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Shravasti News: 565 अनुयायियों ने गंध कुटी पर की पूजा-अर्चना
Mon, 10 Nov 2025 12:36 AM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, श्रावस्ती
संवाद न्यूज एजेंसी, श्रावस्ती
Updated Mon, 10 Nov 2025 12:36 AM IST
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तपोस्थली में पूजा करते अनुयायी।- संवाद
कटरा। बौद्ध तपोस्थली श्रावस्ती रविवार को विभिन्न देशों से पहुंचे 565 अनुयायियों से गुलजार रही। तपोस्थली पहुंचे वियतनाम के 25, थाईलैंड के 40, श्रीलंका के 150, बांग्लादेशी 50 और अन्य देशों के 300 अनुयायियों ने बौद्ध भिक्षु देवानंद के नेतृत्व में गंध कुटी पर पारंपरिक ढंग से दर्शन-पूजन किया। इस दौरान बौद्ध सभा का भी आयोजन किया गया।
बौद्ध सभा को संबोधित करते हुए भिक्षु देवानंद ने कहा कि गौतम बुद्ध कोई ईश्वर, ईश्वर का अवतार, पैगंबर या अलौकिक प्राणी नहीं थे, बल्कि एक सर्वोच्च मानव थे। उन्होंने अपने प्रयास से और किसी अन्य गुरु की सहायता के बिना परम ज्ञान प्राप्त किया।
बुद्ध ने संसार को दिखाया कि मनुष्य होने के नाते हममें इसी जीवन में दुखों से मुक्ति पाने की क्षमता होती है। बुद्ध हमेशा से यह मानते रहे हैं कि न तो वे और न ही कोई अन्य उच्चतर सत्ता किसी को उसके दुखों या जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त कर सकती है।
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भिक्षु ने आगे बताया कि धम्मपद (बुद्ध द्वारा रचित श्लोकों का संग्रह) के 165वें श्लोक में बुद्ध ने कह है कि मनुष्य स्वयं ही पाप करता है और स्वयं ही अशुद्ध होता है। स्वयं ही अकृत पाप करता है और स्वयं ही शुद्ध होता है। पवित्रता और अपवित्रता स्वयं पर निर्भर करती है, कोई भी दूसरे को शुद्ध नहीं कर सकता है।
सभा के बाद अनुयायियों ने तपोस्थली के विभिन्न स्थलों का भ्रमण कर उनके इतिहास की भी जानकारी ली।
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बौद्ध सभा को संबोधित करते हुए भिक्षु देवानंद ने कहा कि गौतम बुद्ध कोई ईश्वर, ईश्वर का अवतार, पैगंबर या अलौकिक प्राणी नहीं थे, बल्कि एक सर्वोच्च मानव थे। उन्होंने अपने प्रयास से और किसी अन्य गुरु की सहायता के बिना परम ज्ञान प्राप्त किया।
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बुद्ध ने संसार को दिखाया कि मनुष्य होने के नाते हममें इसी जीवन में दुखों से मुक्ति पाने की क्षमता होती है। बुद्ध हमेशा से यह मानते रहे हैं कि न तो वे और न ही कोई अन्य उच्चतर सत्ता किसी को उसके दुखों या जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त कर सकती है।
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भिक्षु ने आगे बताया कि धम्मपद (बुद्ध द्वारा रचित श्लोकों का संग्रह) के 165वें श्लोक में बुद्ध ने कह है कि मनुष्य स्वयं ही पाप करता है और स्वयं ही अशुद्ध होता है। स्वयं ही अकृत पाप करता है और स्वयं ही शुद्ध होता है। पवित्रता और अपवित्रता स्वयं पर निर्भर करती है, कोई भी दूसरे को शुद्ध नहीं कर सकता है।
सभा के बाद अनुयायियों ने तपोस्थली के विभिन्न स्थलों का भ्रमण कर उनके इतिहास की भी जानकारी ली।