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16 साल की उम्र में बरेली सेंट्रल जेल गए थे ओमप्रकाश
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थानाभवन स्वतंत्रता सेनानी ओमप्रकाश वर्मा फाइल फोटो
- फोटो : SHAMLI
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16 साल की उम्र में बरेली सेंट्रल जेल गए थे ओमप्रकाश
शामली, थानाभवन। आजादी की लड़ाई में अनेक क्रांतिकारियों ने संघर्ष किया। अपना घर परिवार छोड़कर देश को आजाद कराने में अंग्रेजों का मुकाबला किया। यातनाएं सही, जेल गए, लेकिन आजादी की राह से कदम नहीं डिगे। ऐसे क्रांतिकारियों में थानाभवन निवासी स्वतंत्रता सेनानी ओमप्रकाश वर्मा 1942 में भारत छोड़ों आंदोलन से जुड़कर 16 साल की उम्र में बरेली सेंट्रल जेल में बंद रहे। जेल से छूटने के बाद उन्होंने कस्बे में तिरंगा फहराया था।
कस्बे के बीच स्थित चौक बाजार, अब डॉ. हेगडेवार चौक को आजादी का प्रतीक माना जाता है। 1947 में बरेली सेंट्रल जेल में बंद कस्बे के स्वतंत्रता सेनानी ओमप्रकाश वर्मा आजादी के समय जेल से छूटकर वापस कस्बे आए, तो उन्होंने चौक बाजार पर सबसे पहले तिरंगा लहराया था। तब से हर साल स्वतंत्रता दिवस पर यहां झंडारोहण किया जाता है। स्वतंत्रता सेनानी ओमप्रकाश 1942 में महज 16 साल की आयु में देश की आजादी के आंदोलन में जुट गए थे। उस समय महात्मा गांधी ने देश में अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन की शुरूआत की थी। इस आंदोलन में उन्होंने भी अहम भूमिका निभाई। इसके चलते अंग्रेजी हुकूमत ने वर्ष 1943 में उनकी गिरफ्तारी के वारंट जारी कर दिए। उन्हें गिरफ्तार करने की जिम्मेदारी अंग्रेजी हुकूमत के दरोगा जामिन अली को दी गई थी।
करीब छह माह तक दरोगा उन्हें पकड़ नहीं पाए। इसके बाद उनके घर की कुर्की के वारंट जारी कर दिए। इसके बाद ओमप्रकाश को गिरफ्तार कर लिया और उन्हें सेंट्रल जेल बरेली में बंद कर दिया था। साथ ही उनके घर के सामान की नीलामी कर दी गई थी। 1947 में देश आजाद होने वाला था, तभी कुछ दिन पहले उनको जेल से रिहा कर दिया गया। जेल से छूटते ही उन्होंने चौक बाजार पर तिरंगा लहराया। उनके साथ पूरे कस्बे ने देश की आजादी का जश्न मनाया। उस समय डॉक्टर शफी ने अंग्रेजों से नीलामी में ओमप्रकाश वर्मा का खरीदा हुआ सामान भी ससम्मान वापस कर दिया था। तभी से प्रत्येक स्वतंत्रता एवं गणतंत्र दिवस पर इस चौक पर तिरंगा फहराया जाता है। कस्बेवासी इस स्थल को देश की आजादी का प्रतीक भी मानते हैं।
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सादा जीवन जीते थे ओमप्रकाश वर्मा
स्वतंत्रता सेनानी ओमप्रकाश वर्मा के पौत्र अंकुर वर्मा ने बताया कि घर से संपन्न होने के बावजूद उनके दादा ने हमेशा सादा जीवन जिया। वह सिर्फ कुर्ता व धोती पहनते थे, उन्होंने अपना पूरा जीवन बिना चप्पल पहने बिताया। 1992 में उनके दादा का गंभीर बीमारी से जूझते हुए दिल्ली के एक अस्पताल में उपचार के दौरान निधन हो गया था।
