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आदर्श और यथार्थ का समन्वय है मुंशी प्रेमचंद का साहित्य

Fri, 31 Jul 2020 11:51 PM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Fri, 31 Jul 2020 11:51 PM IST
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The literature of Munshi Premchand is the coordination of ideal and reality
शामली। विख्यात साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद के साहित्य में आदर्श और यथार्थ के मूल्यों का समन्वय है। शिक्षकों का कहना है कि मुंशी प्रेमचंद के साहित्य में जीवन के सामाजिक मूल्यों का दर्शन है, जो आज भी पूरी तरह प्रासंगिक है। उनके साहित्य को लेकर हिंदी विषय के शिक्षकों से बातचीत की गई। पेश है रिपोर्ट...
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समाज को सही राह दिखाती हैं रचनाएं
मुंशी प्रेमचंद की रचनाएं, उपन्यास और कहानी आज भी प्रासंगिक है। उनकी कहानी के तत्वों को समझने, लोगों को समाज के पारस्परिक संबंधों के विश्लेषण और मानवीय मूल्यों के सृजन में सहायता मिलती है। इनकी रचनाओं ने कई पीढ़ियों के मार्गदर्शन का कार्य किया है। इनकी लेखनी वास्तव में समाज को सही मार्ग दिखाने वाली है। इनकी पूस की रात, बड़े घर की बेटी कहानियां, और दीपदान नामक एकांकी सभी को पढ़नी चाहिए। प्रेमचंद ने जीवन का यथार्थ और समाज का आईना दिखाया। दहेज प्रथा जैसी कुरीतियों को समाज के सामने रखा था। उनके 15 उपन्यास, 300 से अधिक कहानियां, 10 पुस्तकों का अनुवाद आदि लेख इस बात को प्रमाणित करते है कि उस समय अंधविश्वास चरम पर था। आर्थिक और सामाजिक विडंबनाओं से जूझते हुए उन्होंने दैनिक जीवन में आने वाली कठिनाइयों को लेखनी में ढाल दिया। रिलेशनशिप जैसे शब्द आज के समय में आए है, लेकिन प्रेेमचंद के साहित्य में इसका परिचय बहुत पहले ही मिल जाता है। उन्होंने यथार्थ एवं आदर्श का सुंदर समन्वय अपने साहित्य के माध्यम से समाज के सम्मुख प्रस्तुत किया है।
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-डा. छवि, असिस्टेंट प्रोफेसर हिंदी विभाग, वीवी (पीजी) कालेज शामली।
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रचनाओं में दिखाया समाज का आईना
मुंशी प्रेमचंद ने बहुत सारी कहानियां, उपन्यास लिखे, जो आज भी प्रासंगिक है। सामाजिक कुरीतियां, गरीबी, कर्ज को लेकर प्रताड़ना, सामाजिक शोषण आदि को अपने साहित्य के माध्यम से समाज के सामने रखा है। आज भी इस तरह की कुरीतियां और शोषण समाज में हो रहा है। उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से समाज को नई राह दिखाई है।
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-संतलाल राम, हिंदी प्रवक्ता, आरके इंटर कालेज शामली
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साहित्य में दिखाई देते हैं अनुभव और सामाजिक मूल्य
आदर्शवाद एवं यथार्थवाद का दृष्टिकोण मुंशी प्रेमचंद के साहित्य में मिलता है। उनके साहित्य में जो सामाजिक मूल्य है, वह आज भी प्रासंगिक है। गोदान उपन्यास से सामाजिक मूल्यों का दर्शन और अनुभव आज भी प्रासंगिक है। जिस प्रकार से होरी कहता है कि गर्दन जब किसी के पैरों के नीचे दबी हो तो उन पैरों को सहलाना अच्छा है। इस तरह के अनेक अनुभव, सामाजिक मूल्य, उनके साहित्य में दिखाई देते है। मुंशी प्रेमचंद का साहित्य हमें नए अनुभव की तरफ प्रेरित करता है।

- डा. रवि खन्ना, शिक्षक, आरके इंटर कालेज शामली।
नाम तो सुना है पर प्रेमचंद की रचनाओं को नहीं पढ़ा
शामली। आज के छात्र मुंशी प्रेमचंद और उनकी कुछ एक रचनाओं के नाम तो जानते है, लेकिन उनका गहनता से अध्यन नहीं किया। इससे लगता है कि आज की युवा पीढ़ी साहित्य से दूर होती जा रही है। मुंशी प्रेमचंद के बारे में छात्रों से बातचीत की गई तो यह बात सामने आई। गांव शेखुपूरा निवासी छात्र मिलन चौहान ने कहा कि मुंशी प्रेमचंद का नाम तो सुना है, लेकिन उनके बारे में ज्यादा नहीं जानते, उनकी रचनाओं में क्या है, यह उन्हें नहीं पता। गांव कंडेला निवासी छात्र मुकुल ने बताया कि मुंशी प्रेमचंद के बारे में उन्होंने सुना है। उनकी रचना गोदान है, लेकिन उसका अध्ययन अभी तक नहीं किया।
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