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किसी भी अतिवादी व्यवहार से बचें : धर्म रतन
Mon, 25 Aug 2025 12:47 AM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, श्रावस्ती
संवाद न्यूज एजेंसी, श्रावस्ती
Updated Mon, 25 Aug 2025 12:47 AM IST
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भगवान बुद्ध की प्रतिमा लेकर जेतवन परिसर की परिक्रमा करते अनुयायी। संवाद
कटरा (श्रावस्ती)। बुद्ध की तपोस्थली श्रावस्ती रविवार को अनुयायियों से गुलजार रही। श्रीलंका से आए 180 सदस्यीय दल ने तपोस्थली में तथागत भगवान बुद्ध की प्रतिमा लेकर जेतवन परिसर का भ्रमण किया। इसके बाद भिक्षु धर्म रतन के नेतृत्व में आनंद बोधि पर प्रार्थना की। इस दौरान बौद्ध सभा का भी आयोजन किया गया।
बौद्ध सभा के दौरान भिक्षु धर्म रतन ने कहा कि बुद्ध के दर्शन का प्रमुख विचार मध्यम मार्ग के नाम से जाना जाता है। सूक्ष्म दार्शनिक स्तर पर इसका अर्थ कुछ भिन्न है, किंतु लौकिक स्तर पर इसका अभिप्राय सिर्फ इतना है कि किसी भी प्रकार के अतिवादी व्यवहार से बचना चाहिए।
बुद्ध दर्शन का अगला प्रमुख विचार संवेदनशीलता है। यहां संवेदनशीलता का अर्थ है, दूसरों के दुखों को अनुभव करने की क्षमता। वर्तमान में मनोविज्ञान जिसे समानुभूति कहता है, वह प्राय: यही है, जिसे भारत में संवेदनशीलता कहा जाता रहा है।
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उन्होंने आगे कहा कि बुद्ध के समय प्रचलित दर्शनों में चार्वाक के अलावा लगभग सभी दर्शन परलोक पर अधिक ध्यान दे रहे थे। बुद्ध के विचारों का सार यह था कि इहलोक मिथ्या है और परलोक ही वास्तविक सत्य है। इससे निरर्थक कर्मकांडों तथा अनुष्ठानों को बढ़ावा मिलता था।
कहा कि बुद्ध सदैव व्यक्ति को अहंकार से मुक्त होने की सलाह देते हैं। अहंकार का अर्थ है ‘मैं’ की भावना। यह ‘मैं’ ही ज्यादातर झगड़ों की जड़ है, इसलिए व्यक्तित्व पर अहंकार करना एकदम निरर्थक है। इस दौरान काफी संख्या में अनुयायी मौजूद रहे।
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बौद्ध सभा के दौरान भिक्षु धर्म रतन ने कहा कि बुद्ध के दर्शन का प्रमुख विचार मध्यम मार्ग के नाम से जाना जाता है। सूक्ष्म दार्शनिक स्तर पर इसका अर्थ कुछ भिन्न है, किंतु लौकिक स्तर पर इसका अभिप्राय सिर्फ इतना है कि किसी भी प्रकार के अतिवादी व्यवहार से बचना चाहिए।
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बुद्ध दर्शन का अगला प्रमुख विचार संवेदनशीलता है। यहां संवेदनशीलता का अर्थ है, दूसरों के दुखों को अनुभव करने की क्षमता। वर्तमान में मनोविज्ञान जिसे समानुभूति कहता है, वह प्राय: यही है, जिसे भारत में संवेदनशीलता कहा जाता रहा है।
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उन्होंने आगे कहा कि बुद्ध के समय प्रचलित दर्शनों में चार्वाक के अलावा लगभग सभी दर्शन परलोक पर अधिक ध्यान दे रहे थे। बुद्ध के विचारों का सार यह था कि इहलोक मिथ्या है और परलोक ही वास्तविक सत्य है। इससे निरर्थक कर्मकांडों तथा अनुष्ठानों को बढ़ावा मिलता था।
कहा कि बुद्ध सदैव व्यक्ति को अहंकार से मुक्त होने की सलाह देते हैं। अहंकार का अर्थ है ‘मैं’ की भावना। यह ‘मैं’ ही ज्यादातर झगड़ों की जड़ है, इसलिए व्यक्तित्व पर अहंकार करना एकदम निरर्थक है। इस दौरान काफी संख्या में अनुयायी मौजूद रहे।