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शामली, थानाभवन। आजादी की लड़ाई में अनेक क्रांतिकारियों ने संघर्ष किया। अपना घर परिवार छोड़कर देश को आजाद कराने में अंग्रेजों का मुकाबला किया। यातनाएं सही, जेल गए, लेकिन आजादी की राह से कदम नहीं डिगे। ऐसे क्रांतिकारियों में थानाभवन निवासी स्वतंत्रता सेनानी ओमप्रकाश वर्मा 1942 में भारत छोड़ों आंदोलन से जुड़कर 16 साल की उम्र में बरेली सेंट्रल जेल में बंद रहे। जेल से छूटने के बाद उन्होंने कस्बे में तिरंगा फहराया था।
कस्बे के बीच स्थित चौक बाजार, अब डॉ. हेगडेवार चौक को आजादी का प्रतीक माना जाता है। 1947 में बरेली सेंट्रल जेल में बंद कस्बे के स्वतंत्रता सेनानी ओमप्रकाश वर्मा आजादी के समय जेल से छूटकर वापस कस्बे आए, तो उन्होंने चौक बाजार पर सबसे पहले तिरंगा लहराया था। तब से हर साल स्वतंत्रता दिवस पर यहां झंडारोहण किया जाता है। स्वतंत्रता सेनानी ओमप्रकाश 1942 में महज 16 साल की आयु में देश की आजादी के आंदोलन में जुट गए थे। उस समय महात्मा गांधी ने देश में अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन की शुरूआत की थी। इस आंदोलन में उन्होंने भी अहम भूमिका निभाई। इसके चलते अंग्रेजी हुकूमत ने वर्ष 1943 में उनकी गिरफ्तारी के वारंट जारी कर दिए। उन्हें गिरफ्तार करने की जिम्मेदारी अंग्रेजी हुकूमत के दरोगा जामिन अली को दी गई थी।
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करीब छह माह तक दरोगा उन्हें पकड़ नहीं पाए। इसके बाद उनके घर की कुर्की के वारंट जारी कर दिए। इसके बाद ओमप्रकाश को गिरफ्तार कर लिया और उन्हें सेंट्रल जेल बरेली में बंद कर दिया था। साथ ही उनके घर के सामान की नीलामी कर दी गई थी। 1947 में देश आजाद होने वाला था, तभी कुछ दिन पहले उनको जेल से रिहा कर दिया गया। जेल से छूटते ही उन्होंने चौक बाजार पर तिरंगा लहराया। उनके साथ पूरे कस्बे ने देश की आजादी का जश्न मनाया। उस समय डॉक्टर शफी ने अंग्रेजों से नीलामी में ओमप्रकाश वर्मा का खरीदा हुआ सामान भी ससम्मान वापस कर दिया था। तभी से प्रत्येक स्वतंत्रता एवं गणतंत्र दिवस पर इस चौक पर तिरंगा फहराया जाता है। कस्बेवासी इस स्थल को देश की आजादी का प्रतीक भी मानते हैं।
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सादा जीवन जीते थे ओमप्रकाश वर्मा
स्वतंत्रता सेनानी ओमप्रकाश वर्मा के पौत्र अंकुर वर्मा ने बताया कि घर से संपन्न होने के बावजूद उनके दादा ने हमेशा सादा जीवन जिया। वह सिर्फ कुर्ता व धोती पहनते थे, उन्होंने अपना पूरा जीवन बिना चप्पल पहने बिताया। 1992 में उनके दादा का गंभीर बीमारी से जूझते हुए दिल्ली के एक अस्पताल में उपचार के दौरान निधन हो गया था।

थानाभवन में आजादी के वक्त झंडा चौक पर तिरंगा फहराते ओमप्रकाश वर्मा फाइल फोटो- फोटो : SHAMLI

थानाभवन का ऐतिहासिक झंडा चौक- फोटो : SHAMLI

थानाभवन में ओमप्रकाश वर्मा का परिवार साथ में उनकी धर्मपत्नी श्यामा देवी- फोटो : SHAMLI