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श्रीलंका धर्मशाला में बुद्ध प्रतिमा की स्थापना

Fri, 28 Jan 2022 11:21 PM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Fri, 28 Jan 2022 11:21 PM IST
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कटरा (श्रावस्ती)। बौद्ध तपोस्थली श्रावस्ती स्थित श्रीलंका मंदिर स्थित धर्मशाला में शुक्रवार को तथागत भगवान बुद्ध की मूर्ति स्थापित कराई गई। इस दौरान मूर्ति स्थापना समारोह का आयोजन हुआ। जिसमें मौजूद वक्ताओं ने तथागत भगवान बुद्ध के जीवन चरित्र पर प्रकाश डाला।
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श्रीलंका मंदिर के धर्मशाला में भगवान बुद्ध की मूर्ति स्थापना समारोह का आयोजन बौद्ध भिक्षु श्रद्धालोक महाथेरो की अध्यक्षता में आयोजित किया गया। इस दौरान पांच सदस्यीय बौद्ध भिक्षुओं के साथ मूर्ति का अनावरण किया गया। जिसमें बौद्ध भिक्षु संघ रतन महाथेरो, भिक्षु त्रिरत्न, नेपाल बौद्ध भिक्षु संघ के सचिव निगरोध, करुणावती, ध्यानवती ने परित्राण पाठ कर बुद्धम शरणम गच्छामि का उद्घोष किया। इस दौरान श्रद्धालोक महाथेरो ने कहा कि भगवान गौतम बुद्ध ने जंगल में जाकर बहुत ही कठिन तपस्या की थी। ऐसा कहा जाता है पहले तो सिद्धार्थ ने शुरू में तीन चावल खाकर अपनी तपस्या को जारी रखी थी, परंतु उन्होंने उसके बाद बिना खाए पिए ही अपनी तपस्या को करना शुरू कर दिया। कठोर तपस्या करने के कारण भगवान गौतम बुद्ध का शरीर सूख गया था। उन्होंने इतनी कठोर तपस्या की कि लगभग छह वर्षों तक बिना खाए पिए ही अपने तप को जारी रखा।
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एक दिन भगवान गौतम बुद्ध अपनी तपस्या कर रहे थे, तभी अचानक कुछ महिलाएं किसी नगर से वापस लौट रहीं थीं। वह महिलाएं उसी रास्ते से जा रही थीं, जिस रास्ते में भगवान गौतम बुद्ध तपस्या कर रहे थे। वह महिलाएं गीत गा रही थीं। भगवान गौतम बुद्ध के कानों तक एक गीत पहुंचा उस गीत का शीर्षक था वीणा के तारों को ढीला मत छोड़ दो तारों को इतना छोड़ो भी मत कि वह टूट जाए। इस गीत को सुनने के बाद भगवान गौतम बुद्ध यह समझ गए कि नियमित आहार विहार से एक योग सिद्ध होता है।
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वह समझ गए कि किसी भी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए मध्य मार्ग ही सबसे बढ़िया होता है। अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए किसी भी व्यक्ति को बहुत ही कठिन परिश्रम करना पड़ता है, अपने कठिन परिश्रम के कारण ही कोई भी मनुष्य अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। इस दौरान बौद्ध भिक्षु संघ रतन, बौद्ध भिक्षु धम्मसागर, रजनी कांत शुक्ला, राम निहोर शुक्ला, राजू शुक्ला आदि बौद्ध परिवार के लोग मौजूद रहे।
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