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आज 58 कर्बला में दफन किए जाएंगे ताजिये
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1932 में काबुल से मंगाई गई थी ताजिया।
- फोटो : SRAWASTI
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श्रावस्ती। इमाम हुसैन की शहादत की याद को ताजा करने वाला मोहर्रम मंगलवार को गमजदा माहौल में मातम के साथ मनाया जाएगा। जिले के 741 स्थानों पर रखे गए 2754 ताजियों के साथ ही मनौती के ताजिये भी निकाले जाएंगे। इन्हें 58 कर्बला में देर शाम दफन किया जाएगा।
मौलाना गुल मोहम्मद बताते हैं कि ‘कत्ल-ए-हुसैन अस्ल में मरगे यजीद है, इस्लाम जिंदा होता है हर कर्बला के बाद...’।
मोहर्रम इस्लामिक कैलेंडर के पहले महीने का नाम है। इसी महीने से इस्लाम का नया साल शुरू होता है। इस महीने की 10 तारीख को रोज-ए-आशुरा कहा जाता है। इसी दिन को अंग्रेजी कैलेंडर में मोहर्रम कहा गया है।
मोहर्रम के महीने में इस्लाम धर्म के संस्थापक हजरत मुहम्मद साहब के छोटे नवासे इमाम हुसैन और उनके 72 अनुयायियों को शहीद कर दिया गया था। हजरत हुसैन इराक के शहर कर्बला में यजीद की फौज से लड़ते हुए शहीद हुए थे।
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इस्लाम में सिर्फ एक ही खुदा की इबादत करने के लिए कहा गया है। छल, कपट, झूठ, मक्कारी, जुआ, शराब, जैसी चीजें इस्लाम में हराम बताई गई हैं। हजरत मोहम्मद ने इन्हीं निर्देशों का पालन किया। इन्हीं इस्लामिक सिद्धांतों पर अमल करने की हिदायत सभी मुसलमानों और अपने परिवार को भी दी थी।
ऐसे शुरू हुई जंग
इमाम जंग का इरादा नहीं रखते थे क्योंकि उनके काफिले में केवल 72 लोग शामिल थे जिसमें छह माह का बेटा उनकी बहन, बेटियां, पत्नी और छोटे-छोटे बच्चे शामिल थे। यह तारीख एक मोहरर्म थी और गर्मी का वक्त था। गौरतलब है कि आज भी इराक में (मई) गर्मियों में दिन के वक्त सामान्य तापमान 50 डिग्री से ज्यादा होता है। सात मोहर्रम तक इमाम हुसैन के पास जितना खाना व पानी था, वह खत्म हो चुका था। इमाम सब्र से काम लेते हुए जंग को टालते रहे। 7 से 10 मुहर्रम तक इमाम हुसैन, उनके परिवार के मेंबर और अनुयायी भूखे-प्यासे रहे। 10 मुहर्रम को इमाम हुसैन की तरफ एक-एक करके गए हुए शख्स ने यजीद की फौज से जंग की। जब इमाम हुसैन के सारे साथी शहीद हो चुके थे, तब असर (दोपहर) की नमाज के बाद इमाम हुसैन खुद गए और वह भी शहीद हो गए। इस जंग में इमाम हुसैन के एक बेटे जैनुल आबेदीन जिंदा बचे क्योंकि 10 मोहर्रम को वह बीमार थे और बाद में उन्हीं से मुहमम्द साहब की पीढ़ी चली। इसी कुर्बानी की याद में मोहर्रम मनाया जाता है। कर्बला का यह वाक्या इस्लाम की हिफाजत के लिए हजरत मोहम्मद के घराने की तरफ से दी गई कुर्बानी है।
नवाब नवाजिश अली काबुल से मंगाया था ताजिया
मल्हीपुर थाना क्षेत्र के नासिरगंज बाजार निवासियों की मानें तो यहां के नवाब नवाजिश अली ने बेशकीमती लकड़ी से बने दो ताजिये 1932 में काबुल से मंगाये थे। इनमें से एक ताजिया नासिरगंज निवासी मोहम्मद हुसैन को नवाब नवाजिश अली ने दे दिया था जबकि दूसरी ताजिया उन्होंने बहराइच के इमामबाड़ा नवाब साहब में रखवाया था जो आज भी इमामबाड़े में मौजूद है। ठीक उसी तरह नासिरगंज में बना हुसैनिया इमामबाड़ा में काबुल से आई लकड़ी की बेशकीमती ताजिया आज भी ज्यों का त्यों रखा हुआ है। वहां हर गुरुवार को मजलिस होती है। यह भी बताया जाता है कि नवाब नवाजिश अली काबुल मुल्क के रहने वाले थे लेकिन हिंदुस्तान आकर नासिरगंज में उन्होंने एक रियासत बना लिया था जहां के वह नवाब थे।
थानावार ताजिया व जुलूस की स्थिति
भिनगा कोतवाली 250
सिरसिया 675
मल्हीपुर 990
सोनवा 156
गिलौला 174
इकौना 509
नहीं है रूट डायवर्जन की कोई जरूरत
जिले में मंगलवार को निकलने वाले ताजिया जुलूस के लिए कहीं भी रूट डायवर्जन नहीं किया जाएगा। सिर्फ उन्हीं स्थानों पर कुछ देर के लिए वाहनों का आवागमन रोका जाएगा जहां ताजिये को सड़क पार करना होगा। ग्राम प्रहरी से लेकर पीएससी के जवानों के साथ ही सभी थाना व चौकी प्रभारियों को पर्याप्त पुलिस बल के साथ तैनात किया गया है। ताजिया जुलूस के दौरान विद्युत आपूर्ति बाधित रखी जाएगी। कर्बला सहित कर्बला जाने वाले मार्गों की सफाई व्यवस्था पहले ही चुस्त-दुरुस्त कराई जा चुकी है।
