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मंदिर: मनोकामना पूर्ण करती है मां भगवती
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बाबरी का दुर्गा मंदिर
- फोटो : SHAMLI
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दर्शन मात्र से मनोकामना पूर्ण करती है मां भगवती
शामली, बाबरी। गांव बाबरी के दुर्गा मंदिर में मां भगवती की प्रतिमा स्थापित है। मां भगवती के दर्शन मात्र से ही सभी की मनोकामना पूर्ण हो जाती है प्रति वर्ष मंदिर परिसर में साप्ताहिक मेले का आयोजन अष्टमी से लेकर चौदस तक किया जाता है। मेले में मां भगवती के दर्शनों हेतु हरियाणा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान ,पंजाब ,उत्तराखंड आदि प्रदेशों से भक्तगण मन्नतें मांगने के लिए आते हैं। मन्नत पूर्ण होने पर चौदस मेले के दौरान वार्षिक मेले में भक्तगण मां भगवती के चरणों में प्रसाद चढ़ाते हैं।
मंदिर का इतिहास
वर्ष 1965 में सहारनपुर के एक साधु महाराज सिद्धनाथ बाबरी में गांव के निकट खाली पड़ी तालब के निकट झोपड़ी कुटिया बनाकर रहने लगे थे। एक दिन सपने में माता शाकंभरी देवी ने मंदिर बनाने को कहा तो महाराज ने ग्रामीणों को स्वपन में माता का मंदिर बनाने की जानकारी दी। ग्रामीणों ने मंदिर बनाने के लिए आपसी सहयोग से गांव के सेठ बनारसीदास सिंघल ने 1968 मेंननींव रखकर शुरुआत की। सन 1974 में मंदिर का कमरा व भवन बनकर तैयार हो गया। मंदिर परिसर करीब पांच बीघा जमीन में बना हुआ है। भवन में 26 जनवरी सन 1982 को मां भगवती की मूर्ति स्थापना हुई। भवन के अंदर शाकंभरी देवी की ज्योत लाई गई जो आज तक भवन में प्रज्वलित है। भवन में श्री राधा कृष्ण, राम सीता लक्ष्मण, हनुमान जी, शिव लिंग सहित अन्य देवी देवताओं की मूर्तियों स्थापना की गई है।
इलाहाबाद संगम निवासी पंडित शिवानंद राय शुक्ला बताते हैं कि हर रोज पूजा अर्चना की जाती है। शाम के समय आरती में सैकड़ों की संख्या में भक्तगण आते हैं। कोरोना महामारी के दौरान भी भक्तों ने मां के दर्शन नहीं छोड़े। दुर्गा अष्टमी व चौदस के दिन श्रद्धालु परंपरागत प्रसाद चढ़ाकर मन्नत मांगते हैं।
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शामली, बाबरी। गांव बाबरी के दुर्गा मंदिर में मां भगवती की प्रतिमा स्थापित है। मां भगवती के दर्शन मात्र से ही सभी की मनोकामना पूर्ण हो जाती है प्रति वर्ष मंदिर परिसर में साप्ताहिक मेले का आयोजन अष्टमी से लेकर चौदस तक किया जाता है। मेले में मां भगवती के दर्शनों हेतु हरियाणा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान ,पंजाब ,उत्तराखंड आदि प्रदेशों से भक्तगण मन्नतें मांगने के लिए आते हैं। मन्नत पूर्ण होने पर चौदस मेले के दौरान वार्षिक मेले में भक्तगण मां भगवती के चरणों में प्रसाद चढ़ाते हैं।
मंदिर का इतिहास
वर्ष 1965 में सहारनपुर के एक साधु महाराज सिद्धनाथ बाबरी में गांव के निकट खाली पड़ी तालब के निकट झोपड़ी कुटिया बनाकर रहने लगे थे। एक दिन सपने में माता शाकंभरी देवी ने मंदिर बनाने को कहा तो महाराज ने ग्रामीणों को स्वपन में माता का मंदिर बनाने की जानकारी दी। ग्रामीणों ने मंदिर बनाने के लिए आपसी सहयोग से गांव के सेठ बनारसीदास सिंघल ने 1968 मेंननींव रखकर शुरुआत की। सन 1974 में मंदिर का कमरा व भवन बनकर तैयार हो गया। मंदिर परिसर करीब पांच बीघा जमीन में बना हुआ है। भवन में 26 जनवरी सन 1982 को मां भगवती की मूर्ति स्थापना हुई। भवन के अंदर शाकंभरी देवी की ज्योत लाई गई जो आज तक भवन में प्रज्वलित है। भवन में श्री राधा कृष्ण, राम सीता लक्ष्मण, हनुमान जी, शिव लिंग सहित अन्य देवी देवताओं की मूर्तियों स्थापना की गई है।
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इलाहाबाद संगम निवासी पंडित शिवानंद राय शुक्ला बताते हैं कि हर रोज पूजा अर्चना की जाती है। शाम के समय आरती में सैकड़ों की संख्या में भक्तगण आते हैं। कोरोना महामारी के दौरान भी भक्तों ने मां के दर्शन नहीं छोड़े। दुर्गा अष्टमी व चौदस के दिन श्रद्धालु परंपरागत प्रसाद चढ़ाकर मन्नत मांगते हैं।

बाबरी के दुर्गा मंदिर में मां भगवती की प्रतिमा।- फोटो : SHAMLI
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