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गौतम बुद्ध के अनुयायियों ने की पूजा
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तपोस्थली में पूजा अर्चना करते बौद्ध भिक्षु।
- फोटो : SRAWASTI
कटरा (श्रावस्ती)। बौद्ध सांस्कृतिक महासभा की ओर से मंगलवार को तपोस्थली स्थित गंध कुटि पर विशेष वर्षावास पूजा का आयोजन किया गया। बौद्ध भिक्षु जलछन लामा के नेतृत्व में आयोजित इस पूजा में अनुयायियों ने मिलिंद प्रश्न नामक ग्रंथ पर चर्चा की।
पूजा के दौरान बौद्ध भिक्षु जलशन लामा ने कहा कि श्रावस्ती के लोग गौतम बुद्ध के परम भक्त थे। मिलिन्द प्रश्न नामक ग्रंथ के अनुसार भिक्षुओं की संख्या 5 करोड़ थी। इसके अलावा तीन लाख सत्तावन हजार गृहस्थ भी बौद्ध धर्म को मानते थे। श्रावस्ती नगर में जेतवन नाम का एक उद्यान था। इसे जेत नामक राजकुमार ने रोपित किया था।
इस नगर का अनाथ पिण्डक नामक सेठ बुद्ध का प्रिय शिष्य था। इस उद्यान के शांतिमय वातावरण से वह प्रभावित था। उसने इसे खरीद कर बौद्ध संघ को दान कर दिया था। बौद्ध ग्रन्थों में कथा आती है कि इस पूंजीपति ने जेतवन को उतनी मुद्राओं में खरीदा था जितनी कि बिछाने पर इसके पूरे फर्श को भली प्रकार ढक देती थीं।
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उसने इसके भीतर एक मठ भी बनवा दिया जो कि श्रावस्ती आने पर बुद्ध का विश्रामगृह हुआ करता था। इसे लोग कोशल मंदिर भी कहते थे। अनाथ पिंडिक ने जेतवन के भीतर कुछ और भी मठ बनवाए थे। इनमें भिक्षु रहते थे। इसके अतिरिक्त उसने कुएं, तालाब और चबूतरे आदि का भी यहां निर्माण कराया था।
बौद्ध ग्रन्थों में वर्णन मिलता है कि जेतवन में रहने वाले भिक्षु सुबह और शाम राप्ती में नहाने के लिए आते थे। इससे यह प्रमाणित होता है कि यह उद्यान राप्ती के तट के समीप ही स्थित था। अनाथ पिंडक ने अपने जीवन की कमाई बौद्ध संघ के हित में लगा दी थी। गौतम बुद्ध के प्रति श्रद्धा के कारण श्रावस्ती नरेशों ने इस नगर में दान गृह बनवा रखा था। जहां भिक्षुओं को भोजन मिलता था। इसमें विभिन्न देशों के बौद्ध भिक्षु सम्मिलित थे। इस मौके पर काफी संख्या में बौद्ध अनुयायी व बौद्ध भिक्षु मौजूद रहे।
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पूजा के दौरान बौद्ध भिक्षु जलशन लामा ने कहा कि श्रावस्ती के लोग गौतम बुद्ध के परम भक्त थे। मिलिन्द प्रश्न नामक ग्रंथ के अनुसार भिक्षुओं की संख्या 5 करोड़ थी। इसके अलावा तीन लाख सत्तावन हजार गृहस्थ भी बौद्ध धर्म को मानते थे। श्रावस्ती नगर में जेतवन नाम का एक उद्यान था। इसे जेत नामक राजकुमार ने रोपित किया था।
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इस नगर का अनाथ पिण्डक नामक सेठ बुद्ध का प्रिय शिष्य था। इस उद्यान के शांतिमय वातावरण से वह प्रभावित था। उसने इसे खरीद कर बौद्ध संघ को दान कर दिया था। बौद्ध ग्रन्थों में कथा आती है कि इस पूंजीपति ने जेतवन को उतनी मुद्राओं में खरीदा था जितनी कि बिछाने पर इसके पूरे फर्श को भली प्रकार ढक देती थीं।
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उसने इसके भीतर एक मठ भी बनवा दिया जो कि श्रावस्ती आने पर बुद्ध का विश्रामगृह हुआ करता था। इसे लोग कोशल मंदिर भी कहते थे। अनाथ पिंडिक ने जेतवन के भीतर कुछ और भी मठ बनवाए थे। इनमें भिक्षु रहते थे। इसके अतिरिक्त उसने कुएं, तालाब और चबूतरे आदि का भी यहां निर्माण कराया था।
बौद्ध ग्रन्थों में वर्णन मिलता है कि जेतवन में रहने वाले भिक्षु सुबह और शाम राप्ती में नहाने के लिए आते थे। इससे यह प्रमाणित होता है कि यह उद्यान राप्ती के तट के समीप ही स्थित था। अनाथ पिंडक ने अपने जीवन की कमाई बौद्ध संघ के हित में लगा दी थी। गौतम बुद्ध के प्रति श्रद्धा के कारण श्रावस्ती नरेशों ने इस नगर में दान गृह बनवा रखा था। जहां भिक्षुओं को भोजन मिलता था। इसमें विभिन्न देशों के बौद्ध भिक्षु सम्मिलित थे। इस मौके पर काफी संख्या में बौद्ध अनुयायी व बौद्ध भिक्षु मौजूद रहे।