-बीसी दुबे, एएसपी
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मौलाना गुल मोहम्मद बताते हैं कि ‘कत्ल-ए-हुसैन अस्ल में मरगे यजीद है, इस्लाम जिंदा होता है हर कर्बला के बाद...’।
मोहर्रम इस्लामिक कैलेंडर के पहले महीने का नाम है। इसी महीने से इस्लाम का नया साल शुरू होता है। इस महीने की 10 तारीख को रोज-ए-आशुरा कहा जाता है। इसी दिन को अंग्रेजी कैलेंडर में मोहर्रम कहा गया है।
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मोहर्रम के महीने में इस्लाम धर्म के संस्थापक हजरत मुहम्मद साहब के छोटे नवासे इमाम हुसैन और उनके 72 अनुयायियों को शहीद कर दिया गया था। हजरत हुसैन इराक के शहर कर्बला में यजीद की फौज से लड़ते हुए शहीद हुए थे।
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इस्लाम में सिर्फ एक ही खुदा की इबादत करने के लिए कहा गया है। छल, कपट, झूठ, मक्कारी, जुआ, शराब, जैसी चीजें इस्लाम में हराम बताई गई हैं। हजरत मोहम्मद ने इन्हीं निर्देशों का पालन किया। इन्हीं इस्लामिक सिद्धांतों पर अमल करने की हिदायत सभी मुसलमानों और अपने परिवार को भी दी थी।
ऐसे शुरू हुई जंग
इमाम जंग का इरादा नहीं रखते थे क्योंकि उनके काफिले में केवल 72 लोग शामिल थे जिसमें छह माह का बेटा उनकी बहन, बेटियां, पत्नी और छोटे-छोटे बच्चे शामिल थे। यह तारीख एक मोहरर्म थी और गर्मी का वक्त था। गौरतलब है कि आज भी इराक में (मई) गर्मियों में दिन के वक्त सामान्य तापमान 50 डिग्री से ज्यादा होता है। सात मोहर्रम तक इमाम हुसैन के पास जितना खाना व पानी था, वह खत्म हो चुका था। इमाम सब्र से काम लेते हुए जंग को टालते रहे। 7 से 10 मुहर्रम तक इमाम हुसैन, उनके परिवार के मेंबर और अनुयायी भूखे-प्यासे रहे। 10 मुहर्रम को इमाम हुसैन की तरफ एक-एक करके गए हुए शख्स ने यजीद की फौज से जंग की। जब इमाम हुसैन के सारे साथी शहीद हो चुके थे, तब असर (दोपहर) की नमाज के बाद इमाम हुसैन खुद गए और वह भी शहीद हो गए। इस जंग में इमाम हुसैन के एक बेटे जैनुल आबेदीन जिंदा बचे क्योंकि 10 मोहर्रम को वह बीमार थे और बाद में उन्हीं से मुहमम्द साहब की पीढ़ी चली। इसी कुर्बानी की याद में मोहर्रम मनाया जाता है। कर्बला का यह वाक्या इस्लाम की हिफाजत के लिए हजरत मोहम्मद के घराने की तरफ से दी गई कुर्बानी है।
नवाब नवाजिश अली काबुल से मंगाया था ताजिया
मल्हीपुर थाना क्षेत्र के नासिरगंज बाजार निवासियों की मानें तो यहां के नवाब नवाजिश अली ने बेशकीमती लकड़ी से बने दो ताजिये 1932 में काबुल से मंगाये थे। इनमें से एक ताजिया नासिरगंज निवासी मोहम्मद हुसैन को नवाब नवाजिश अली ने दे दिया था जबकि दूसरी ताजिया उन्होंने बहराइच के इमामबाड़ा नवाब साहब में रखवाया था जो आज भी इमामबाड़े में मौजूद है। ठीक उसी तरह नासिरगंज में बना हुसैनिया इमामबाड़ा में काबुल से आई लकड़ी की बेशकीमती ताजिया आज भी ज्यों का त्यों रखा हुआ है। वहां हर गुरुवार को मजलिस होती है। यह भी बताया जाता है कि नवाब नवाजिश अली काबुल मुल्क के रहने वाले थे लेकिन हिंदुस्तान आकर नासिरगंज में उन्होंने एक रियासत बना लिया था जहां के वह नवाब थे।
थानावार ताजिया व जुलूस की स्थिति
भिनगा कोतवाली 250
सिरसिया 675
मल्हीपुर 990
सोनवा 156
गिलौला 174
इकौना 509
नहीं है रूट डायवर्जन की कोई जरूरत
जिले में मंगलवार को निकलने वाले ताजिया जुलूस के लिए कहीं भी रूट डायवर्जन नहीं किया जाएगा। सिर्फ उन्हीं स्थानों पर कुछ देर के लिए वाहनों का आवागमन रोका जाएगा जहां ताजिये को सड़क पार करना होगा। ग्राम प्रहरी से लेकर पीएससी के जवानों के साथ ही सभी थाना व चौकी प्रभारियों को पर्याप्त पुलिस बल के साथ तैनात किया गया है। ताजिया जुलूस के दौरान विद्युत आपूर्ति बाधित रखी जाएगी। कर्बला सहित कर्बला जाने वाले मार्गों की सफाई व्यवस्था पहले ही चुस्त-दुरुस्त कराई जा चुकी है।
-बीसी दुबे, एएसपी