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मूलभूत सुविधाओं को तरस रहे सीमावर्ती गांव के लोग
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ककरदरी गांव में मार्ग पर व्याप्त जलभराव
- फोटो : SRAWASTI
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जमुनहा (श्रावस्ती)। भारत-नेपाल सीमा पर बसा हरिहरपुररानी का ककरदरी गांव प्रशासनिक उपेक्षा का दंश झेल रहा है। यहां रहने वाले ग्रामीण मूलभूत सुविधाओं को तरस रहे हैं। यहां न तो आवागमन के लिए बेहतर मार्ग है और न ही पेयजल की उचित व्यवस्था। गांव की बिजली व्यवस्था भी बदहाल होने के कारण ग्रामीण परेशान हैं। जिस पर ध्यान न दिए जाने के कारण ग्रामीणों में प्रशासन के प्रति नाराजगी देखी जा रही है।
हरिहरपुररानी विकास क्षेत्र का ककरदरी गांव भारत-नेपाल सीमा से सटा हुआ है। जिला व तहसील मुख्यालय भिनगा से गांव की दूरी 35 किलोमीटर तो ब्लॉक मुख्यालय से गांव 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां आने-जाने के लिए ग्रामीणों को पांच किलोमीटर जंगल के मध्य पगडंडियों से होकर गुजरना पड़ता है। गांव में जलनिकासी की उचित व्यवस्था न होने के कारण गांव की गलियों में प्रत्येक मौसम में कीचड़ व जलभराव की समस्या बनी रहती है।
इतना ही नहीं यहां पेयजल की उचित व्यवस्था नहीं है। गांव में दो ओवर हेड टैंक का निर्माण तो कराया गया। लेकिन लोगों को जलापूर्ति का लाभ नहीं मिल सका। वर्ष 2011 में राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना के तहत गांव का विद्युतीकरण कराया गया था। लेकिन वन विभाग की आपत्ति के कारण अब तक गांव में बिजली आपूर्ति बहाल नहीं हो सकी है। ऐसे में ग्रामीणों को सोलर लाइट का सहारा लेना पड़ रहा है।
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गांव में तैनात सफाई कर्मी भी अपने कार्य में रुचि नहीं ले रहे हैं। जिससे गांव में गंदगी का अंबार लगा हुआ है। राप्ती बैराज से एसएसबी कैंप तक जाने के लिए खड़ंजा मार्ग का निर्माण कराया गया था। जिसकी मरम्मत न होने के कारण वह पूरी तरह से बदहाल हो चुका है। नेपाल सीमा से सटे इस गांव की करीब तीन हजार की आबादी आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रही है। जिसकी लगातार शिकायतों के बावजूद समस्या पर ध्यान न दिए जाने के कारण ग्रामीणों में जिला प्रशासन के प्रति नाराजगी देखी जा रही है।
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हरिहरपुररानी विकास क्षेत्र का ककरदरी गांव भारत-नेपाल सीमा से सटा हुआ है। जिला व तहसील मुख्यालय भिनगा से गांव की दूरी 35 किलोमीटर तो ब्लॉक मुख्यालय से गांव 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां आने-जाने के लिए ग्रामीणों को पांच किलोमीटर जंगल के मध्य पगडंडियों से होकर गुजरना पड़ता है। गांव में जलनिकासी की उचित व्यवस्था न होने के कारण गांव की गलियों में प्रत्येक मौसम में कीचड़ व जलभराव की समस्या बनी रहती है।
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इतना ही नहीं यहां पेयजल की उचित व्यवस्था नहीं है। गांव में दो ओवर हेड टैंक का निर्माण तो कराया गया। लेकिन लोगों को जलापूर्ति का लाभ नहीं मिल सका। वर्ष 2011 में राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना के तहत गांव का विद्युतीकरण कराया गया था। लेकिन वन विभाग की आपत्ति के कारण अब तक गांव में बिजली आपूर्ति बहाल नहीं हो सकी है। ऐसे में ग्रामीणों को सोलर लाइट का सहारा लेना पड़ रहा है।
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गांव में तैनात सफाई कर्मी भी अपने कार्य में रुचि नहीं ले रहे हैं। जिससे गांव में गंदगी का अंबार लगा हुआ है। राप्ती बैराज से एसएसबी कैंप तक जाने के लिए खड़ंजा मार्ग का निर्माण कराया गया था। जिसकी मरम्मत न होने के कारण वह पूरी तरह से बदहाल हो चुका है। नेपाल सीमा से सटे इस गांव की करीब तीन हजार की आबादी आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रही है। जिसकी लगातार शिकायतों के बावजूद समस्या पर ध्यान न दिए जाने के कारण ग्रामीणों में जिला प्रशासन के प्रति नाराजगी देखी जा रही है।