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मुसीबतें झेलकर पहुंचे घर, फिर भी नहीं मिल रहा काम
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बहादुर सिंह परिवार के साथ
- फोटो : SHAMLI
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दो वक्त की रोजी-रोटी जुटाना भी हुआ मुश्किल
विनय बालियान/ विनोद जैन
कांधला/ झिंझाना। जनपद में आए प्रवासी श्रमिक रास्तों में मुसीबतों का सामना करते हुए जैसे-तैसे घर पहुंचे। सोचा था कि घर पहुंचकर काम धंधा करेंगे और परिवार का पेट भरेंगे, लेकिन यहां पर भी परेशानियां कम नहीं हुई। काम की तलाश रहती है, लेकिन कहीं पर काम नहीं मिलने से परिवार के लिए दो वक्त की रोटी जुटाना मुश्किल हो रहा है। जनपद में दूसरे प्रदेशों से आए प्रवासी श्रमिकों से बातचीत की गई। पेश है रिपोर्ट...
गांव नौनांगली निवासी जयपाल कश्यप ने बताया की वह छत्तीसगढ़ में दिहाड़ी मजदूरी करता था। रोज 300-400 रुपये कमा लेते थे। कई महीने तक ठीक चला और घर के खर्चे के लिए कुछ रुपये जमा किए थे, लेकिन लॉकडाउन के बाद काम धंधा बंद हो गया। कुछ दिन वहीं फंसे रहे। जमा किए गए कुछ पैसे तो वहीं खाने पीने में खर्च हो गए। इसके बाद वह गांव के लिए चल दिया। घर पहुंचने में तमाम तरह की मुसीबतें झेलनी पड़ी। रास्ते में भूखे प्यासे रहकर घर पहुंचने में दस दिन लगे। यहां आने के बाद कोई मजदूरी नहीं मिल पा रही है। परिवार भूखे मरने के कगार पर है। घर में दो बेटे व दो बेटी है। पत्नी की एक साल पहले मृत्यु हो चुकी है।
गांव नौनांगली निवासी बहादुर कोरी ने बताया कि वह मुरादाबाद में कोल्हू में मजदूरी करता था। लॉकडाउन में कोल्हू बंद हो गया। इसके बाद वह गांव आ गया। गांव में आने के लिए के पुलिस ने कई जगह रोका। यहां तक की डंडे भी खाए। साइकिल से तीन दिन में अपने गांव पहुंचा था। अब यहां पर आने के बाद कोई मजदूरी नहीं मिल रही है। उनका कहना है कि सरकार श्रमिकों की मदद करें।
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गांव मखमूलपर निवासी भूरा ने बताया कि वह दिल्ली की एक निजी कंपनी में काम करता था। लॉकडाउन में कंपनी बंद हो गई। कोरोना को लेकर दिल्ली के हालात खराब होने के बाद वह अपने घर के लिए पैदल ही वहां से निकल पड़ा। रास्ते मे कई परेशानी आई। एक स्थान पर क्वारंटीन सेंटर में भी रहना पड़ा। जैसे तैसे कर वह अपने परिवार के बीच पहुंचा, लेकिन यहां काम न मिलने से परिवार को पालने के लिए उन्हे कोई जरिया नजर नहीं आ रहा है। दिल्ली के हालात देखकर वहां भी अभी जाने की कोई उम्मीद नहीं नजर आ रही हैै। गांव मखमूलपुर के गुलवीर ने बताया कि वह गुरुग्राम में प्लाई बनाने के कारखाने में काम कर अपने परिवार का पालन पोषण कर रहा था। लॉकडाउन में कारखाना बंद हो गया। बसें न चलने पर वह पैदल ही घर के लिए चल पड़ा। यहां काम न मिलने पर परिवार के पालन पोषण में परेशानी उठानी पड़ रही है। अगर यहीं हालात रहे तो परिवार के लिए दो वक्त की रोटी जुटाना मुश्किल हो जाएगा।
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विनय बालियान/ विनोद जैन
कांधला/ झिंझाना। जनपद में आए प्रवासी श्रमिक रास्तों में मुसीबतों का सामना करते हुए जैसे-तैसे घर पहुंचे। सोचा था कि घर पहुंचकर काम धंधा करेंगे और परिवार का पेट भरेंगे, लेकिन यहां पर भी परेशानियां कम नहीं हुई। काम की तलाश रहती है, लेकिन कहीं पर काम नहीं मिलने से परिवार के लिए दो वक्त की रोटी जुटाना मुश्किल हो रहा है। जनपद में दूसरे प्रदेशों से आए प्रवासी श्रमिकों से बातचीत की गई। पेश है रिपोर्ट...
गांव नौनांगली निवासी जयपाल कश्यप ने बताया की वह छत्तीसगढ़ में दिहाड़ी मजदूरी करता था। रोज 300-400 रुपये कमा लेते थे। कई महीने तक ठीक चला और घर के खर्चे के लिए कुछ रुपये जमा किए थे, लेकिन लॉकडाउन के बाद काम धंधा बंद हो गया। कुछ दिन वहीं फंसे रहे। जमा किए गए कुछ पैसे तो वहीं खाने पीने में खर्च हो गए। इसके बाद वह गांव के लिए चल दिया। घर पहुंचने में तमाम तरह की मुसीबतें झेलनी पड़ी। रास्ते में भूखे प्यासे रहकर घर पहुंचने में दस दिन लगे। यहां आने के बाद कोई मजदूरी नहीं मिल पा रही है। परिवार भूखे मरने के कगार पर है। घर में दो बेटे व दो बेटी है। पत्नी की एक साल पहले मृत्यु हो चुकी है।
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गांव नौनांगली निवासी बहादुर कोरी ने बताया कि वह मुरादाबाद में कोल्हू में मजदूरी करता था। लॉकडाउन में कोल्हू बंद हो गया। इसके बाद वह गांव आ गया। गांव में आने के लिए के पुलिस ने कई जगह रोका। यहां तक की डंडे भी खाए। साइकिल से तीन दिन में अपने गांव पहुंचा था। अब यहां पर आने के बाद कोई मजदूरी नहीं मिल रही है। उनका कहना है कि सरकार श्रमिकों की मदद करें।
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गांव मखमूलपर निवासी भूरा ने बताया कि वह दिल्ली की एक निजी कंपनी में काम करता था। लॉकडाउन में कंपनी बंद हो गई। कोरोना को लेकर दिल्ली के हालात खराब होने के बाद वह अपने घर के लिए पैदल ही वहां से निकल पड़ा। रास्ते मे कई परेशानी आई। एक स्थान पर क्वारंटीन सेंटर में भी रहना पड़ा। जैसे तैसे कर वह अपने परिवार के बीच पहुंचा, लेकिन यहां काम न मिलने से परिवार को पालने के लिए उन्हे कोई जरिया नजर नहीं आ रहा है। दिल्ली के हालात देखकर वहां भी अभी जाने की कोई उम्मीद नहीं नजर आ रही हैै। गांव मखमूलपुर के गुलवीर ने बताया कि वह गुरुग्राम में प्लाई बनाने के कारखाने में काम कर अपने परिवार का पालन पोषण कर रहा था। लॉकडाउन में कारखाना बंद हो गया। बसें न चलने पर वह पैदल ही घर के लिए चल पड़ा। यहां काम न मिलने पर परिवार के पालन पोषण में परेशानी उठानी पड़ रही है। अगर यहीं हालात रहे तो परिवार के लिए दो वक्त की रोटी जुटाना मुश्किल हो जाएगा।