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रामराज्य नारों से नहीं, नीति और नीयत से आता है : विजय कौशल

Mon, 04 Nov 2024 12:31 AM IST
मेरठ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, शामली
संवाद न्यूज एजेंसी, शामली Updated Mon, 04 Nov 2024 12:31 AM IST
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Ramrajya comes not from slogans but from policy and intentions: Vijay Kaushal
शामली। संत प्रवर विजय कौशल महाराज ने कहा हरि अनंत हरि कथा अनंता। भगवान की कथा और भगवान की महिमा का कोई अंत नहीं है। उन्होंने कहा कि राम राज्य नारों से नहीं नीति और नीयत से आता है।
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रविवार को कैराना रोड स्थित जेजे फार्म में रविवार को विजय कौशल महाराज ने अयोध्या प्रसंग से श्रीराम कथा का शुभारंभ किया। उन्होंने बताया विवाह के बाद श्रीराम चारों भाइयों समेत लौटे तो पूरे अवध में उत्सव मनाया गया। एक दिन महाराजा दशरथ ने उन्होंंने स्वयं का बुढ़ापा जानकर राजसत्ता को श्रीराम को हस्तांतरित करने का निर्णय ले लिया। इस प्रसंग में उन्होंने कहा कि व्यक्ति को अकेले में शीशा देखना चाहिए अन्यथा समाज उसका चेहरा दिखा देता है। राजसत्ता पर बैठे लोगों को आत्म साक्षात्कार करना चाहिए और मुकुट गिरने से पहले सत्ता के हस्तांतरण का निर्णय ले लेना चाहिए। उन्होंने कहा राजा दशरथ से एक भूल हो गई कि उन्होंने राम को राजगद्दी सौंपने का निर्णय कल के ऊपर छोड़ दिया।
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सिद्धांत है कि शुभ कार्य को कल पर नहीं छोड़ना चाहिए और उसे तत्काल कर देना चाहिए जबकि अशुभ कार्य को कल पर टाल देना चाहिए। राजा दशरथ ने दूसरी भूल यह कर दी कि गुरु वशिष्ठ को अपने दरबार में बुलाया, जबकि गुरु के पास स्वयं जाना चाहिए, क्योंकि गुरु मनुष्य और भगवान के बीच स्टेबलाइजर का काम करता है।
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जैसे ही राम को अपने राज्याभिषेक की सूचना मिलती है तो वह जानकी से कहते हैं कि रघुवंश की यह परंपरा अनुचित है कि छोटे भाइयों को छोड़कर बड़े भाई को राज गद्दी सौंपी जाती है। उन्होंने कहा कि राम राज्य नारों से नहीं नीति और नीयत से आता है। अयोध्या का राज्य राम और भरत के बीच फुटबॉल बना हुआ है, जबकि आज के युग में बंटवारे को लेकर बड़ा भाई छोटे भाई को कोर्ट में खड़ा कर रहा है। रामायण त्याग सिखाती है और धर्म पर चलना सिखाती है।

शुभ आचरण सिखाती है। कहा कि अयोध्या में मंथरा कुसंग का प्रतीक है और कुसंग हमेशा दास दासियों के रूप में बनकर आता है और बाद में मालिक बन जाता है। मनुष्य चाहे सत्संग न करें परंतु उसे कुसंग कदापि नहीं करना चाहिए। उन्होंने रानी कैकई द्वारा महाराजा दशरथ से दो वरदानों में भरत के लिए राज्य और राम के लिए 14 वर्ष के वनवास की कथा का मार्मिक प्रसंग प्रस्तुत किया। ा
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