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Shamli News: त्याग, संघर्ष और हौसलों की जीती जागती मिसाल है मां
Sun, 10 May 2026 12:44 AM IST
मेरठ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, शामली
संवाद न्यूज एजेंसी, शामली
Updated Sun, 10 May 2026 12:44 AM IST
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मातृ दिवस खबर संबंधी स्टोरी- गांव भैंसवाल की सुशीला अपने परिवार के साथ। परिजन
शामली/ऊन। मां केवल बच्चों को जन्म ही नहीं देती, बल्कि संघर्ष, त्याग और हौसलों से उनका भविष्य भी संवारती है। मातृ दिवस पर ऐसी ही माताओं की कहानी हम आपके सामने रख रहे हैं, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी हार नहीं मानी और अपने बच्चों को सफलता की ऊंचाइयों तक पहुंचाया।
n पति की मौत के बाद संभाली खेती, बेटे को पहुंचाया अमेरिका
गांव भैंसवाल निवासी सुशीला अनपढ़ हैं, लेकिन उनके संघर्ष ने बच्चों की जिंदगी बदल दी। वर्ष 1997 में पति मांगेराम सिंह की मृत्यु के बाद परिवार की पूरी जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई। उस समय बड़ा बेटा 16 वर्ष, दूसरा बेटा 14 वर्ष और बेटी केवल 11 वर्ष की थी। पति की मौत के बाद सुशीला ने 15 बीघा जमीन पर खेती संभाली और दिन-रात मेहनत कर बच्चों को पढ़ाया। उन्होंने बड़े बेटे डॉ. राजीव पंवार को आईआईटी कानपुर तक शिक्षा दिलाई। राजीव आईआईटी कानपुर के गोल्ड मेडलिस्ट रहे और पिछले 18 वर्षों से अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में वैज्ञानिक के पद पर कार्यरत हैं।
दूसरे बेटे आशीष पंवार ने परास्नातक तक पढ़ाई की और वह पिछले 25 वर्षों से शामली गन्ना विभाग में क्लर्क हैं। वहीं बेटी राखी को भी पीजी तक पढ़ाया गया, जो मेरठ के गांव नानू में पिछले 15 वर्षों से बेसिक शिक्षा विभाग में शिक्षिका हैं। सुशीला कहती हैं कि उन्होंने अपने पति का अधूरा सपना पूरा किया और बच्चों को अपने पैरों पर खड़ा देखकर आज उन्हें सबसे ज्यादा खुशी मिलती है।
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n शहीद पति के बाद बेटों को भी देश सेवा के लिए किया तैयार
ऊन तहसील के गांव रेडामाजरा निवासी बबीता देवी का संघर्ष भी लोगों के लिए प्रेरणा है। उनके पति लांसनायक विनोद कुमार जाट रेजीमेंट में तैनात थे। 29 सितंबर 2005 को जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा में आतंकियों से मुकाबला करते हुए वह शहीद हो गए थे।
शहीद विनोद कुमार अपने पीछे माता-पिता, पत्नी बबीता और दो छोटे बेटों मोहित और रोहित को छोड़ गए थे।
पति की शहादत के बाद बबीता देवी ने टूटने के बजाय खुद को संभाला और दोनों बेटों का पालन-पोषण करते हुए उन्हें भी देश सेवा के लिए प्रेरित किया। आज दोनों बेटे सेना में भर्ती होकर देश की सेवा कर रहे हैं। बबीता देवी कहती हैं कि उन्हें अपने दोनों बेटों पर गर्व है कि उन्होंने अपने पिता के पदचिन्हों पर चलते हुए देश सेवा का रास्ता चुना।
गांव प्रधान टीटू कुमार का कहना है कि ऐसी माताएं समाज के लिए प्रेरणा हैं, जिन्होंने अपने दुख को ताकत बनाकर बच्चों का भविष्य उज्ज्वल किया और देश का मान बढ़ाया।
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n पति की मौत के बाद संभाली खेती, बेटे को पहुंचाया अमेरिका
गांव भैंसवाल निवासी सुशीला अनपढ़ हैं, लेकिन उनके संघर्ष ने बच्चों की जिंदगी बदल दी। वर्ष 1997 में पति मांगेराम सिंह की मृत्यु के बाद परिवार की पूरी जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई। उस समय बड़ा बेटा 16 वर्ष, दूसरा बेटा 14 वर्ष और बेटी केवल 11 वर्ष की थी। पति की मौत के बाद सुशीला ने 15 बीघा जमीन पर खेती संभाली और दिन-रात मेहनत कर बच्चों को पढ़ाया। उन्होंने बड़े बेटे डॉ. राजीव पंवार को आईआईटी कानपुर तक शिक्षा दिलाई। राजीव आईआईटी कानपुर के गोल्ड मेडलिस्ट रहे और पिछले 18 वर्षों से अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में वैज्ञानिक के पद पर कार्यरत हैं।
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दूसरे बेटे आशीष पंवार ने परास्नातक तक पढ़ाई की और वह पिछले 25 वर्षों से शामली गन्ना विभाग में क्लर्क हैं। वहीं बेटी राखी को भी पीजी तक पढ़ाया गया, जो मेरठ के गांव नानू में पिछले 15 वर्षों से बेसिक शिक्षा विभाग में शिक्षिका हैं। सुशीला कहती हैं कि उन्होंने अपने पति का अधूरा सपना पूरा किया और बच्चों को अपने पैरों पर खड़ा देखकर आज उन्हें सबसे ज्यादा खुशी मिलती है।
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n शहीद पति के बाद बेटों को भी देश सेवा के लिए किया तैयार
ऊन तहसील के गांव रेडामाजरा निवासी बबीता देवी का संघर्ष भी लोगों के लिए प्रेरणा है। उनके पति लांसनायक विनोद कुमार जाट रेजीमेंट में तैनात थे। 29 सितंबर 2005 को जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा में आतंकियों से मुकाबला करते हुए वह शहीद हो गए थे।
शहीद विनोद कुमार अपने पीछे माता-पिता, पत्नी बबीता और दो छोटे बेटों मोहित और रोहित को छोड़ गए थे।
पति की शहादत के बाद बबीता देवी ने टूटने के बजाय खुद को संभाला और दोनों बेटों का पालन-पोषण करते हुए उन्हें भी देश सेवा के लिए प्रेरित किया। आज दोनों बेटे सेना में भर्ती होकर देश की सेवा कर रहे हैं। बबीता देवी कहती हैं कि उन्हें अपने दोनों बेटों पर गर्व है कि उन्होंने अपने पिता के पदचिन्हों पर चलते हुए देश सेवा का रास्ता चुना।
गांव प्रधान टीटू कुमार का कहना है कि ऐसी माताएं समाज के लिए प्रेरणा हैं, जिन्होंने अपने दुख को ताकत बनाकर बच्चों का भविष्य उज्ज्वल किया और देश का मान बढ़ाया।

मातृ दिवस खबर संबंधी स्टोरी- गांव भैंसवाल की सुशीला अपने परिवार के साथ। परिजन