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धनतेरस पर देवताओं के वैद्य धनवंतरि की दूसरे दिन भी हुई पूजा
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भिनगा में धनतेरस पर खरीदारी करते लोग
- फोटो : SRAWASTI
श्रावस्ती। आयुर्वेद के जनक भगवान धनवंतरि की जयंती दूसरे दिन रविवार को भी मनाई गई। इस दौरान लोगों ने भगवान धनवंतरि की पूजा कर सुखमय जीवन की कामना की। इस दौरान लोगों ने जेवर, वस्त्र व नए बर्तनों की खरीदारी की गई।
रविवार उदया तिथि में तेरस होने के कारण दूसरे दिन भी लोगों के घरों में भगवान धवंतरि की पूजा हुई। इसके साथ दीपों के महापर्व दीपावली का आगाज हो चुका है। पौराणिक मान्यता है कार्तिक मास कृष्ण पक्ष की तेरस के ही दिन देवताओं के वैद्य भगवान धनवंतरि का अवतरण हुआ था। उन्होंने आयुर्वेद विद्या की रचना कर जगत को आयुर्वेद के गुणों के बारे में बताया था। मानव जीवन में सुख व समृद्धि के लिए धन के लिए लक्ष्मी व स्वास्थ्य के लिए आयुर्वेद को नितांत आवश्यक माना गया है।
स्वास्थ्य के दो रूप माने गए हैं। जिनमें पहला शारीरिक व दूसरा मानसिक स्वास्थ्य हैं। यह दोनों बिना लक्ष्मी व आयुर्वेद के संभव नहीं है। इसी के चलते धनतेरस पर जहां लोगों ने आयुर्वेद के जनक भगवान धनवंतरि की पूजा अर्चना किया। साथ ही लोगों ने नए पात्र, वस्त्र एवं जेवरात लाकर विधिविधान पूर्वक पूजन अर्चन कर उसे धारण किया। इस अवसर पर वैद्यों ने अपने घरों व दुकानों पर भगवान धनवंतरि की पारंपरिक ढंग से पूजन अर्चन कर उनके गुणों को अपने में समाहित करने की कामना की।
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रविवार उदया तिथि में तेरस होने के कारण दूसरे दिन भी लोगों के घरों में भगवान धवंतरि की पूजा हुई। इसके साथ दीपों के महापर्व दीपावली का आगाज हो चुका है। पौराणिक मान्यता है कार्तिक मास कृष्ण पक्ष की तेरस के ही दिन देवताओं के वैद्य भगवान धनवंतरि का अवतरण हुआ था। उन्होंने आयुर्वेद विद्या की रचना कर जगत को आयुर्वेद के गुणों के बारे में बताया था। मानव जीवन में सुख व समृद्धि के लिए धन के लिए लक्ष्मी व स्वास्थ्य के लिए आयुर्वेद को नितांत आवश्यक माना गया है।
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स्वास्थ्य के दो रूप माने गए हैं। जिनमें पहला शारीरिक व दूसरा मानसिक स्वास्थ्य हैं। यह दोनों बिना लक्ष्मी व आयुर्वेद के संभव नहीं है। इसी के चलते धनतेरस पर जहां लोगों ने आयुर्वेद के जनक भगवान धनवंतरि की पूजा अर्चना किया। साथ ही लोगों ने नए पात्र, वस्त्र एवं जेवरात लाकर विधिविधान पूर्वक पूजन अर्चन कर उसे धारण किया। इस अवसर पर वैद्यों ने अपने घरों व दुकानों पर भगवान धनवंतरि की पारंपरिक ढंग से पूजन अर्चन कर उनके गुणों को अपने में समाहित करने की कामना की।
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