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नदी में समाया स्कूल, छप्पर के नीचे पढ़ रहे बच्चे
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जमुनहा (श्रावस्ती)। राप्ती नदी जमुनहा क्षेत्र के बरंगा गांव में स्थित प्राइमरी स्कूल को अपनी धारा में वर्षों पहले बहा ले गई। इसके बावजूद स्थानीय बच्चों का पढ़ने का उत्साह कम नहीं हुआ। बच्चे झोपड़ी में बैठकर ककहरा सीखने लगे। यह देख गांव के ही एक व्यक्ति ने अपनी जमीन स्कूल के लिए दान कर दी, लेकिन वर्षों बाद भी इस जमीन पर भवन नहीं बन सका।
हरिहरपुररानी क्षेत्र के बरंगा गांव में स्थित प्राथमिक विद्यालय वर्ष 2017 में राप्ती नदी में आई बाढ़ में बह गया था। इसके बाद लगा था कि अब गांव में फिर से ककहरा की गूंज नहीं सुनाई देगी। लेकिन यहां के बच्चों ने हार नहीं मानी। मन में ठान लिया कि भले ही स्कूल भवन की सुविधा उन्हें न मिले, लेकिन वह अपनी पढ़ाई जारी रखेंगे। इसके बाद सलारुपुरवा गांव के एक व्यक्ति के छप्पर के नीचे पढ़ाई शुरू हो गई। धीरे-धीरे छात्रों की संख्या बढ़ी। कुछ दिन पूर्व कागजों में भले ही यहां प्राथमिक विद्यालय बरंगा रहा हो, लेकिन अब यह स्कूल छप्पर के नीचे चल रहा है। बच्चों को एमडीएम के साथ अन्य सुविधाएं भी मिल रही हैं।
बच्चों के उत्साह को देखकर गांव के ही किशोरीलाल ने अपनी 16 बिस्वा भूमि शिक्षा विभाग को दान कर दी, लेकिन जमीन मिलने के बाद मामला कागजों में उलझ गया। जो जमीन मिली थी, वह जमुनहा विकास खंड में है। वहीं जो स्कूल भवन नदी में बह गया, वह हरिहरपुरानी विकास खंड का है। अब मामला दो विकास खंडों के बीच फंस गया। प्राथमिक विद्यालय बरंगा को हरिहरपुररानी विकास खंड में बनाने की जमीन नहीं मिली, जबकि जमुनहा में उसे बनाने के लिए पैसा नहीं मिल रहा है।
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यह बात अलग है कि दोनों स्थानों की दूरी महज कुछ मीटर है। लेकिन एक ही जिले में सीमा विवाद के चलते यहां के बच्चे अब छप्पर के नीचे पढ़ने से हिम्मत हार रहे हैं। इसका कारण यह है कि आए दिन होने वाली बारिश के चलते जमीन नम हो जाती है। वहीं विषैले जानवर भी बच्चों को नुकसान पहुंचा सकते हैं। ऐसे मेें अभिभावक छप्पर में संचालित विद्यालय में बच्चों को भेजने से कतरा रहे हैं। वहीं, इस मामले में एबीएसए सुनीता वर्मा ने जानकारी होने से इन्कार कर दिया है।
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हरिहरपुररानी क्षेत्र के बरंगा गांव में स्थित प्राथमिक विद्यालय वर्ष 2017 में राप्ती नदी में आई बाढ़ में बह गया था। इसके बाद लगा था कि अब गांव में फिर से ककहरा की गूंज नहीं सुनाई देगी। लेकिन यहां के बच्चों ने हार नहीं मानी। मन में ठान लिया कि भले ही स्कूल भवन की सुविधा उन्हें न मिले, लेकिन वह अपनी पढ़ाई जारी रखेंगे। इसके बाद सलारुपुरवा गांव के एक व्यक्ति के छप्पर के नीचे पढ़ाई शुरू हो गई। धीरे-धीरे छात्रों की संख्या बढ़ी। कुछ दिन पूर्व कागजों में भले ही यहां प्राथमिक विद्यालय बरंगा रहा हो, लेकिन अब यह स्कूल छप्पर के नीचे चल रहा है। बच्चों को एमडीएम के साथ अन्य सुविधाएं भी मिल रही हैं।
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बच्चों के उत्साह को देखकर गांव के ही किशोरीलाल ने अपनी 16 बिस्वा भूमि शिक्षा विभाग को दान कर दी, लेकिन जमीन मिलने के बाद मामला कागजों में उलझ गया। जो जमीन मिली थी, वह जमुनहा विकास खंड में है। वहीं जो स्कूल भवन नदी में बह गया, वह हरिहरपुरानी विकास खंड का है। अब मामला दो विकास खंडों के बीच फंस गया। प्राथमिक विद्यालय बरंगा को हरिहरपुररानी विकास खंड में बनाने की जमीन नहीं मिली, जबकि जमुनहा में उसे बनाने के लिए पैसा नहीं मिल रहा है।
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यह बात अलग है कि दोनों स्थानों की दूरी महज कुछ मीटर है। लेकिन एक ही जिले में सीमा विवाद के चलते यहां के बच्चे अब छप्पर के नीचे पढ़ने से हिम्मत हार रहे हैं। इसका कारण यह है कि आए दिन होने वाली बारिश के चलते जमीन नम हो जाती है। वहीं विषैले जानवर भी बच्चों को नुकसान पहुंचा सकते हैं। ऐसे मेें अभिभावक छप्पर में संचालित विद्यालय में बच्चों को भेजने से कतरा रहे हैं। वहीं, इस मामले में एबीएसए सुनीता वर्मा ने जानकारी होने से इन्कार कर दिया है।