का कुशीनगर जिला भी है। पहले चरण में प्रदेश के 18 जिले योजना में शामिल किए गए हैं।
नवजातों को मधुमेह से बचाने के लिए सरकार ने मधुमेह जांच की सुविधा शुरू की है। इसके तहत ब्लॉक स्तर (स्वास्थ्य केंद्रों) पर और घर-घर जाकर मधुमेह की जांच की जाएगी। इस संबंध में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की महाप्रबधंक डॉ. स्वप्ना दास ने पत्र भेजा है। इसमें बताया है कि एएनएम के सहयोग से मधुमेह की जांच की जाएगी। इसके लिए बकायदा उन्हें प्रशिक्षण दिया जा रहा है। जिससे जांच के वक्त उन्हें कोई दिक्कत न हो। आयुष्मान योजना के नोडल अधिकारी डॉ प्रशांत अस्थाना ने बताया कि मधुमेह की जांच अब ब्लॉक स्तर पर और घर होगी। इसके लिए पत्र भी आ चुका है। इसकी तैयारियां जल्द ही शुरू होगी।
मां और बच्चे दोनों को रहता है खतरा
गर्भावस्था में होने वाला मधुमेह मां और बच्चे दोनों के लिए खतरनाक होता है। समय पर इलाज न मिलने से स्थिति और बिगड़ सकती है। अक्सर मधुमेह से ग्रसित महिलाएं जेस्टेशनल डायबिटिज मैलाइटिस (जीडीएम) से पीड़ित रहती हैं। इसके अलावा मधुमेह के कारण सीजेरियन प्रसव कराना पड़ सकता है। प्रसव के दौरान अधिक खून बहने की आशंका भी रहती है। गर्भवती को संक्रमण का खतरा, बच्चा बहुत मोटा पैदा होता है। जिले की बात करें तो वर्तमान में 80 हजार महिलाएं गर्भवती हैं।
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गर्भवती की मधुमेह जांच जरूरी
स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. आफरीन अतहर ने बताया कि सामान्य स्तर पर डायबिटीज का असर शरीर पर 10 साल में दिखता है। लेकिन गर्भावस्था में यह बीमारी हो जाए तो इसका असर तीन चार महीने में ही दिखने लगता है। इसलिए गर्भावस्था में महिला की मधुमेह जांच जरूरी है। इसमें 75 ग्राम ग्लूकोज खिलाकर दो घंटे बाद ग्लूकोमीटर से जांच की जाती है। इसे डिप्सी टेस्ट कहा जाता है। यदि 140 से ज्यादा रीडिंग आती है तो व्यायाम और खानपान से इसे नियंत्रित किया जा सकता है। यदि दो सप्ताह में इसका असर नहीं दिखता है तो गर्भवती महिलाओं को इंसुलिन देना चाहिए। 24 से 29 सप्ताह में दोबारा मधुमेह की जांच होनी चाहिए।
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नवजातों को मधुमेह से बचाने के लिए सरकार ने मधुमेह जांच की सुविधा शुरू की है। इसके तहत ब्लॉक स्तर (स्वास्थ्य केंद्रों) पर और घर-घर जाकर मधुमेह की जांच की जाएगी। इस संबंध में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की महाप्रबधंक डॉ. स्वप्ना दास ने पत्र भेजा है। इसमें बताया है कि एएनएम के सहयोग से मधुमेह की जांच की जाएगी। इसके लिए बकायदा उन्हें प्रशिक्षण दिया जा रहा है। जिससे जांच के वक्त उन्हें कोई दिक्कत न हो। आयुष्मान योजना के नोडल अधिकारी डॉ प्रशांत अस्थाना ने बताया कि मधुमेह की जांच अब ब्लॉक स्तर पर और घर होगी। इसके लिए पत्र भी आ चुका है। इसकी तैयारियां जल्द ही शुरू होगी।
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मां और बच्चे दोनों को रहता है खतरा
गर्भावस्था में होने वाला मधुमेह मां और बच्चे दोनों के लिए खतरनाक होता है। समय पर इलाज न मिलने से स्थिति और बिगड़ सकती है। अक्सर मधुमेह से ग्रसित महिलाएं जेस्टेशनल डायबिटिज मैलाइटिस (जीडीएम) से पीड़ित रहती हैं। इसके अलावा मधुमेह के कारण सीजेरियन प्रसव कराना पड़ सकता है। प्रसव के दौरान अधिक खून बहने की आशंका भी रहती है। गर्भवती को संक्रमण का खतरा, बच्चा बहुत मोटा पैदा होता है। जिले की बात करें तो वर्तमान में 80 हजार महिलाएं गर्भवती हैं।
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गर्भवती की मधुमेह जांच जरूरी
स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. आफरीन अतहर ने बताया कि सामान्य स्तर पर डायबिटीज का असर शरीर पर 10 साल में दिखता है। लेकिन गर्भावस्था में यह बीमारी हो जाए तो इसका असर तीन चार महीने में ही दिखने लगता है। इसलिए गर्भावस्था में महिला की मधुमेह जांच जरूरी है। इसमें 75 ग्राम ग्लूकोज खिलाकर दो घंटे बाद ग्लूकोमीटर से जांच की जाती है। इसे डिप्सी टेस्ट कहा जाता है। यदि 140 से ज्यादा रीडिंग आती है तो व्यायाम और खानपान से इसे नियंत्रित किया जा सकता है। यदि दो सप्ताह में इसका असर नहीं दिखता है तो गर्भवती महिलाओं को इंसुलिन देना चाहिए। 24 से 29 सप्ताह में दोबारा मधुमेह की जांच होनी चाहिए।