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रसोई गैस होने के बाद भी फूंकना पड़ रहा चूल्हा

Fri, 12 Nov 2021 11:37 PM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Fri, 12 Nov 2021 11:37 PM IST
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The stove has to be blown even after having LPG
श्रावसती के भिनगा स्थित प्राथमिक विद्यालय बंदरहा दक्षिणी में चूल्हे में रोटी सेंकटी रसोइयां - फोटो : SRAWASTI
श्रावस्ती। सभी परिषदीय स्कूलों में मध्याह्न भाजन बनाने के लिए एलपीजी गैस सिलेंडर मौजूद है। इसके बावजूद अधिकांश स्कूलों में एमडीएम पकाने के लिए चूल्हा फूंकना पड़ रहा है। स्कूल संचालकों की माने तो एमडीएम मद के तहत मिलने वाली कनवर्जन कास्ट की राशि इतनी कम है कि इससे महंगे एलपीजी सिलेंडर की खरीद संभव नहीं हो पा रही है। इसी लिए खाना पकाने को लकड़ी कंडा जलाना मजबूरी बन गयी है।
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एक तरफ चूल्हे के धुएं से छुटकारा दिलाने को सरकार पीएम उज्जवला योजना के तहत नि:शुल्क गैस चूल्हा व सिलेंडर बांट रही है वही दूसरी तरफ एमडीएम में खाना बनाने के लिए गैस चूल्हा होने के बाद भी चूल्हे के धुएं में खाना पकाना पड़ रहा है। सभी विद्यालयों में गैस सिलेंडर व चूल्हा मुहैया होने के बाद भी अधिकांश स्कूलों ने एमडीएम बनवाने के लिए लकड़ी का चूल्हा फिर से अपना लिया है। ऐसे में पूरे स्कूल में खाना बनते समय धुआं ही धुआं दिखाई देता है। चूल्हे पर खाना बनवाने को लेकर शिक्षकों का कहना है कि इसके लिए मिलने वाली कनवर्जन कास्ट काफी कम होती है। लगातार बढ़ती एलपीजी गैस सिलेंडर की कीमत से सिलेंडर खरीद का खर्च कनवर्जन कास्ट के दायरे में नहीं आ पाता है।
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सब्जी-मसाला खरीदने में ही पूरा खर्च
शिक्षकों का कहना है कि प्राथमिक विद्यालय में प्रति बच्चा 4.97 रुपये व उच्च प्राथमिक विद्यालय में 7.45 रुपये कनवर्जन कास्ट का भुगतान होता है. इसमें अनाज को छोड़ कर सरसों तेल, मसाल, सब्जी, खीर मेवा व दूध की खरीद शामिल है। इसी पैसे में से एलपीजी गैस सिलेंडर की कीमत चुका कर चूल्हा जलाने की व्यवस्था भी करना होती है। औसतन स्कूल में 70 से 75 फीसदी छात्र प्रतिदिन आते है। ऐसे में कनवर्जन कास्ट का पैसा तो सिर्फ सब्जी व मसाला खरीद में ही खर्च हो जाता है।
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हर माह चार से पांच सिलेंडर का खर्च
शिक्षकों का कहना है कि कोशिश करने के बाद भी एक हजार रुपये तक की कीमत पर पहुंच गया एलपीजी गैस सिलेंडर लेना चुनौतीपूर्ण हो गया है। गैस चूल्हे पर खाना बनाए जाने पर हर माह चार से पांच सिलेंडर का खर्च होता है। ऐसे में गैस चूल्हे पर एमडीएम बनवाना काफी मंहगा सौदा साबित होता है। इसी लिए अधिकांश स्कूलों में चूल्हे की लकड़ी पर ही एमडीएम बनाने का कार्य किया जा रहा है।
कुछ ने निकाला बीच का रास्ता
कुछ स्कूलों ने खर्चा पूरा करने को बीच का रास्ता भी निकाला है। इसके तहत दाल सब्जी तो गैस सिलेंडर पर बनवाई जा रही है जबकि रोटी बनाने का काम चूल्हा जला कर होता है। ऐसा ही कुछ भिनगा नगर के प्राथमिक विद्यालय बंदरहा दक्षिणी सहित अन्य स्कूलों में देखने को मिला।

हो सकता है कि कहीं गैस सिलेंडर की उपलब्धता न रही हो तो चूल्हे पर खाना बनाया जा रहा हो। विभाग की ओर से सभी विद्यालयों को गैस सिलेंडर व चूल्हा उपलब्ध कराया गया है। कनवर्जन कास्ट संबंधित के खाते में सीधे जमा होती है। नियमानुसार उसी के माध्यम से एमडीएम की व्यवस्था करानी होती है।-प्रभुराम चौहान, बीएसए
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